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मोदी का मुकाबला करते नीतीश

Wed, 12 Aug 2015 08:33 PM IST
अवधेश कुमार
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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने, लगता है, अपनी रणनीति बना ली है कि जब-जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा होगी, वह पत्रकार वार्ता के जरिये उसका जवाब देंगे। यह चुनावी दृष्टि से उचित राजनीतिक रणनीति मानी जा सकती है। पर इससे दोनों नेताओं के शब्द द्वंद्व का सिलसिला आरंभ हो गया है। लोकसभा चुनाव में मोदी के सामने कोई नेता लगता ही नहीं था। बिहार विधानसभा चुनाव में ऐसा लगता है कि मोदी के समानांतर कोई नेता है। हालांकि मुजफ्फरपुर रैली और गया रैली में दोनों के तेवर में अंतर था। मुजफ्फरपुर की रैली के बाद नीतीश कुमार ने जो जवाब दिया, वह अत्यंत ही सुसंगत, सुसंबद्ध एवं बिंदुवार था। हां, मोदी की बातों के असर को वह कितना कम कर पाए हैं, इसका आकलन करना अभी कठिन होगा। पर इससे साबित हुआ कि नीतीश ने इस बार चुनाव अभियान की तैयारी नरेंद्र मोदी की लोकसभा चुनाव की तरह ही व्यवस्थित तरीके से की है। पर गया में मोदी की रैली के बाद नीतीश कुमार के जवाब में तथ्य और व्यवस्थित बिंदुओं का अभाव दिखा। जबकि गया में प््रधानमंत्री मोदी का भाषण मुजफ्फरपुर से ज्यादा प्रभावी और तार्किक था।
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चुनावी रैलियों में बहुत ज्यादा तथ्यों के साथ बातें नहीं होतीं। उसमें सामने वाले के शासन को जनता के लिए अहितकर ठहराकर खुद को बेहतर बताया जाता है। इसके आधार पर यह कहा जाता है कि हमें वोट दीजिए, तो हम प्रदेश का चेहरा बदल देंगे। यही मोदी कर रहे थे। उनकी जगह कोई और होता, तो वह भी यही करता। जदयू इस समय सत्तारूढ़ पार्टी है, तो हमला उस पर होगा ही। इस पर नीतीश कुमार के जवाब प्रभावी नहीं थे। वह मोदी की बात को बिहारियों का अपमान बता रहे थे। पहले भी अपने डीएनए में गड़बड़ी को उन्होंने बिहारियों का अपमान बताने की कोशिश की। अब तो उन्होंने 50 लाख लोगों के हस्ताक्षर के साथ लोगों के नाखून और बाल लेकर यह कहते हुए मोदी को भेजने का ऐलान किया है कि वह इन सबकी जांच करें। मोदी द्वारा बीमारू राज्य के जिक्र को नीतीश ने फिर बिहार का अपमान बता दिया। जबकि मोदी ने जिस संदर्भ में यह बात कही, उसमें अपमान कहीं नहीं था।

गया में शकुनी चौधरी ने मुख्यमंत्री नीतीश के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया, वह निस्संदेह आपत्तिजनक था। प्रधानमंत्री एवं भाजपा नेताओं को इसका ध्यान रखना होगा कि गठबंधन के चक्कर में ऐसे नेताओं को वे मंच पर न एकत्रित कर लें, जिनकी बातों का जवाब देना मुश्किल हो जाए। वैसे लालू यादव और उनकी पार्टी के नेताओं ने पिछले तेरह वर्षों से नरेंद्र मोदी के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया है, वे भी राजनीतिक मर्यादा की सीमा में नहीं थे। नीतीश कुमार ने पिछले पांच वर्षों में मोदी के लिए जिस तरह की वितृष्णा प्रदर्शित की, वह भी देश के सामने है। हां, उन्होंने इतनी चालाकी अवश्य की कि कभी सीधे नाम नहीं लिया। जाहिर है, मोदी के लिए जवाब देने का जब भी अवसर आएगा, वह अपने तरीके से देंगे। बावजूद इसके प्रधानमंत्री को महसूस करना चाहिए कि वह आज जहां पहुंचे हैं, वहां अपने ऐसे आलोचकों के कारण ही। उनसे उम्मीद की जाती है कि उनके मंच से अमार्यादित भाषा का प्रयोग न हो। कुल मिलाकर, बिहार का चुनाव नीतीश बनाम मोदी के शब्द द्वंद्व का ऐसा मंचन साबित हो रहा है, जो कुछ महीने के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहेगा।
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