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जंग का नया मोर्चा: यूरोप और भारत का 80% व्यापार लाल सागर के रास्ते; सऊदी समर्थित हूती विरोधी सैन्य अभियान अहम

Tue, 06 Oct 2026 04:27 AM IST
न्यूज डेस्क अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

यूरोप के साथ भारत का लगभग 80 फीसदी व्यापार लाल सागर के रास्ते होता है, जहां हूतियों के हमलों और तनाव के कारण जहाजों को अफ्रीका के लंबे रास्ते से गुजरना पड़ता है। हूती विद्रोहियों के खिलाफ एक बड़े सैन्य अभियान की शुरुआत से क्षेत्रीय अस्थिरता के बढ़ने की आशंका के साथ युद्ध का नया मोर्चा खुलने की आशंका है।
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पश्चिम एशिया में जंग का नया मोर्चा खुलने की आशंका - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
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सऊदी अरब समर्थित यमन की सरकार द्वारा ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के खिलाफ एक बड़े सैन्य अभियान की शुरुआत से क्षेत्रीय अस्थिरता के बढ़ने की आशंका के साथ अमेरिका-इस्राइल और ईरान के बीच चल रहे व्यापक संघर्ष में एक नया मोर्चा खुलने का खतरा भी पैदा हो गया है। इस सैन्य अभियान में अमेरिका के 200 से ज्यादा खुफिया और सैन्य विश्लेषक यमन की मदद कर रहे हैं, वहीं सऊदी अरब हवाई सुरक्षा और हमलों में यमन सरकार का साथ दे रहा है।

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दरअसल, पिछले कुछ दिनों से हूतियों ने यमन के पश्चिमी तट पर रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कई पहाड़ियों पर कब्जा कर लिया है, जो उन्हेंे मजबूती देता है, क्योंकि इससे किसी भी सैन्य कार्रवाई का सामना करना उनके लिए आसान हो जाता है। अब, जबकि यमन ने हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू कर दिया है, तो इस बात की उम्मीद बढ़ी है कि बाब अल-मंदेब का समुद्री मार्ग फिर से सुरक्षित हो सकता है, जहां से दुनिया का करीब 12 फीसदी तेल गुजरता है।

लाल सागर और अदन की खाड़ी को जोड़ने वाले इस अहम समुद्री व्यापारिक मार्ग की अहमियत होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव से और बढ़ गई है। यमन पहले ही पिछले बारह वर्षों से हूतियों के चलते गंभीर मानवीय संकट झेल रहा है और देश का बुनियादी ढांचा क्षतिग्रस्त हो चुका है। अगस्त से अब तक 800 से ज्यादा लोग मारे गए हैं और करीब डेढ़ लाख लोग विस्थापित हो चुके हैं।
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कुछ इलाकों में तो हर चार में से तीन परिवारों को पर्याप्त खाना नहीं मिल रहा। ऐसे में, अगर सैन्य अभियान लंबा चला, तो यमन में भूख और विस्थापन का संकट और बढ़ सकता है। दरअसल, सऊदी समर्थित यमन सरकार का यह कदम क्षेत्र में शक्ति संतुलन बदलने का प्रयास है, लेकिन इसमें पश्चिम एशिया के और अधिक अस्थिर बनने का जोखिम भी छिपा है।

इतिहास गवाह है कि ऐसे अभियान अक्सर लंबे और खूनी संघर्ष में बदल जाते हैं। ऐसे में, अब जरूरत है संयम, कूटनीति और मानवीय दृष्टिकोण की। अन्यथा, यमन की यह नई लड़ाई पूरे क्षेत्र को आग की लपटों में झोंक सकती है। क्षेत्र में दीर्घकालीन शांति के लिए संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आगे आना चाहिए।

जहां तक भारत की बात है, तो यूरोप के साथ भारत का लगभग 80 फीसदी व्यापार लाल सागर के रास्ते होता है, जहां हूतियों के हमलों और तनाव के कारण जहाजों को अफ्रीका के लंबे रास्ते से गुजरना पड़ता है, जिससे माल ढुलाई की लागत बढ़ जाती है। ऐसे में, अगर इस सैन्य अभियान से यह मार्ग फिर से सुरक्षित हो जाता है, तो यह भारत सहित वैश्विक व्यापार के व्यापक हित में ही होगा। 

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