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न्यू इंडिया का नया स्वरूप : पूरी दुनिया महसूस कर रही है नए भारत का उभरता प्रभाव

बिंदू डालमिया Published by: बिंदू डालमिया Updated Sun, 06 Oct 2019 01:53 AM IST
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अमेरिका में आयोजित हाउडी मोदी कार्यक्रम का एक दृश्य (फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई

अगर दो महीनों के घटनाक्रमों पर नजर डालें, तो पता चलता है कि दुनिया में न्यू इंडिया मजबूती से उभरा है। इसे पूरी दुनिया महसूस कर रही है। कश्मीर मामले पर पाकिस्तान को अलग-थलग करना, संयुक्त राष्ट्र में मजबूती के साथ दुनिया का समर्थन हासिल करना या फिर अमेरिका के दौरे में प्रधानमंत्री का ह्यूस्टन के 'हाउदी मोदी' कार्यक्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ संबोधन हो। ऐसा लग रहा है कि पूरी दुनिया में भारत की धाक जिस तरह से जमती जा रही है, वैसी कभी नहीं देखी गई।



मोदी ने इस सभा में जब कहा, अबकी बार ट्रंप सरकार, तो हैरानी भरा जरूर रहा हो, लेकिन यह तय है कि उनका यह कदम सोचा समझा जरूर रहा होगा। तमाम असहमतियों के बाद भी जिस तरह भारत और अमेरिका के बीच एक खास रिश्ता विकसित होता जा रहा है, वह भारत को एक ऐसे देश के रूप में खड़ा कर रहा है, जो किसी का पिछलग्गू नहीं है, जिसकी अपनी विदेश नीति और अपना एक स्टैंड है।


आपको पिछली सदी में ले चलती हूं, जब देशवासी बेहतर भविष्य की उम्मीदें लिए अमेरिका जाते थे। तब भारत में कांग्रेस का शासन था। ये वह दर्द भरा समय था, जब देश गरीबी, भ्रष्टाचार और इंस्पेक्टर राज से बेहाल था। तब इसका असर विदेशों में रहने वाले भारतीयों और उनसे होने वाले बर्ताव पर भी पड़ता था। देश में तब आर्थिक घोटाले हो रहे थे और बैंकों से उधार लेने का अधिकार केवल धनी लोगों के पास था। 


प्राइवेट इंडस्ट्री का नुकसान करदाता झेलता था। सत्ता और सरकार में बैठे लोग धनवान होते जा रहे थे। अब उन लोगों की जमात साफ हो चुकी है। पहले कॉरपोरेट्स और सरकार के बीच जो लोग बिचौलियों का काम करते थे, वे भी हाशिए जा रहे हैं। मोदी के आने के बाद से इसमें लगातार व्यवस्थित तौर पर सफाई का काम चल रहा है। जहां कहीं सरकार के कामकाज में दरारें हैं, उन्हें ठीक किया जा रहा है।


पिछली सदी की तुलना में बहुत कुछ बदल गया है। सितंबर का आखिरी हफ्ता इसका गवाह था। ह्यूस्टन से लेकर संयुक्त राष्ट्र में हर किसी ने एक आत्मविश्वास के भरे भारत और उसके प्रधानमत्री के कद को ऊंचा होते हुए देखा। भारत के लिए ये दोबारा अपनी धाक जमाने का रोमांचक समय है। 


बदलते दौर का गवाह बनना अपने आपमें एक खास अनुभव होता है। हालांकि अब भी कुछ बाधाओं पर काम करने की जरूरत है। नया भारत एक नए तरह के प्रशासन और समग्रता की ओर बढ़ रहा है। अराजकता की मुट्ठियों में से देश को आजाद किया जा रहा है। दुनियाभर में फैले करोड़ों भारतवंशियों में तकरीबन 44 लाख भारतीय अमेरिका में रहते हैं। आमतौर पर वे सभी सफल, असरदार और समृद्ध लोग हैं। 


लिहाजा अब समय आ गया कि वे दोहरी जिम्मेदारी भी निभाएं। ये जिम्मेदारी जिस देश में वे रह रहे हैं, उसके लिए भी हो और अपनी मातृभूमि के प्रति भी। अमेरिकी राष्ट्रपति का भी कहना है, भविष्य राष्ट्रवादियों का है ना कि वैश्विकवादियों का। इसलिए राष्ट्रवादी बनिए और अपने दोनों देशों के साथ खड़े रहिए।
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न्यू इंडिया को इस मोड़ पर अप्रवासी भारतीयों की जरूरत है। खासकर देश में संभावनाओं से भरे शिक्षा, स्वास्थ्य, तकनीक, डिजिटल कॉमर्स और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में। सरकार इसे बेहतर करने के लिए भारी निवेश कर रही है, ताकि संरचनाएं आधुनिक हों। 


एयरपोर्ट, रेलवे, विद्युतीकरण, शहरीकरण और डिफेंस सेक्टर को बेहतर किया जाए। देश में आर्थिक मोर्चे पर बहुत कुछ हो रहा है। सरकार उद्यमियों से सीधे बात करती है, उनकी बात सुनती है। पिछले पांच सालों में देश ने ग्लोबल रैंकिंग में ऊंची छलांग लगाई है। ईज ऑफ लिविंग बेहतर हुई है।


सरकार पूरी ताकत के साथ विकास के लिए हर काम कर रही है, ताकि वह 2024 तक पचास खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था में बदल जाए। बेशक ग्लोबल इकोनॉमी में मंदी का दौर है। विश्व बैंक तक मान रहा है कि 2019 के अंत तक 2.6 फीसदी की ही ग्लोबल ग्रोथ होगी, जो पिछले सात वर्षों में सबसे कम है लेकिन इन नकारात्मक हालात में भी भारत आगे बढ़ रहा है। उसकी औसत विकास दर 7.5 फीसदी रहनी चाहिए। हालांकि अगले दशकों में आने वाली पीढ़ी की बेहतरी के लिए आठ से दस फीसदी की विकास दर रहनी जरूरी होगी।


वित्त मंत्री सोशल सेक्टर के लिए अपने हाथ खोल चुकी हैं, ताकि रोड, रेल और एयरवेज, हाउसिंग के साथ कंस्ट्रक्शन के क्षेत्रों में विकास हो, जिसमें इकोनॉमिक हलचल बढ़ने का कई जगहों पर एकसाथ असर दिखेगा। यह साफ बता रहा है कि हम आगे बढ़ना चाहते हैं और इसके लिए हमारी पूरी ताकत काम कर रही है। भारत का स्टार्टअप माहौल उसी तरह आगे बढ़ रहा है, जिस तरह सिलिकॉन वैली आगे बढ़ी थी। हमारी पहली पीढ़ी की सफलता की कहानियां अब फ्लिपकार्ट, ओला, ओयो और पेटीएम के तौर पर नजर आ रही हैं। ये अभी और आगे बढ़ेगी।


(लेखिका नीति आयोग में राष्ट्रीय वित्त समेकित कमेटी की चेयरपर्सन हैं)

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