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कारगिल को कभी न भूलें : उसे याद कर आज भी हमें गुस्सा आता है

राजीव चंद्रशेखर
Updated Fri, 26 Jul 2019 07:20 PM IST
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कारगिल - फोटो : a

आज राष्ट्र कारगिल विजय दिवस की 20वीं वर्षगांठ मना रहा है। यह वह दिन है, जब हमारे सशस्त्र बलों ने ऑपरेशन विजय को सफलतापूर्वक पूरा किया और पाकिस्तानी सैन्य दुस्साहस को करारी शिकस्त दी। वर्ष 1971 के युद्ध के दौरान अपमानित होने के 28 वर्ष बाद पाकिस्तानी सेना ने यह दुस्साहस किया था।

वर्ष 1999 के मध्य मई से जुलाई महीने तक चले ऑपरेशन विजय के दौरान हमने देखा कि भारतीय सेना की इंफैंट्री बटालियनों ने पाकिस्तानियों द्वारा कब्जा की गई ऊंची चोटियों को वापस हासिल करने के लिए भयंकर लड़ाई लड़ी। हालांकि तोपखाने के गोले-बारूद ने पैदल सेना के जवानों के लिए रास्ता साफ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, भारतीय वायुसेना ने सफेद सागर ऑपरेशन के जरिये पैदल सैनिकों की काफी मदद की, जिसमें बंकर वाली चौकियों पर किया गया अभूतपूर्व हवाई हमला भी था। दुर्गम इलाकों और बर्फीली चोटियों के बावजूद हमारे सशस्त्र बलों ने पाकिस्तानियों को वापस लौटने को मजबूर करने के लिए एक अथक संकल्प का प्रदर्शन किया और जीत हासिल की।



बीस वर्षों बाद भी उसकी यादें धुमिल नहीं पड़ी हैं। साठ से ज्यादा दिनों तक चली वह लड़ाई अतुल्य वीरता, धैर्य और दृढ़ संकल्प की गाथा थी, जो 26 जुलाई, 1999 को खत्म हुई। उसमें अटल बिहारी वाजपेयी का राजनीतिक नेतृत्व भी शामिल था, जिसने पाकिस्तानी सेना को वापस भगाने के लिए भारत के दृढ़ संकल्प का परिचय दिया। यह पहला युद्ध था, जिसे टेलीविजन पर दिखाया गया और उसकी छवियां हमारी स्मृति में बनी हुई हैं।

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कारगिल - फोटो : a
आज राष्ट्र कारगिल विजय दिवस की 20वीं वर्षगांठ मना रहा है। यह वह दिन है, जब हमारे सशस्त्र बलों ने ऑपरेशन विजय को सफलतापूर्वक पूरा किया और पाकिस्तानी सैन्य दुस्साहस को करारी शिकस्त दी। वर्ष 1971 के युद्ध के दौरान अपमानित होने के 28 वर्ष बाद पाकिस्तानी सेना ने यह दुस्साहस किया था।

वर्ष 1999 के मध्य मई से जुलाई महीने तक चले ऑपरेशन विजय के दौरान हमने देखा कि भारतीय सेना की इंफैंट्री बटालियनों ने पाकिस्तानियों द्वारा कब्जा की गई ऊंची चोटियों को वापस हासिल करने के लिए भयंकर लड़ाई लड़ी। हालांकि तोपखाने के गोले-बारूद ने पैदल सेना के जवानों के लिए रास्ता साफ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, भारतीय वायुसेना ने सफेद सागर ऑपरेशन के जरिये पैदल सैनिकों की काफी मदद की, जिसमें बंकर वाली चौकियों पर किया गया अभूतपूर्व हवाई हमला भी था। दुर्गम इलाकों और बर्फीली चोटियों के बावजूद हमारे सशस्त्र बलों ने पाकिस्तानियों को वापस लौटने को मजबूर करने के लिए एक अथक संकल्प का प्रदर्शन किया और जीत हासिल की।

बीस वर्षों बाद भी उसकी यादें धुमिल नहीं पड़ी हैं। साठ से ज्यादा दिनों तक चली वह लड़ाई अतुल्य वीरता, धैर्य और दृढ़ संकल्प की गाथा थी, जो 26 जुलाई, 1999 को खत्म हुई। उसमें अटल बिहारी वाजपेयी का राजनीतिक नेतृत्व भी शामिल था, जिसने पाकिस्तानी सेना को वापस भगाने के लिए भारत के दृढ़ संकल्प का परिचय दिया। यह पहला युद्ध था, जिसे टेलीविजन पर दिखाया गया और उसकी छवियां हमारी स्मृति में बनी हुई हैं।

लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और गश्त पर तैनात पांच अन्य भारतीय सैनिकों को पाकिस्तानी सेना की कैद में जो अमानवीय यातनाएं सहनी पड़ीं, उसे याद कर आज भी हमें गुस्सा आता है। पाकिस्तान ने एक सभ्य राष्ट्र के हर मानदंड का उल्लंघन किया था। जब हम कैप्टन विक्रम बत्रा, कैप्टन विजयंत थापर, कैप्टन हनीफ उद्दीन, मेजर सोनम वांगचुक, राइफलमैन योगेंद्र यादव, लांसनायक गुलाम मोहम्मद खान, कैप्टन नेइकझुको केंगुरस, स्क्वॉड्रन लीडर अजय आहुजा और बहुत से अन्य बहादुरों के साहस के असाधारण कृत्यों के बारे में पढ़ते हैं, तो श्रद्धा से सिर झुक जाता है। इन सबका देश के विभिन्न हिस्सों से ताल्लुक है, जो भारत के लोगों और भारतीय इलाकों की रक्षा के लिए गहरे संकल्प, धैर्य और दृढ़ निश्चय का प्रतिनिधित्व करते हैं।

वे लोग, जो उस लड़ाई से लौटकर घर नहीं आए, बीस साल पहले हम सबके बीच थे। वे सभी बहादुर युवा थे, जिनमें से ज्यादातर की उम्र बीस के आसपास थी, लेकिन उनकी हिम्मत अनुभवी योद्धाओं जैसी थी। वे लोग और उनका जीवन प्रेरणादायक है, विशेष रूप से युवा भारतीयों के लिए, जो हमारी आबादी का बहुसंख्यक हिस्सा हैं।

आज बीस साल बाद वे 527 बहादुर जवान, जिन्होंने अपनी शहादत दी, हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके माता-पिता और परिजन हैं, और वे हमारे गहरे सम्मान के हकदार हैं। कैप्टन विक्रम बत्रा के जुड़वां भाई विशाल ने हाल ही में पॉइंट 4875 का दौरा किया, जिसे अब बत्रा टॉप नाम दिया गया है और वहां उन्हें देखकर कोई भी यह समझने की गलती कर सकता था कि यही कैप्टन बत्रा हैं। कर्नल वी एन थापर अब भी कारगिल की उस नॉल पहाड़ी की वार्षिक तीर्थयात्रा करते हैं, जिस पर उनके बाईस वर्षीय बेटे कैप्टन विजयंत थापर ने तिरंगा फहराया था।

कारगिल में अपनी शहादत देने वाले मेजर सी बी द्विवेदी की पुत्री दीक्षा द्विवेदी ने एक पुस्तक प्रकाशित कराई है-लेटर्स फ्रॉम कारगिल, जिसमें वह युद्ध के मैदान में मौजूद सैनिकों के पत्रों के माध्यम से कारगिल युद्ध की कहानी कहती हैं। वे सभी अपने उन बेटों, पिता, भाइयों और पतियों की विरासत को आगे बढ़ाते हैं, जिन्होंने कारगिल में लड़ाई लड़ी और बलिदान किया। कारगिल विजय दिवस की यह बीसवीं वर्षगांठ रिमेंबर, रिजॉइस ऐंड रिन्यू की थीम पर मनाई जा रही है।

यह अपने बहादुरों की सेवा और बलिदान की कहानियों को याद करने, उस जीत का जश्न मनाने तथा कारगिल को अपने देश में लाने वाले उन बहादुर जवानों का सम्मान करने तथा बलिदान देने वाले अपने शहीदों को नए सिरे से याद करने, उन्हें सम्मान देने तथा अपने राष्ट्र की रक्षा का संकल्प लेने का अवसर है।

आज कारगिल विजय दिवस पूरे देश में मनाया जा रहा है, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था। मुझे याद है कि वर्ष 2004 से 2009 तक कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने कारगिल युद्ध की जीत का जश्न नहीं मनाया था। मेरी लगातार मांग के बाद तत्कालीन रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने वर्ष 2010 से कारगिल विजय दिवस के अवसर पर माल्यार्पण करने की परंपरा शुरू की। उसके बाद से कारगिल विजय दिवस देश के प्रत्येक नागरिक और भारत सरकार द्वारा आधिकारिक तौर पर मनाया जा रहा है।

कारगिल विजय दिवस की यह 20 वीं वर्षगांठ हमारे बढ़ते और गौरवपूर्ण राष्ट्र के इतिहास में एक बड़ा मील का पत्थर है। यह एक ऐसा दिन है, जो सैनिकों और उनके परिवारों की सेवा और जीवन के प्रति हर भारतीय के समर्थन को मजबूत करता है। इस दिन, हमें एक बार फिर से अपने बहादुरों के लिए जो कुछ भी आवश्यक है, करने की प्रतिज्ञा करनी चाहिए-जिसमें कैप्टन सौरभ कालिया और पांच अन्य सैनिकों की यातना और हत्या के लिए पाकिस्तान को घेरना शामिल है। और 1971 के 54 युद्ध नायकों के गायब होने के मुद्दे पर भी पाकिस्तान को घेरना जरूरी है, जिनके परिजन अब भी आस लगाए हैं।

जब से देश स्वतंत्र हुआ है, हमें सीमा पार के खतरों से निपटना पड़ा है। खासकर पाकिस्तान ने 1947 के शुरुआती दिनों से ही कई लड़ाइयां छेड़ीं-और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हमारी वायुसेना द्वारा किए गए हालिया बालाकोट हमले सहित उन सभी लड़ाइयों में पाकिस्तान को अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा। बेशक अब अलग रूप में हों,  लेकिन 72 वर्ष बाद भी वे खतरे बने हुए हैं। हमारे सशस्त्र बल आतंकवाद से लड़ने के लिए हर दिन सेवा और बलिदान करते हैं। इसलिए बीस साल पहले की पाकिस्तान की करारी हार का जश्न मनाते हुए हम उन सैनिकों को सलाम करते हैं, जिन्होंने कारगिल युद्ध में हिस्सा लिया और जो आज भी हमें और हमारे देश को सुरक्षित रखने के लिए सेवा करते हैं।

-लेखक भाजपा के राज्यसभा सासंद हैं।
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