कश्मीर में आतंकवाद तीन दशक के बाद अब एक नए चरण में आ गया है। इसे अलगाववाद की राजनीति और उसके आतंकवादी ढांचे के आमूल परिवर्तन के रूप में देखा जाना चाहिए। अब लगता है कि यह भारत से आजादी या कश्मीर के पाकिस्तान में विलय अथवा फिर से स्वायत्तता पाने की लड़ाई न रहकर अब खुल्लम-खुल्ला जिहाद बन गया है। कुछ समय पहले हिजबुल मुजाहिद्दीन के पूर्व आतंकवादी और बुरहान वानी के उत्तराधिकारी जाकिर मूसा ने घोषणा की थी कि हुर्रियत के सैय्यद अली शाह गिलानी सहित जो कोई भी अलगाववादी नेता कश्मीर को राजनीतिक समस्या कहेगा, उसका सर कलम कर दिया जाएगा, क्योंकि कश्मीर सीधे तौर पर इस्लामी जिहाद है। इसके तुरंत बाद जाकिर मूसा को हिजबुल मुजाहिद्दीन से निकाल दिया गया था। फिर जाकिर मूसा ने अंसार गज्वत- उल- हिंद नामक जिहादी संगठन बनाया और कश्मीर में जिहाद के नए चरण की दस्तक दी। यह हिंसा का नया दौर है, जिसके तहत कश्मीर में ईराक जैसे हालात बनाने की तैयारी है ताकि कश्मीर खिलाफत का हिस्सा बने।
कश्मीर से बाहर समूचे जम्मू प्रांत में जो धार्मिक आधार पर आबादी के अनुपात को बदलने की बात उठ रही है, उसे भी इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। इस तरह रोहिंग्या आबादी को जिस पैमाने पर जम्मू में बसाया गया, उन्हें हुर्रियत के नेताओं तक ने कश्मीर में न आने देने की बात तो की, लेकिन उन्हें जम्मू में बसाने और सुरक्षा देने का उनका आग्रह रहा। जबकि जम्मू-कश्मीर में धारा 370 के रहते अन्य राज्यों के किसी भी नागरिक को रहने की सांविधानिक इजाजत नहीं है। फिर उन्हें जम्मू में ही बसाने का आग्रह क्यों रहा है? अब तो उनकी उपस्थिति लद्दाख क्षेत्र में भी दर्ज हो चुकी है।
कुल मिलाकर देखें, तो स्वायत्तता की मांग या 1953 से पूर्व की सांविधानिक स्थिति की मांग, जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की धर्म आधारित आजादी की मांग या जमाते इस्लामी की पाकिस्तान में विलय की मांगें दरकिनार होती दिख रही हैं। अभी हाल ही में चौदह साल के एक हथियारबंद बाल आतंकवादी का सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारा जाना कोई साधारण घटना नहीं है। इस पर पीपुल्स कांफ्रेंस के नेता और पूर्व आतंकवादी सज्जाद लोन का यह कहना कि कश्मीरी अवाम को इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए कि हम कहां से कहां पहुंच रहे हैं।
रही बात इन आतंकवादियों को नायक बना दिए जाने की प्रवृत्ति की, तो इसे समझने के लिए पाकिस्तान की नई रणनीति के साथ ही अपने यहां की केंद्र सरकारों के लचर रवैये को समझना होगा। यदि राज्य सरकार और केंद्र सरकारें विगत छह-सात साल से इन आतंकवादियों के सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे जाने पर हजारों लोगों को उनके जनाजे में भाग लेने की छूट नहीं देतीं, तो नए-नए आतंकवादियों के दृश्यपटल पर उभरने की नौबत नहीं आती। इसके साथ ही सोशल मीडिया का आतंकवादियों द्वारा उपयोग भी इसके लिए जिम्मेदार है। पाकिस्तान और स्थानीय अलगाववादियों की यह नीति कि आतंकवादियों के मारे जाने पर नमाजे जनाजा पढ़ने के लिए लोगों का आह्वान करना तथा पत्थरबाजों को सिविलियन कहकर प्रोत्साहित करना भी इनके नायक बनने के कारक तत्व हैं। दिल्ली के कुछ बुद्धिजीवी और मानवाधिकारवादी ग्रुप भी जिस तरह भारतीय सेना को बदनाम करने में लगी है, उससे भी जिहादियों के नायक बनने की पृष्ठभूमि तैयार होती है। राजनीतिक पार्टियों का ऐसे हालात को अपने हित में भुनाना भी घातक सिद्ध हो रहा है।
केंद्र सरकारें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में आतंकवादी शिविरों को बंद कराने में राजनयिक और कूटनीतिक स्तर पर वांछित सफलता नहीं पा सकीं। सस्ती लोकप्रियता और तुष्टीकरण की राजनीति के चलते पूर्व यूपीए सरकार के दौरान कारवाने-अमन नाम से व्यापार और आवाजाही के लिए जो रास्ता खोला गया, तब भी इस तथ्य की अनदेखी की गई कि उसी पीओके में ये आतंकवादी शिविर सक्रिय थे। केंद्र सरकार और राज्य सरकार, दोनों ने देश को गुमराह किया कि इससे विभाजन के समय बिछड़े परिवार एक-दूसरे से मिलेंगे। जबकि तथ्य यह था कि ऐसे परिवार कश्मीर घाटी की तुलना में जम्मू प्रांत में पुंछ और रजौरी में ज्यादा थे। इसके अलावा आंकड़ों की क्षुद्र राजनीति का दौर शुरू हुआ, जैसे कि हमेशा एकतरफा सच कहा गया कि वर्षवार कितने आतंकवादी मारे गए, यह नहीं बताया गया कि आतंकवादियों ने कितने ज्यादा हमले सुरक्षा बलों की छावनियों पर किए।
2014 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार के दौरान घाटी में जितने भी सैनिक ठिकाने या छावनियां थीं, उन्हें हटाने का जो सिलसिला शुरू हुआ, उससे भी आतंकियों, उनके समर्थकों और उनके पाकिस्तानी आकाओं के हौसले बुलंद हुए। जैसे श्रीनगर के इलाके में टट्टू ग्राउंड से सेना हटाए जाने के बाद ऐसी खाली जगहों पर अमन पार्क नामक जो बोर्ड लगाए गए, उसे अलगाववादियों ने अपनी जीत के रूप में पेश किया। इसे पीडीपी सरकार के उस एजेंडे के हिस्से के रूप में देखा गया, जिसे वे डिमिलिट्राइजेशन कहते हैं। उत्तरी सीमांत पर जहां दो-दो शत्रु देश आपकी सीमा पर ताक में हैं, वहां डिमिलिट्राइजेशन का नारा देना कितना खतरनाक है। इसके साथ ही पोरस बॉर्डर (जहां कोई रोक-टोक न हो), अनेक विधानसभाओं की स्थापना, सेल्फ रूल और जॉइंट कंट्रोल की मांग वाली पीडीपी के साथ भाजपा का सरकार में शामिल होना जहां लद्दाख और जम्मू के देशभक्त समुदाय के लिए झटका था, वहीं कश्मीर की अवाम ने इसे पीडीपी की गद्दारी के रूप में देखा। उनकी दृष्टि में पीडीपी ने भाजपा के विरूद्ध चुनाव में अभियान चलाया था और फिर उन्हीं के साथ गठबंधन कर भाजपा का घाटी में प्रवेश कराया, जिसे वहां की अवाम ने अपने लिए आघात समझा। इसके अलावे जम्मू-कश्मीर में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा न सिर्फ कांग्रेस के रूप में दिखी, बल्कि कांग्रेस को पीछे छोड़ने की होड़ में भी जी-जान से लगी दिखी। आज कश्मीर की हालत देखकर लगता है कि इसे लगभग 'एब्डिकेशन' (छोड़ने) के मोड़ तक पहुंचने दिया गया है। आम लोग सैंकड़ों की संख्या में घाटी में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ होने पर सुरक्षा बलों पर जानलेवा पत्थरबाजी करते हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों में सुरक्षाबलों की कार्रवाई में यदि आतंकवादियों के ये समर्थक घायल होते हैं या दुर्भाग्य से गोली लगने से कहीं मरते हैं, तो इसे मानवाधिकारों का हनन घोषित किया जाता है। केंद्र को इस जिहादी चरण को हल्के में नहीं लेना चाहिए और इससे निपटने के लिए नई रणनीति बनानी चाहिए तथा लद्दाख, जम्मू सहित सभी लोगों से संवाद करने की ऐसी सच्ची पहल करनी चाहिए, जिसके दूरगामी परिणाम हों।
-कश्मीर से निर्वासित प्रतिष्ठित हिंदी कवि और विचारक