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दोस्ती का नया त्रिकोण है चुनौती

Wed, 29 Apr 2015 08:16 PM IST
मारूफ रजा
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अफगानिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मद अशरफ गनी चीन और पाकिस्तान की अपनी यात्रा के कुछ महीनों के बाद भारत आए। हालांकि चीन या पाकिस्तान ने अफगानिस्तान को उस किस्म की मदद नहीं की है, जितनी कि भारत ने पिछले दस वर्षों में की है। भारत अब तक उसे दो अरब अमेरिकी डॉलर के बराबर की सहायता कर चुका है, जिससे वहां न सिर्फ अस्पताल, स्कूल, सड़क आदि बने, बल्कि संसद भवन का भी निर्माण हुआ है। बावजूद इसके अगर गनी चीन और पाकिस्तान की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं, तो इसकी वजह है। असल में, अफगानिस्तान की सहायता करने को लेकर पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह की सरकार भले ही अपनी पीठ थपथपाती हो, मगर अमेरिकी और नाटो फौज की वापसी की प्रक्रिया में जिस तरह वहां आतंकवादी खतरे बढ़े हैं, उसे देखते हुए अफगानिस्तान की नई सरकार को यह लग रहा है कि भारत जितनी मदद कर सकता है, वह कर चुका।
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अफगानिस्तान अब पाकिस्तान की मदद ले रहा है, क्योंकि पिछले दिसंबर में तालिबान द्वारा पेशावर में आर्मी स्कूल पर किए गए हमले के बाद स्थिति बदल गई है। जबकि यह पाकिस्तान ही था, जिसने अमेरिकी फौजों के हमलों से तालिबान को बचाया है। अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर छिपने की जगह से लेकर पाकिस्तान ने तालिबान को अपने यहां शरण भी दी है। मगर जब उसी तालिबान ने पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों के बच्चों को निशाना बनाया, तो हालात बदल गए। आनन-फानन में जनरल राहील शरीफ काबुल गए और वहां दो दिनों तक गनी सरकार के साथ इस मुद्दे पर मंथन किया कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान मिलकर कैसे तालिबान का अंत कर सकते हैं।

लिहाजा एक समझदारी दिखाते हुए अफगानिस्तान के नए राष्ट्रपति ने यह रणनीति बनाई कि वह पाकिस्तान के साथ मिलकर तालिबान और अफगानिस्तान के अन्य आतंकी समूहों का सामना करेंगे। वैसे सच यह भी है कि पाकिस्तान में ऐसी ताकतें हैं, जो हरसंभव कोशिश करती हैं कि अफगानिस्तान में भारत की पहुंच पाकिस्तान से ज्यादा या उसके बराबर कभी न हो। इसलिए वे कभी काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर हमले करवाती हैं, तो कभी भारतीय मजदूरों पर। जब प्रधानमंत्री मोदी शपथ ले रहे थे, तो उसी समय अफगानिस्तान के हेरात में भारतीय वाणिज्य दूतावास पर हमला हुआ। यह हमला इसलिए किया गया, ताकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भारत के साथ अपने रिश्ते बेहतर न बना पाएं। यह खुलासा खुद अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई ने किया है।
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पाकिस्तान का यह हौसला चीन की सरकार ने भी बढ़ाया है। बीजिंग नहीं चाहता कि भारत दक्षेस से बाहर निकलकर एशिया में बड़ी भूमिका निभाए। इसलिए वह भारत को पाकिस्तान के साथ उलझाना चाहता है। पिछले हफ्ते चीन के राष्ट्रपति का पाकिस्तान प्रवास के दौरान 46 अरब अमेरिकी डॉलर के समझौतों पर हस्ताक्षर करने के पीछे भी कुछ ऐसी ही मंशा है। पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल करते हुए चीन अरब सागर तक रास्ता बनाना चाहता है, ताकि अरब देशों से आ रहे तेल को वह ग्वादर बंदरगाह के जरिये अपने शिनजियांग प्रांत तक ले आए। इसके अतिरिक्त अमेरिका के अफगानिस्तान से निकलने के बाद वह काबुल पर भी अपना दबदबा बढ़ाना चाहता है, इसलिए वह पाकिस्तान को बम, मिसाइल और परमाणु तकनीक दे रहा है, ताकि इस्लामाबाद भारत को उलझाए रखे। बीजिंग अफगानिस्तान में इसलिए भी स्थायित्व चाहता है, क्योंकि वहां तीस खरब अमेरिकी डॉलर के मूल्य के बराबर खनिज पदार्थ हैं, जिस पर चीन ने कब्जा जमाना शुरू कर दिया है।

ऐसे में सवाल यही है कि इन हालात को देखते हुए अमेरिका ने वहां क्या किया है, और वह क्या कर सकता है? अमेरिका अब तक अफगानिस्तान में 600 अरब डॉलर से अधिक की पूंजी खर्च कर चुका है। उसने वहां अपना पैसा, खून और पसीना बहाया है। फिर भी वह वहां सफल नहीं हो सका। स्थिति यह रही कि राष्ट्रपति बराक ओबामा ने गारंटीड ग्लोबल फंड बनाने की बात कही, ताकि अफगानिस्तान को हर वर्ष विकास के लिए पांच अरब अमेरिकी डॉलर की मदद मिल सके और वह स्थायित्व की तरफ बढ़ सके। मगर ऐसा नहीं हो सका। इतना ही नहीं, ओबामा की यह योजना भी परवान नहीं चढ़ सकी कि अमेरिका के जाने के बाद अफगानिस्तान की सेना और पुलिस की इतनी ट्रेनिंग हो कि वे खुद देश की सुरक्षा कर सकें। इसलिए अफगानिस्तान की सरकार ने भारत से हमेशा यह अनुरोध किया कि वह उन्हें हथियार और सैन्य मदद दे, ताकि वह अपने पांव पर खड़ा हो सके। मगर कई बार वायदे करने के बाद भी जब भारत उदासीन रहा, तो अमेरिका और भारत द्वारा पूरी नहीं की जा रही कमी की भरपाई के लिए अफगानिस्तान ने चीन और पाकिस्तान की तरफ देखना शुरू किया।

ऐसे में यह कहना गलत नहीं कि भविष्य में अफगानिस्तान में जो हालात बनेंगे, उसमें अमेरिका या भारत के अलावा बड़ी भूमिका चीन और पाकिस्तान की रहेगी। इसके अलावा रूस की नजर भी अफगानिस्तान पर है, क्योंकि मास्को नहीं चाहता कि वहां की आतंकी लड़ाइयों की आग कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान जैसे उसके सहयोगियों तक पहुंचे। उसे इन क्षेत्रों में चेचन्या जैसे हालात बनने का डर सता रहा है। अपने यहां दिक्कत यह है कि साउथ ब्लॉक में अब भी कई ऐसे कूटनीतिज्ञ हैं, जो समझते हैं कि कूटनीति पुराने रिश्तों पर ही चलेगी। वे इस उम्मीद में बैठे हैं कि अफगानिस्तान अपनी जमीनी हकीकत को नजरंदाज करके भी भारत के भरोसे ही चलेगा। मगर उन्हें समझना चाहिए कि अफगानिस्तान अपना रुख बदल रहा है, तो इसकी वजह यही है कि उसे पाकिस्तान और चीन से ही वहां की आग बुझने की उम्मीद दिख रही है; फिर भले ही यह आग उन्हीं देशों ने क्यों न लगाई हो।
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-लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं
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