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मोदी और राहुल के बीच अगला चुनाव

Thu, 20 Dec 2012 10:37 PM IST
नीरजा चौधरी
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दो राज्यों-गुजरात एवं हिमाचल प्रदेश के जो चुनावी नतीजे आए हैं, उसका भाजपा और कांग्रेस की राजनीति पर तो असर पड़ेगा ही, राष्ट्रीय राजनीति पर भी व्यापक असर पड़ने वाला है, खासकर अगले लोकसभा चुनाव के संदर्भ में। गुजरात में नरेंद्र मोदी की जीत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह राष्ट्रीय राजनीति में जरूर आएंगे। बेशक इससे भाजपा में अंदरूनी कलह तेज होगी और राष्ट्रीय स्तर के नेता ही सबसे पहले उनकी राह में बाधाएं खड़ी करना चाहेंगे।
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लेकिन गडकरी के विरोधी एवं संघ परिवार मोदी के पक्ष में राष्ट्रीय स्तर पर माहौल बनाएंगे। अब यह भी देखने वाली बात होगी कि नितिन गडकरी को दोबारा पार्टी अध्यक्ष चुना जाएगा या नहीं। मोदी और गडकरी में हालांकि पटती नहीं है, पर मोदी के लिए नितिन गडकरी का अध्यक्ष बनना ही बेहतर होगा। हो सकता है कि दोनों के बीच सुलह-सफाई के लिए संघ परिवार कोई रास्ता तलाशे।

जहां तक राष्ट्रीय राजनीति की बात है, तो अगला लोकसभा चुनाव मोदी बनाम राहुल का ही होगा। तीसरे मोर्चे की जो संभावना जताई जा रही थी, उसे गुजरात एवं हिमाचल के नतीजों ने झटका दिया है। 2014 के चुनाव में राजनीति का ध्रुवीकरण हो सकता है और शहरी मध्यवर्ग का झुकाव भाजपा के पक्ष में हो सकता है।
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अगले वर्ष कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस लिहाज से इन नतीजों का स्पष्ट संदेश है कि किसी भी राज्य में जीत के लिए दमदार नेता का होना जरूरी है। गुजरात में मोदी के नेतृत्व में भाजपा और हिमाचल में वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की जीत ने इसे स्पष्ट कर दिया है। गुजरात में कांग्रेस के पास नरेंद्र मोदी की टक्कर का कोई नेता ही नहीं था। वैसे भी कांग्रेस वहां पिछले एक वर्ष से चुनाव की तैयारी कर रही थी, लेकिन जीतने के लिए नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी से लड़ने के लिए।

कांग्रेस ने जिस नेता को गुजरात की कमान सौंपी थी, वह खुद ही हार गया। गुजरात में कांग्रेस को पहले से ज्यादा सीटें मिलीं और हिमाचल प्रदेश में वह स्पष्ट बहुमत में आई, इससे उसे थोड़ी राहत जरूर मिलेगी। यह कांग्रेसी नेताओं का मनोबल बढ़ाएगा, लेकिन आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के लिए चुनौतियां कम नहीं हैं। कांग्रेस को अन्य राज्यों में भी दमदार नेता की तलाश करनी पड़ेगी। यह कहना सही नहीं होगा कि कांग्रेस के आर्थिक सुधारों की मुहिम को जनता ने हरी झंडी दे दी है। आर्थिक सुधार के मुद्दे पर कोई चुनाव नहीं होता, अगर ऐसा होता, तो नरसिंह राव की सरकार नहीं हारती।

जहां तक हिमाचल की बात है, तो भ्रष्टाचार और महंगाई को लेकर कांग्रेस के खिलाफ जो राष्ट्रीय भावना बताई जा रही थी, वहां की धूमल सरकार उसका फायदा नहीं उठा पाई। ऐसा लगता है कि वहां की जनता ने स्थानीय मुद्दों के आधार पर मतदान किया। दोनों राष्ट्रीय दलों के नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने इसे कोई मुद्दा ही नहीं रहने दिया। लेकिन एक बात को लेकर हैरानी हो रही है कि महंगाई के मुद्दे ने भी चुनावी नतीजे को प्रभावित नहीं किया।

रसोई गैस महंगा होने से सबसे ज्यादा प्रभावित गृहिणियां हुई हैं और हिमाचल प्रदेश में महिलाएं खूब वोट देती हैं। इसलिए लगता था कि रसोई गैस का मुद्दा वहां भाजपा को फायदा पहुंचाएगा, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से ऐसा नहीं हुआ। वास्तव में हिमाचल में धूमल सरकार को सत्ता विरोधी रुझान से भी खासा नुकसान हुआ।

पिछले कुछ चुनावों से देखा जा रहा है कि वहां की जनता हर पांच साल बाद सरकार बदल देती है, वही इस बार भी हुआ। इसके अलावा भाजपा की अंदरूनी लड़ाइयों ने भी बात बिगाड़ी। कई लोग टिकट बंटवारे में मनमानी के चलते बागी हो गए। प्रेम कुमार धूमल एवं शांता कुमार के बीच का मतभेद भी जग जाहिर था। अंदरूनी झगड़ा तो कांग्रेस में भी था, लेकिन वीरभद्र सिंह के मुकाबले उनके विरोधी उतने जनाधार वाले नहीं थे, इसलिए कांग्रेस को उसका ज्यादा नुकसान नहीं हुआ।
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