लोगों की स्मृति क्षणजीवी होती है। जब उम्मीद और अवसर होता है, तब लोगों की आकांक्षाएं भी बढ़ जाती हैं। पिछले साल असम के लोगों की उम्मीदें तब जाग गई थीं, जब भारतीय जनता पार्टी ने असम के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हराया था। दरअसल जो सरकारें सत्ता मिलने पर सुस्त या अहंकारी हो जाती हैं या काम नहीं करतीं, मतदाताओं का स्वाभाविक ही उन पर क्षोभ उमड़ता है तथा वे उन्हें सत्ता से हटाने में देर नहीं करतीं। पिछले साल कांग्रेस के तरुण गोगोई का मतदाताओं के गुस्से का एहसास हुआ, जब उन्हें सत्ता से बाहर होना पड़ा। तीन साल पहले नरेंद्र मोदी के उभार के बीच यूपीए को भी केंद्र की सत्ता से ठीक इसी तरह बाहर होना पड़ा था।
चूंकि असम में सर्वानंद सोनोवाल के नेतृ्त्व वाली भाजपा सरकार के एक साल पूरे हो गए हैं, और केंद्र में भाजपा सरकार को भी तीन साल पूरे हो चुके हैं, ऐसे में, भाजपा के लिए कुछ अवसरों और चिंताओं पर विचार करने का यही माकूल अवसर है। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में भाजपा को जैसी शानदार जीत मिली, उससे साफ है कि केंद्र में तीन साल पूरे हो चुकने के बावजूद नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता जरा भी कम नहीं हुई है।
असम में मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल की छवि अच्छी है। हालांकि शहरी इलाकों का खासकर मध्यवर्ग नई सरकार के प्रति थोड़ा नाराज दिखता है। इसके बावजूद आम राय यही है कि राज्य के लोग सोनोवाल सरकार को समय देने के लिए तैयार हैं, ताकि वह अपने वायदे पूरे कर सके। सोनोवाल और उनके सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी हेमंत विस्व शर्मा, जो स्वास्थ्य और शिक्षा मंत्री हैं, अपने लक्ष्य के प्रति अडिग दिखते हैं, हालांकि उन्हें मजबूती से जमीन पर अपने पैर गड़ाए रखने की जरूरत है। वे बखूबी जानतें हैं कि असम में भाजपा को मतदाताओं का समर्थन शानदार आइडिया पेश करने के लिए नहीं मिला है, बल्कि इसलिए मिला है, ताकि वे जमीनी स्तर पर लोगों की जरूरतें पूरी करें और सेवाओं का स्तर सुधारें।
सोनोवाल सरकार को राज्य के हर वर्ग और समुदाय को, जिनमें मुस्लिम भी आते हैं और विभिन्न जनजाति समूह भी, आश्वस्त करना होगा कि किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा, न ही किसी को बेवजह परेशान किया जाएगा। ऐसे ही राज्य की पुलिस को इतनी छूट देनी होगी कि लीपापोती करने के बजाय वह कानून तोड़ने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई कर सके। असम के खासकर दूरस्थ इलाकों में प्रशासन-व्यवस्था की काहिली पहले देखने को मिली है। लेकिन बेहतर होगा कि पुलिस को हर जगह सक्रिय और तैनात रखा जाए, चाहे वह बीटीसी (बोडोलैंड टेरीटोरियल काउंसिल) क्षेत्र हो, गुआलपाड़ा या धुबरी हो, पहाड़ी जिले हों, लखीमपुर, धेमाजी, गुवाहाटी या गोहपुर हो।
असम देश के किसी और राज्य जैसा नहीं है। देश का कोई दूसरा सूबा असम की तरह की चुनौतियों या जटिलताओं का सामना नहीं करता। असम में बेहतर ढंग से सरकार वही चला सकता है, जो वहां की व्यापक विविधताओं और विरोधी परिस्थितियों को कुशलता से साध पाएगा। असम में गरीबी और विकासहीनता के दबाव तो हैं ही,विभिन्न किस्म के आंतरिक विवाद भी सरकार की कठिन परीक्षा लेते हैं। इसलिए यह सोनोवाल सरकार की चुनौती है कि वह न सिर्फ किसी दबाव समूह के आगे न झुके, बल्कि असम में सुशासन देने के लिए उसे दिल्ली के दबावों से भी खुद को दूर रखना होगा।
मुख्यमंत्री सोनोवाल गुवाहाटी में एक ग्लोबल बिजनेस सेंटर की स्थापना करना चाहते हैं। वह गुवाहाटी में कारोबारियों के एक वैश्विक सम्मेलन का आयोजन करने के भी आकांक्षी हैं। हालांकि गुवाहाटी की जर्जर बुनियादी व्यवस्था को देखते हुए ऐसे एक आयोजन के प्रति आशंका तो बनी ही रहेगी। इसके अलावा उन्होंने ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी को गति देने और ब्रह्मपुत्र की सफाई कर उसके गाद से दोनों तरफ हाईवे बनाने की बात कही है।
लेकिन ब्रह्मपुत्र की जैव विविधता को देखते हुए, जिसमें डॉल्फिन, मछलियों की असंख्य प्रजातियां, पौधे, जड़ी-बूटियां, कीड़े-मकोड़े, चिड़िया आदि हैं, उसके गाद से हाईवे बनाने का विचार भयावह हो सकता है। किसान भी खेती के लिए गाद पर कमोबेश निर्भर रहते हैं। ब्रह्मपुत्र के दोनों तरफ हाईवे कागज पर देखने में बेशक खूबसूरत लग सकता है, लेकिन वह निश्चित तौर पर उस जैव विविधता को खत्म कर देगा, जो अभी मौजूद है। बल्कि मुख्यमंत्री इस तथ्य से बखूबी अवगत होंगे कि चीन तिब्बत में एकाधिक जलविद्युत परियोजनाओं की जो शुरुआत कर रहा है, उनमें नदी की रेत और गाद को साफ कर दिया जाएगा। इससे ढलान वाले दो देश भारत और बांग्लादेश कीमती गाद से वंचित रह जाएंगे।
वस्तुतः मुख्यमंत्री सोनोवाल को चीन की विशाल बांध परियोजना के विरोध में आवाज उठानी चाहिए, ताकि नई दिल्ली बीजिंग पर दबाव बनाए। हमें सिर्फ चीन की वन बेल्ट-वन रोड परियोजना पर ही चिंतित नहीं होना चाहिए, हकीकत यह है कि वह पाकिस्तान के लिए हिमालय के पश्चिमी ओर कई बांध बना रहा है। चीन नदियों के प्रवाह और उनकी ऊर्जा पर नियंत्रण हासिल कर कई देशों के जीवन को प्रभावित करने की मंशा पाले हुए है।
एक और तथ्य की ओर सोनोवाल सरकार का ध्यान जाना चाहिए। पिछले दिनों तिनसुकिया जिले के एक द्वीपीय ग्राम माझगांव के कुछ स्कूली छात्र-छात्राओं के एक जर्जर नाव पर स्कूल जाने की तस्वीर छपी थी। वे बच्चे पिछले काफी समय से उस जर्जर नाव से स्कूल जाने को मजबूर हैं। सरकार को इसकी ओर ध्यान होगा। इसका समाधान पुल बनाने से नहीं होगा, बल्कि पानी से घिरे इलाके के लोगों को नए नाव और साथ में लाइफ जैकेट देने की जरूरत है। असम जैसे राज्य में इस तरह बुनियादी व्यवस्था न केवल बेहतर की जा सकती है, बल्कि इससे शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में भी बहुत फर्क पड़ेगा।