बालेंद्र शाह ने ‘रामनवमी’ के शुभ हिंदू पर्व पर प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। काठमांडो की सड़कों से सिंह दरबार तक का बालेन का सफर किसी किंवदंती से कम नहीं है। पूर्व रैपर, इंजीनियर और काठमांडो के प्रभावशाली मेयर रहे बालेंद्र शाह देश के प्रधानमंत्री बनने वाले पहले मधेशी हैं। लोगों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाने के लिए, बालेंद्र का मंत्रिमंडल शासन-प्रशासन से जुड़े और सार्वजनिक सेवाओं के वितरण को आसान बनाने वाले 100 निर्णय लेने के लिए तैयार है, जिनमें मुख्य जोर डिजिटलीकरण पर होगा। लेकिन उनका काम शपथ के साथ समाप्त नहीं होता।
बालेंद्र शाह को एक ऐसे राष्ट्र की बागडोर मिली है, जहां उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना है, जो उनकी कड़ी परीक्षा लेंगी। नेपाल आर्थिक संकटों के दौर से गुजर रहा है, जहां की अनुमानित विकास दर पांच फीसदी से कम है, युवाओं में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी है, और पर्यटन क्षेत्र अब भी महामारी के बाद के जख्मों और जलवायु संबंधी आपदाओं से उबरने की कोशिश कर रहा है। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार ने ही जेन-जी विद्रोह को हवा दी थी, आज भी भूतों की तरह मंडरा रहा है। इसके अलावा, प्रांतीय स्वायत्तता और संसाधनों के बंटवारे को लेकर मधेश की पुरानी शिकायतों के तत्काल समाधान की आवश्यकता है। रोजगार तथा बदलाव के बड़े-बड़े वादों को पूरा करने के लिए बेहद सटीक और बारीक रणनीति की आवश्यकता होगी। अगर वह इसमें विफल रहते हैं, तो उन्हीं युवाओं को निराश करेंगे, जिन्होंने उन्हें आगे बढ़ाया था। इससे उम्मीदें निराशा में बदल जाएंगी।
भारत के लिए इस बदलाव के गहरे निहितार्थ हैं, विशेष रूप से ओली के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट सरकारों के कठिन दौर के बाद, जिसने भारत के साथ पारंपरिक रोटी-बेटी के रिश्तों में कड़वाहट ला दी थी। अब, बालेन शाह का उदय एक संभावित नए सिरे की शुरुआत का संकेत देता है। जीत के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बधाई पर उनकी प्रतिक्रिया सौहार्द्रपूर्ण थी। उन्होंने कनेक्टिविटी, ऊर्जा, व्यापार और सांस्कृतिक पर्यटन के जरिये संबंधों को ‘मजबूत, गहरा और अधिक परिणामोन्मुख’ बनाने का संकल्प लिया। भारत ने लगातार मधेशियों के सांविधानिक अधिकारों का समर्थन किया है।
नई दिल्ली के लिए, पहाड़ी क्षेत्रों के प्रभाव व कम्युनिस्ट सोच की ओर झुकी नेतृत्व शैली से यह बदलाव एक अच्छा मौका है। इससे भरोसा फिर से बनाया जा सकता है, लोगों के रिश्ते मजबूत किए जा सकते हैं और चीन के बचे हुए प्रभाव का सामना किया जा सकता है। संभवतः, यह सब ज्यादा असरदार परियोजनाओं और ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग के माध्यम से किया जा सकता है। सीता की पवित्र धरती पर जन्मे एक मधेशी का नेतृत्व, पहाड़ी-केंद्रित परंपराओं और कम्युनिस्ट-युग के झुकावों से हटकर एक व्यावहारिक संतुलन की ओर देश को ले जा सकता है। नेपाल और भारत के लोगों को इस गर्मजोशी और साझा समृद्धि से अपार लाभ मिलने की उम्मीद है; चुनौतियां बेशक बहुत हैं, लेकिन उम्मीद भी उतनी ही प्रबल है। - लेखक, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक हैं, जो 1992 से 1998 तक नेपाल में रहे हैं।