वे तो अपने सपनों के संग पढ़ने आए थे। लेकिन, तब तक उस साल लाइब्रेरी में बारिश का पानी बिना किसी भेदभाव के उनको डुबोने के लिए प्रवेश कर चुका था। क्या वे सारे छात्र भुला दिए गए? मुझे नहीं मालूम, पर यह सच है कि इस साल बारिश का पानी किसी लाइब्रेरी में नहीं पहुंच पाया। शायद उसे अपनी गलती का एहसास था। इसलिए, इस बार वह बादल बनकर दिल्ली की गालियों में मंडराता रहा और जिस मकान की बुनियाद कमजोर मिली, वहां डेरा डाल दिया। लेकिन, दिनों-दिन उसकी बूंदें और निष्ठुर ही होती जा रही थीं और वही निष्ठुरता लिए वह उन लड़कों के हॉस्टल पहुंच चुकी थीं, जहां वे अपने सपनों के लिए संघर्ष करना सीख रहे थे। बारिश की बूंदें जानती थीं कि इस बार वे लड़के चाहे किसी पीढ़ी के हों, उसको ढूंढ नहीं पाएंगे, क्योंकि इस बार वह मकान की नींव में ही समा चुकी थी। उसे पता था कि नींव में मिलावट है, लेकिन वे लड़के पूछते रहे उन बारिश की बूंदों से कि आखिर उनकी क्या गलती थी? वे कहते रहे कि बारिश तो पूरे संसार में होती है और अपने हर आगमन में वह दुनिया के पुलों को, सड़कों को और मकानों को तो मिट्टी में नहीं मिलाती। संसार के किसी दिल्ली, किसी गुरुग्राम, किसी नोएडा को वेनिस की गलियां तो नहीं बनाती चलती। पर, पानी तो अब उस गिट्टी-गारे का साथी हो चुका था। बेसुध, बेखौफ। लेकिन, उसके पास तर्क भी था।
उसने कहा भी कि पता नहीं हमारे मुल्क को अंग्रेजों के जाने के बाद किसकी नजर लग गई। उनके जाते ही मकान हों या दुकानें, नई सड़कें हों या पुरानी, पुल हों या दूसरी इमारतें-बारिश की कुछ बूंदें पड़ते ही सब जैसे अभिशप्त हो जाते हैं। बारिश के साथ ये सब उन्हें भी अपने साथ डुबोते रहे, जिनकी मेहनत और टैक्स के पैसों से इन्हें बनाया गया था। कभी लोग सड़क के गड्ढों में गिरकर जान गंवाते हैं, कभी बिजली के तार उनकी जान ले लेते हैं, कभी लाइब्रेरी में डूबने की खबर आती है और अब जिस बिल्डिंग में रहकर वे अपने जीवन में कुछ बनने और करने का सपना देख रहे थे, वही बिल्डिंग उनके सपनों के साथ मिट्टी में समा गई। कुछ अगर बचा, तो वही आरोप-प्रत्यारोप, कुछ संवेदना के स्वर। अगर मकान की नींव में मानवता और दयालुता को भी सीमेंट व बालू के संग मिलाया गया होता, तो बहुत कुछ बचाया जा सकता था। लेकिन, यह हो न सका।
परमाणु बम के गिरते ही जापान यह समझ बैठा कि मनुष्य को क्रूरता और लालच से बचा सकते हैं, जिसको जापानी भाषा में ‘ओमोईयारी’ कहा गया। इसका कोई सटीक अंग्रेजी अनुवाद तो नहीं है, लेकिन इसका अनुवाद अक्सर ‘दूसरों का ख्याल रखना’ या ‘सहानुभूति’ के तौर पर किया जाता है। इसका पूरा मतलब है, दूसरों की जरूरतों को पहले से समझना और उसी अनुसार काम करना! यह शब्द खुद इसका संकेत भी देता है: ‘ओमोई’ का अर्थ है विचार और भावना, जबकि ‘यारी’ शब्द ‘यारु’ से बना है, जिसका अर्थ है भेजना या आगे बढ़ाना। दोनों मिलकर किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति चिंता या परवाह जाहिर करने और फिर उस पर अमल करने का भाव पैदा करते हैं। अगर व्यवस्था और नागरिक के अंदर पहले से ही यह भाव मौजूद रहे, तो फिर बारिश को भला क्या शिकायत हो सकती है! ‘ओमोईयारी’ सिर्फ मन के अंदर उस मनुष्य को ही सहानुभूति से नहीं तलाशता, बल्कि उस व्यक्ति या उस कार्य को आगे बढ़कर करने की प्रेरणा भी देता है।
जो दयालुता किसी के कहने का इंतजार करती है, वह पहले ही एक कदम पीछे रह जाती है। जापानी सोच यह मानती है कि सबसे अच्छी मदद अक्सर चुपचाप की जाती है, बिना किसी दिखावे और बिना किसी एहसान के। जैसे- भीड़-भाड़ वाली ट्रेन में किसी को बैठने की जगह दे देना, कोई दस्तावेज पहले से तैयार कर लेना, ताकि सहकर्मी को उसके लिए पूछना न पड़े, वृद्ध को सड़क पार करा देना, कुछ नहीं, तो किसी के लिए एक छोटी-सी दुआ ही कर देना। मदद करके अगर कोई स्पष्टीकरण दिया भी जाता है, तो वह बाद में आता है। जापान यूं ही जापान नहीं बना। इस देश ने मानवता के बोध को तकनीकी प्रबोधता से ज्यादा महत्वपूर्ण माना और देश प्रेम का अटूट हिस्सा भी।
जापान में यह सोच बचपन से ही सिखाई जाती है, अक्सर ऐसे सवालों के जरिये, जो बच्चों को सिर्फ नियमों का पालन करने के बजाय दूसरे व्यक्ति की मनःस्थिति की कल्पना करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। यह रोजमर्रा के सामाजिक तालमेल को बनाए रखने वाले शांत तरीकों में से एक है, वही सांस्कृतिक धारा ‘ओमोतेनाशी’, यानी जरूरतों को पहले से भांपने वाली मेहमाननवाजी, जैसी सोच में बहती है। यह परोपकार के बड़े कामों के बारे में नहीं है; यह छोटी-छोटी, रोजमर्रा की दयालुता के बारे में है। हालांकि, यह मान लेने में थोड़ा खतरा जरूर है कि आप किसी दूसरे व्यक्ति की जरूरतों को उनसे बेहतर जानते हैं। एक सच्चे ‘ओमोईयारी’ के लिए ध्यान और विनम्रता की जरूरत होती है, न कि दूसरों पर अपने विचार थोपने की। फिर भी, जब इसे सही ढंग से अपनाया जाता है, तो यह किसी के दिन की छोटी-मोटी परेशानी दूर कर देता है! ‘ओमोईयारी’ एक गुण है, एक आदत है। आखिर ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता कि छात्रों के रहने के लिए किफायती दर पर सुरक्षित और स्वच्छ घरों का निर्माण हो? दिल्ली हो, कोटा हो या अन्य कोई शहर। क्या तमाम राजनीतिक दल और निजी संस्थाओं को आगे बढ़कर नहीं आना चाहिए और देश के भविष्य के रखरखाव की व्यवस्था नहीं करनी चाहिए? या बस अंग्रेजों से भी सूखा मन रखना चाहिए!
उस दिन मिट्टी में दबे उन युवाओं की कराह और दुख को तभी समझा जा सकता है, या किसी आपदा या इन्सानी कष्ट को तभी महसूस किया जा सकता है, जब मानवता में कोई मिलावट न हो। सीमेंट तो जोड़ने का काम करता है, लेकिन कुछेक अपने फायदे के लिए सीमेंट को भी उसकी प्रकृति से दूर कर देते हैं। फिर न मकान बचता है, न पुल और न ही मनुष्य। वे सारे लड़के, जो किसी के बेटे थे, देश की रोशनी थे, वे मानो मकान में नीचे दबे अपने हाथ को हिलाते हुए, टूटती सांसों को संभालते हुए कुछ कहना चाह रहे थे, लेकिन कह नहीं पाए। वे अपने सपनों संग अल्लामा इकबाल को, भगत सिंह को याद करते हुए बस बुझ गए-
भरी बज्म में राज की बात कह दी
बड़ा बे-अदब हूं सजा चाहता हूं
कोई दम का मेहमां हूं ऐ अहल-ए-महफिल
चराग-ए-सहर हूं, बुझा चाहता हूं!