जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्ता में आए हैं, उन्होंने नेपाल से रिश्तों को मजबूत बनाने की काफी कोशिश की है। वह दो बार नेपाल की यात्रा पर गए और नेपाल के विकास में सहयोग के लिए प्रतिबद्धता जताई। उनकी यात्राएं सकारात्मक माहौल में हुईं। केंद्र सरकार ने भी भूकंप के समय नेपाल की मदद में उदारता दिखाई। उस दौरान भारत की समय पर मदद से दोनों देशों के बीच 'विश्वास की कमी' को खत्म करने की उम्मीद जगी।
हालांकि 2015 में नेपाल में नए लोकतांत्रिक संविधान को अपनाने और मधेसी, थारू व जनजाति को शामिल करने के मुद्दे पर दोनों देश अलग-अलग दिखे। देश को एक संविधान देने की कोशिश में नेपाल की सभी बड़ी पार्टियों ने जल्दबाजी में एक ऐसे संविधान को अपनाया, जिसकी गैर-समावेशी, असमान नागरिकता और अनुचित लाभ के इरादे से संघीय सीमाओं के निर्धारण को लेकर आलोचना हो रही थी। नतीजतन आर्थिक नाकेबंदी और एक बार फिर तराई क्षेत्र में आंदोलन ने भारत-नेपाल रिश्त को तनावपूर्ण बना दिया। पहली बार भारत ने मधेसियों की मांग के प्रति समर्थन जताया। मधेसियों ने अपनी मांग के प्रति काठमांडू की उदासीनता के खिलाफ आपूर्ति में रुकावट पैदा करना शुरू किया। नतीजा यह हुआ कि नेपाल की जनता भारत पर दोष मढ़ने लगी। पहले भी जब काठमांडू में सत्तारूढ़ दल किसी चीज से संतुष्ट नहीं होते थे, तो वे भारत को दोषी ठहराने लगते थे।
बदले हुए सुरक्षा हालात में आतंकी एवं धार्मिक संगठनों का भारत विरोधी गतिविधियों को (जिसमें हथियारों की तस्करी, नकली मुद्रा, मादक पदार्थ एवं अन्य मनोवैज्ञानिक पदार्थ भी शामिल हैं), संचालित करने के लिए नेपाल की धरती का इस्तेमाल करने, सीमा पार आपराधिक गिरोहों व आतंकी समूहों के गठजोड़ को तोड़ने और सीमाओं का संयुक्त प्रबंधन करने के मुद्दे पर नेपाल के साथ सतत बातचीत भारत के लिए जरूरी है। भारत ने नेपाल की स्थिरता में पहले से कहीं ज्यादा दांव लगाया है, क्योंकि वामपंथी चरमपंथियों का उभार नेपाल और भारत में बढ़ा है। अस्थिर नेपाल भारत विरोधी तत्वों को वहां प्रोत्साहित करने का अवसर प्रदान कर सकता है।
भारत के साथ खुली सीमा नेपाल के लिए 'सेफ्टी वाल्व' है। भारत की सुरक्षा से समझौता किए बिना इसे एक बाधा नहीं, बल्कि पुल में बदलना चुनौती है। सांस्कृतिक समानताएं एवं पारिवारिक संबंध बेहतर अवसर प्रदान करते हैं। हालांकि निकटता भी जटिलताओं को जन्म देती है और अनिवार्य आपूर्ति, व्यापार, पारगमन, निवेश और रोजगार के लिए निर्भरता सद्भावना पैदा नहीं करती, खासकर तब, जब संबंधों को संवेदनशीलता के साथ नहीं प्रबंधित किया जाता। दूसरा शोचनीय मुद्दा है, नेपाल की निरंतर राजनीतिक अस्थिरता और अमेरिका, ब्रिटेन तथा चीन जैसी बड़ी शक्तियों की संलग्नता, जो भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि भारत और नेपाल लंबी सीमा साझा करते हैं, और दोनों देशों के बीच स्वतंत्र व्यापार होता है।
भूमंडलीकरण के युग में अमेरिका भारत के सबसे बड़े व्यापार भागीदारों में से एक है। नेपाल के साथ भारत के रचनात्मक लगाव का अमेरिका समर्थक है। अमेरिका और भारत के हितों के बीच बढ़ती भागीदारी से चीन नाराज है। चीन इसे इस क्षेत्र अपने प्रभावों को रोकने की एक चाल के रूप में देखता है। इस क्षेत्र में चीन की नीति भारत और अमेरिका के बीच राजनीतिक-सामरिक गठजोड़ का नतीजा है। नेपाल के साथ चीन के रिश्तों में सावधानी उसके आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और सुस्त नौकरशाही का नतीजा है। चीन नेपाल के मामले में भारतीय कार्रवाई को दबाना नहीं चाहता, क्योंकि तमाम बातों के बावजूद भारत चीनी उत्पादों व सेवाओं के लिए नेपाल की तुलना में एक बड़ा और भरोसेमंद बाजार है।
मौजूदा प्रचंड सरकार के साथ भारत की सफल भागीदारी ने चीन की चिंता बढ़ा दी है और वह नेपाल के साथ नजदीकी बढ़ाने में और सक्रिय हो गया है। सितंबर, 2016 में नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचंड की भारत यात्रा के दौरान अपनी विचारधारा से परे जाकर प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें शांति के एक बल के रूप में मान्यता दी और नेपाल की लोकतांत्रिक संस्थानों को मजबूत बनाने में उनकी भूमिका को स्वीकार किया। यह भारत के रुख में उल्लेखनीय बदलाव है, क्योंकि कुछ साल पहले नेपाल की लोकतांत्रिक साख पर भारत में संदेह किया जाता था। अपनी तरफ से प्रचंड ने यह स्पष्ट किया भारत के साथ नेपाल के रिश्ते अनूठे थे और यह माना कि अपनी सफलता, विकास और स्थिरता के लिए नेपाल को भारत की जरूरत है। तब उन्होंने भारत के विभिन्न सियासी दलों से भी संपर्क किया, ताकि विश्वास बहाली की अपनी इच्छा को व्यक्त कर सकें। जो उन्होंने नहीं कहा, पर उनके दृष्टिकोण से स्पष्ट था, वह यह कि नेपाल में चीन भारत का विकल्प नहीं बन सकता।
पिछले महीने भारत के रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने काठमांडू में यह घोषणा की कि जल्द ही सीमावर्ती संपर्क को मजबूत करने के लिए सीधे रेल लाइनों के जरिये काठमांडू को नई दिल्ली और कोलकाता से जोड़ा जाएगा और दोनों देशों के बीच लोगों को आवाजाही की सुविधा दी जाएगी। इसके अलावा, भारत नेपाल को इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए 34 करोड़ डॉलर का सॉफ्ट लोन देने के लिए प्रतिबद्ध है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह कदम काठमांडू होते हुए लुंबिनी को रेल नेटवर्क से जोड़ने की चीन की योजना के मुकाबले में होगा। यह भारत सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अपने वायदे निभाए, ताकि कोई यह न कहे कि भारत वायदे करता है और चीन वायदे निभाता है।
नेपाल में भारत के नए राजदूत बने हैं मंजीव सिंह पुरी। भारत को कड़े रुख के बजाय शांत एवं रचनात्मक पहल करने और अपनी प्रतिक्रियाओं को सावधानी से जांचने की जरूरत है। मधेसी और अन्य हाशिये के समूहों के अधिकार हासिल करने के लिए भारतीय कूटनीति को निरंतर सक्रिय रहना होगा। नेपाल का भविष्य इसी पर निर्भर करेगा कि वह अधिकार और संघवाद के इन मुद्दों का कैसे समाधान करता है।