राम मनोहर लोहिया के दो अनुयायी नीतीश कुमार एवं लालू प्रसाद यादव लंबे अरसे साथ रहने के बाद अलग हो गए थे। एक भाजपा के साथ मिलकर बिहार की सत्ता पर काबिज हुआ, तो दूसरा कांग्रेस के साथ मिलकर केंद्र की सत्ता में हिस्सेदार था। लोहिया के विचारों से बिल्कुल अलग रास्ता दोनों ने अपनाया था, ऐसे में कौन कितना लोहियावादी है, यह कहना तो मुश्किल है, परंतु दोनों अब फिर साथ होकर भाजपा का मुकाबला करने जा रहे हैं। अभी हाल ही में हुए विधानसभा के उपचुनाव में दोनों ने अपनी संयुक्त शक्ति के दम पर भाजपा को परास्त भी किया है।
वहीं लोहिया की जन्मभूमि एवं कर्म भूमि रहे उत्तर प्रदेश की राजनीति बिहार से जरा अलग है। वहां लोहिया की परंपरा के दावेदार मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी एक मजबूत दल है और अभी सत्ता में भी है। दूसरी ओर प्रदेश में पिछले लोकसभा चुनाव से पहले तक दूसरी बड़ी राजनीतिक शक्ति मायावती की बहुजन समाज पार्टी रही है, जो अंबेडकर और कांशीराम के विचारों पर चलने का दावा करती है।
लोहिया एवं अंबेडकर दोनों ही गरीबी के विरुद्ध सामाजिक न्याय, धर्म निरपेक्षता की राजनीति के पक्षधर रहे। आज संघ के स्वयं सेवक एवं प्रचारक प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री एवं राज्यपाल जैसे पदों पर काबिज हो रहे हैं। पूरे देश में उनका विजयरथ दौड़ रहा है। ऐसे में लोहिया और अंबेडकर के अनुयायी क्या भाजपा के विरुद्ध संघर्ष के लिए साथ आ सकते हैं? उत्तर प्रदेश की राजनीति में अहं के टकराव एवं सत्ता की आकांक्षा के टकराव के कारण यह संभव होता नहीं दिखता।
उत्तर प्रदेश में पहले 11 विधानसभा सीटों के उपचुनाव और अभी कैराना के उपचुनाव में देखने को मिला की बसपा की गैरमौजूदगी के कारण दलित वोट समाजवादी पार्टी की ओर सरक गए, जिससे भाजपा को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। इस संघटना से प्रश्न उठ रहा है कि क्या भविष्य में इस तरह के रणनीतिक मतदान की गुंजाइश है? क्या उत्तर प्रदेश में 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव में पिछड़े और दलित मतदाताओं के स्तर पर बन गई यह युति जारी रह पाएगी?
क्या उत्तर प्रदेश में जिस दलित एवं अति पिछड़ा मतदाता ने लोकसभा चुनाव में भाजपा को मत दिया था, क्या वह तीन-चार महा में 'मोदी व्यामोह' से मुक्त होकर इन उपचुनावों में फिर अपनी आधारभूत राजनीति की ओर लौट आया है, जिसमें पिछड़े और दलित स्वाभाविक सहयोगी माने जाते रहे हैं। उत्तर प्रदेश का राजनीतिक परिदृश्य संकेत देता है कि भाजपा के खिलाफ दलित एवं पिछडों का यह संयुक्त मोर्चा शायद ही बन पाए।
लेकिन इस बीच एक नई प्रक्रिया घटित हो रही है वह है समाजवादी पार्टी का अपने को सशक्त बनाने का प्रयास। यह प्रयास दो स्तरों पर हो रहा है- पहला, आधारतल पर अपने से अलग हो रहे सामाजिक समूहों को जोड़ने का प्रयास। दूसरा, अपनी छवि बेहतर बनाने की कोशिश। दर्जा प्राप्त मंत्रियों को हटाना इसी दिशा में एक कदम है।
इसके अलावा सांप्रदायिक तनाव में भी कमी आई है। यदि वह 2017 के चुनाव से पहले आधारतल से सामुदायिक नेताओं का एक बड़ा वर्ग विकसित कर लेती है, तो भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की महत्ता कायम रहेगी एवं गैर भाजपा विपक्ष मजबूत होगा। देखना है कि इस परिदृश्य में कांग्रेस कितना अपने को पुनः संगठित कर पाती है।