सोशल मीडिया अब नए नागरिक पैदा कर रहा है। ये जागरूक हैं और अपनी सक्रियता से दूसरों को भी जागरूक कर रहे हैं। ये किसी मुद्दे को लेकर अजीब-सी एकता को जन्म देते हैं, जिसमें जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र जैसे बंधन टूट जाते हैं। यहां पर सभी एक साथ बात करते हैं। अपने विचार रखते हैं। अंदर के गुस्से को प्रकट करते हैं। फिर सड़कों पर भी उतर जाते हैं। इन्हें एकजुट करने के लिए किसी संगठन की जरूरत नहीं है।
यह अच्छी बात है। इन नए क्रांतिकारी नागरिकों की एकजुटता का आधार संवेदनशील और जिंदगी से जुड़े मुद्दे हैं। यह एक बदलाव की आहट है, जिसके नतीजे दिखने शुरू हो गए हैं और वक्त के साथ इसके व्यापक नतीजे सामने आते रहेंगे। सोशल मीडिया की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा इन माध्यमों के जरिये लोगों से जुड़े हुए हैं। अब वक्त आ गया है कि हमारे देश में भी जनता और शासक के बीच की दूरी खत्म हो। इस दिशा में हम कुछ कदम आगे भी बढ़े हैं। उमर अब्दुल्ला, शशि थरूर जैसे कई नेताओं से आज लोग ट्वीटर के जरिये जुड़ सकते हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि इस साल में यह सूची और लंबी होगी।
सवाल यह भी उठे हैं कि सोशल मीडिया की मौजूदगी क्या इंटरनेट पर बैठकर क्रांति की बात करने तक ही तो सीमित नहीं है, क्योंकि किसी क्रांति के लिए आक्रोश के साथ-साथ दृढ़निश्चय और धैर्य की भी जरूरत होती है। पर अन्ना हजारे के आंदोलन से लेकर दिल्ली की ताजा घटना के मामले में देखें, तो हम पाएंगे कि लोग सिर्फ ट्वीट या पोस्ट तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि सड़कों पर उतरकर लाठियां भी खाईं।
अहम बात यह है कि अब अनेक खबरें सोशल मीडिया के जरिये हमें मिलती हैं। जैसे दिल्ली में प्रदर्शनों को लेकर कांग्रेस सांसद अभिजीत मुखर्जी के बयान को यू ट्यूब पर डाउनलोड कर दिया गया था, जिसे बाद में मीडिया ने उठाया, तो उन्हें माफी मांगनी पड़ी। इससे यह स्पष्ट है कि अब अगर आप यह सोचते हैं कि कहीं भी, कभी भी और कुछ भी बोल देंगे और लोग गौर नहीं करेंगे, तो यह एक भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं है।
मीडिया नए नागरिक की सक्रियता की एक बड़ी वजह है। टेलीविजन पर किसी खबर को जब लगातार फॉलो किया जाता है, तो लोग सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हो जाते हैं। इसी तरह विभिन्न वजहों से मीडिया जब कुछ मुद्दों को ज्यादा कवरेज नहीं दे पाता, तो सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग उन्हें एक व्यापक आकार दे देते हैं। दरअसल, 24 घंटे संचार के युग में लोगों को हमारे शासकों की चुप्पी चुभती है। किसी भी मामले पर जब लोग लगातार बात कर रहे हों और शासक वर्ग चुप हो, तो लोगों का आक्रोश फूट पड़ना स्वाभाविक है।
ऐसा नहीं है कि छोटे शहरों और कस्बों में सोशल मीडिया की पहुंच नहीं है। वहां भी यह लगातार बढ़ रहा है। वहां लोग साइबर कैफे में भी बैठकर फेसबुक से जुड़ते हैं। इसके अलावा अब तो मोबाइल में भी ये सुविधाएं मिलने लगी हैं। जाहिर है ये सब नेटीजेन को पहले से ज्यादा सक्रिय कर देगा। विचारों और निर्णय को प्रभावित करने में फेसबुक, ट्वीटर जैसे माध्यमों की अहम भूमिका अब स्पष्ट हो चुकी है।
आने वाले चुनावों में शहरी और अर्धशहरी इलाकों में इसका असर दिख सकता है। मेरा मानना है कि इन क्षेत्रों में चुनावों के दौरान अगर किसी नेता के खिलाफ सोशल मीडिया में अभियान चल गया, तो उसके सामने मुश्किलें आनी तय हैं। फिर भी इस चिंगारी के खतरे भी कम नहीं हैं। कुछ लोग विचार रखते हुए अपना संयम खो देते हैं। अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं। यह खतरनाक है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होनी चाहिए। हम सेंसरशिप के बिल्कुल खिलाफ हैं। पर इसका मतलब यह नहीं कि कुछ भी टिप्पणी कर दें। इसका सबसे बड़ा खतरा यह है कि किसी लड़ाई में अगर संयम खो देंगे, तो लक्ष्य तक पहुंचना बेहद कठिन हो सकता है।