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नए भारत का नया कश्मीर : वह बहुत धीमे से कुछ यों निष्प्रभावी हो गया

तरुण विजय Published by: तरुण विजय Updated Thu, 08 Aug 2019 01:16 AM IST
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अमित शाह - फोटो : a

संभवतः 1947 के बाद के इतिहास में पांच अगस्त, 2019 अपने विशेष महत्व और युगांतकारी प्रभाव के कारण एक विशेष तिथि बन गई है। जिस अनुच्छेद 370 को हटाना असंभव और अकल्पनीय माना जा रहा था, वह बहुत धीमे से कुछ यों निष्प्रभावी हो गया, मानो वैष्णो देवी मंदिर में अर्चना का कोई नया नियम बन रहा हो। भारत के साथ जम्मू-कश्मीर की निर्द्वंद्व, निष्कंटक और असंदिग्ध एकता में यदि कोई एक बाधा सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी थी, तो वह अनुच्छेद 370 था।

अनुच्छेद 370 वास्तव में पाकिस्तान समर्थक अलगाववादियों का रक्षा कवच और वहां रहने वाले गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए दिन-रात प्राण सुखाने वाला प्रावधान था। जिसके कारण कश्मीर के मूल निवासी लाखों की संख्या में अपनी जड़ों, अपनी भाषा, अपने संसार से उखाड़ फेंककर शरणार्थी बना दिए गए। अनुच्छेद 370 ने हर आतंकवादी का मनोबल बढ़ाया और तिरंगे के लिए जीने-मरने वाले हर देशभक्त को अपने ही देश में बेगाना, विदेशी और अनामंत्रित बोझ बना दिया।



अनुच्छेद 370 कश्मीर के भारत में न रहने, कभी भारत से संबंध न होने और भारत से अलग होने की व्याख्या बन गया था। जब कभी किसी को अलगाववादियों के समर्थन में तथा भारतीय राष्ट्रीयता के विरुद्ध 'आजादी' के नारे लगाने होते थे, तो अनुच्छेद 370 का उल्लेख किया जाता था कि देखो, तुम्हीं लोगों ने अपनी ही संसद में हमें अलग संविधान और अलग झंडे का पात्र समझा।

हम अलग थे, इसलिए तो तुमने अलग माना। हम भारत के अन्य प्रांतों की तरह कोई प्रांत नहीं हैं और कभी थे भी नहीं। यह स्वतंत्र भारत के ही पंडित नेहरू जैसे नेताओं ने स्वीकार करके हमें अनुच्छेद 370 के अंतर्गत रखा।

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अमित शाह - फोटो : a
संभवतः 1947 के बाद के इतिहास में पांच अगस्त, 2019 अपने विशेष महत्व और युगांतकारी प्रभाव के कारण एक विशेष तिथि बन गई है। जिस अनुच्छेद 370 को हटाना असंभव और अकल्पनीय माना जा रहा था, वह बहुत धीमे से कुछ यों निष्प्रभावी हो गया, मानो वैष्णो देवी मंदिर में अर्चना का कोई नया नियम बन रहा हो। भारत के साथ जम्मू-कश्मीर की निर्द्वंद्व, निष्कंटक और असंदिग्ध एकता में यदि कोई एक बाधा सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी थी, तो वह अनुच्छेद 370 था।

अनुच्छेद 370 वास्तव में पाकिस्तान समर्थक अलगाववादियों का रक्षा कवच और वहां रहने वाले गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए दिन-रात प्राण सुखाने वाला प्रावधान था। जिसके कारण कश्मीर के मूल निवासी लाखों की संख्या में अपनी जड़ों, अपनी भाषा, अपने संसार से उखाड़ फेंककर शरणार्थी बना दिए गए। अनुच्छेद 370 ने हर आतंकवादी का मनोबल बढ़ाया और तिरंगे के लिए जीने-मरने वाले हर देशभक्त को अपने ही देश में बेगाना, विदेशी और अनामंत्रित बोझ बना दिया।

अनुच्छेद 370 कश्मीर के भारत में न रहने, कभी भारत से संबंध न होने और भारत से अलग होने की व्याख्या बन गया था। जब कभी किसी को अलगाववादियों के समर्थन में तथा भारतीय राष्ट्रीयता के विरुद्ध 'आजादी' के नारे लगाने होते थे, तो अनुच्छेद 370 का उल्लेख किया जाता था कि देखो, तुम्हीं लोगों ने अपनी ही संसद में हमें अलग संविधान और अलग झंडे का पात्र समझा।

हम अलग थे, इसलिए तो तुमने अलग माना। हम भारत के अन्य प्रांतों की तरह कोई प्रांत नहीं हैं और कभी थे भी नहीं। यह स्वतंत्र भारत के ही पंडित नेहरू जैसे नेताओं ने स्वीकार करके हमें अनुच्छेद 370 के अंतर्गत रखा।

इन बातों का जवाब देने में भारतीय राष्ट्रीयता में विश्वास रखने वाले देशभक्तों को, चाहे वे किसी भी पार्टी, विचारधारा से संबंधित क्यों न हों, बहुत परेशानी और दुविधा होती थी। कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक है-यह नारा सुनने में तो अच्छा लगता था, लेकिन कश्मीर में दो झंडे हैं, दो संविधान हैं तथा भारत का कोई भी कानून बनाए जाते समय पहली पंक्ति लिखना अनिवार्य होता था कि 'जम्मू-कश्मीर के अलावा समस्त भारत में लागू'।

यह 'जम्मू-कश्मीर के अलावा' का अर्थ क्या है-यह बताना कश्मीर के कन्याकुमारी तक का नारा लगाने वाले भारतीयों के लिए बड़ा नागवार गुजरता था। अक्तूबर,1947 में महाराजा हरि सिंह द्वारा भारत में जम्मू-कश्मीर राज्य के विलय के बाद पाकिस्तानी हमले और पंडित नेहरू द्वारा संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर का मुद्दा ले जाने की भयंकर भूल के बाद भारत के साथ विशेष स्वायत्तता की व्यवस्था के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर को रखने के लिए अनुच्छेद 370 को लागू किया गया था।

ध्यान रखना चाहिए कि उस समय भारत के कानून मंत्री डॉ. भीमराव अंबेडकर थे, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दिए जाने के लिए अनुच्छेद 370 की रचना से असहमति व्यक्त करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को कह दिया था कि वह ऐसे किसी प्रावधान का मसौदा नहीं बनाएंगे।

अंततः महाराजा हरि सिंह के पूर्व दीवान और पंडित नेहरू मंत्रिमंडल में बिना विभाग के कैबिनेट मंत्री गोपाल स्वामी अय्यंगर को यह काम सौंपा गया, जिन्होंने संविधान के खंड 21 में अस्थायी और परिवर्तनीय प्रावधानों के अंतर्गत अनुच्छेद 370 को जोड़ा।

मूलतः अनुच्छेद 370 के तहत रक्षा, मुद्रा तथा संचार के अलावा शेष सब विषय जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तशासी व्यवस्था के अंतर्गत दे दिए गए थे और वहां राज्यपाल या मुख्यमंत्री की व्यवस्था नहीं, बल्कि सदरे-रियासत (राष्ट्रपति) तथा वजीरे-आजम (प्रधानमंत्री) की व्यवस्थाएं लागू हुईं। इसी व्यवस्था के कारण किसी भी भारतीय को जम्मू-कश्मीर की सीमा में प्रवेश करने के लिए परमिट लेना पड़ता था, जो वीजा का ही प्रतिरूप था।

इसी विद्रूपता को समाप्त करने के लिए मई, 1953 में तत्कालीन जनसंघ के अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बिना परमिट कश्मीर में प्रवेश का आंदोलन किया, जो उनकी अंतिम यात्रा साबित हुई तथा लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने भाषण में कहा कि नेहरू और शेख अब्दुल्ला की दुरभिसंधि के कारण श्यामा प्रसाद मुखर्जी मार डाले गए। उसके बाद उमड़े जनाक्रोश के दबाव में पं. नेहरू को परमिट व्यवस्था रद्द करनी पड़ी और सदरे-रियासत तथा वजीरे-आजाम के पद राज्यपाल और मुख्यमंत्री में तब्दील किए गए।

अनुच्छेद 370 के आवरण में अनेक महत्वपूर्ण कानून, जैसे कि महिलाओं की समानता, पंचायती राज और आरक्षण जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं किए गए। जम्मू-कश्मीर की कोई महिला प्रदेश से बाहर विवाह कर ले, तो उसकी नागरिकता समाप्त हो जाती थी। जब 370 की दीवार ढाई है, तो नवनिर्माण होगा ही। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मंगलवार को लोकसभा में स्पष्ट कहा कि जब हम जम्मू-कश्मीर की बात करते हैं, तो उसमें पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भी है।

गिलगिट और बालटिस्तान हमारे अभिन्न अंग हैं, जिनके लिए हम जान भी दे देंगे। फरवरी, 1994 में भारतीय संसद ने जो सर्वसम्मत फैसला लिया था, उसके लिए अब रास्ता और प्रशस्त हो गया है। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का पुनर्निर्माण यानी कश्मीरी हिंदुओं की ससम्मान वापसी, आतंकवाद का मूलोच्छेद, बौद्धों और हिंदुओं से भेदभाव का अंत, विभाजन के समय आए हिंदुओं को नागरिकता देना तथा दोनों संघ शासित प्रदेशों का आर्थिक-शैक्षिक विकास मोदी-शाह की नव भारत रचना का अंग होंगे। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को गुजरात और महाराष्ट्र जैसे विकसित बनाना ही चुनौती है।

अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह के रूप में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वैचारिक सैनिकों ने भारत के अधूरेपन को ही दूर नहीं किया, बल्कि 22 फरवरी, 1994 के उस सर्वदलीय एवं सर्वसम्मत संसदीय संकल्प को पूरा करने पर भी बल दिया और उसके लिए मार्ग प्रदान किया है, जिसमें हम सबने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को वापस लेने की कसम खाई थी।

अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने से बहत्तर वर्षों के बाद भारत की सीमाओं में एकमात्र राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का लहराना संभव हो पाया है और दो झंडे, दो निष्ठा वाले लोगों को मुंह की खानी पड़ी है। यह क्षण वास्तव में राष्ट्रीयता के उल्लासपूर्ण उत्सव का क्षण है।
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