साधो, दिल्ली वालों को प्याज इन दिनों रुला रहा है। कांग्रेस डर रही है कि इतिहास कहीं खुद को दोहरा न दे। इसलिए सरकार गली-गली सस्ता प्याज बेचने पर आमादा है। राजधानी में हर तरफ से आवाज आ रही है, प्याज ले लो। सरकारी प्याज। कम रुलाने वाला प्याज।
प्याज अब दो तरह का होता है। एक दुकानों पर बिकने वाला महंगा प्याज और दूसरा वह, जिसे सरकारें कम दामों पर बेचती हैं। महंगा प्याज ग्राहक को अधिक रुलाता है। सरकारी प्याज काटने पर उतने आंसू नहीं निकलते। पर महंगे प्याज खरीदने का एक लाभ यह भी है कि इसके काटने से बहने वाले आंसुओं की धार से आंखें निर्मल हो जाती हैं, उनमें मोतियाबिंद नहीं होता।
अलबत्ता सरकारें अपने प्याजी अभियानों से जो कुछ कर रही हैं, उसके अच्छे नतीजे निकलते दिखाई नहीं देते। वह कहती है कि नया मुल्ला...ऊंह नया वोटर प्याज अधिक खाता है, जिसके चलते मंडियों में प्याज की कमी हो गई है।
विपक्ष प्याज के अभाव में इन दिनों कई फायदे देख रहा है। जैसे, जब प्याज नहीं मिलेगा, तो निजाम बदल जाएगा। दुनिया में दूसरा कोई मुल्क नहीं, जहां प्याज इतना बड़ा मुद्दा बन जाए। प्याज के साथ मुश्किल यह है कि इसे शाकाहारी और मांसाहारी, दोनों खाते हैं। अक्सर अखबारों में प्याज के लाभकारी गुणों की चर्चा की जाती है। सरकार को इस मामले में दूरंदेशी दिखाकर प्याज से होने वाले फायदों की खबरें छापने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। लोगों को बताना चाहिए कि बरसात के मौसम में चाय के साथ प्याज की पकौड़ियां खाने से गैस्ट्रिक की समस्या बढ़ जाती है।
रसोई में प्याज का होना ही इन दिनों मेरा दिल दुखा देता है। देश की बड़ी आबादी को दो वक्त का भोजन नसीब नहीं होता। ऐसे में महंगा प्याज खाना देशद्रोह है। देश के प्रति भक्ति जताने के लिए हमें प्याज के इस्तेमाल पर बंदिश लगा देनी चाहिए। सरकार के पक्षधर मेरे एक मित्र कहते हैं कि सांप का काटा तो फिर भी बच सकता है, लेकिन प्याज के काटे को राहत कहां!
खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। पर अब तो प्याज को देखकर प्याज भी रंग बदलने लगा है। जब दिल्ली में प्याज महंगा होता है, तो दूसरे शहरों में भी प्याज कम कीमत पर बिकने से इनकार कर देता है।
खबर है कि इन दिनों दिल्ली से बाहर सब्जी बेचने वाले प्याज की धमकियों से बुरी तरह परेशान हैं।