ब्राजील की अपनी यात्रा से लौटने के कुछ ही समय बाद मैंने कुछ अर्थशास्त्रियों से बातचीत की, ताकि मैं इस दक्षिण अमेरिकी देश के आर्थिक हालात को ठीक से समझ सकूं। दरअसल, ब्राजीली शहर रियो डि जेनेरियो कुछ-कुछ शंघाई जैसा है। यहां चमक-धमक वाले बाजार दिखते हैं और बदहाल झुग्गियां भी। लेकिन इनके अलावा भी एक पक्ष है, जिसे जानना रोचक है। मेरे जैसे यात्री के लिए वहां के मध्यवर्गीय तबके के उदय को समझना भी अद्भुत था। सड़कों पर कारों की बाढ़ और ट्रैफिक जाम को देखते हुए मुझे ब्राजील में उभरते हुए मध्यवर्ग की ताकत का अंदाजा हो गया। आखिर इतनी कारें तो तभी हो सकती हैं, जब लोगों की जेब में पैसा हो।
पिछले एक दशक के दौरान ब्राजील में आय की असमानता की दर में कमी देखी गई है। बेरोजगारी में भी रिकॉर्ड कमी हुई है। तिस पर मध्यवर्ग का उदय निश्चित ही सोने पे सुहागा कहा जा सकता है। ज्यादातर आकलन बताते हैं कि पिछले दस वर्षों में चार करोड़ से भी ज्यादा लोग निर्धनता के दुष्चक्र से मुक्त कराए जा चुके हैं। सरकार की मानें, तो अतिनिर्धनता की स्थिति में 89 प्रतिशत की कमी आई है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर बेशक धीमी रही हो, प्रति व्यक्ति आय में लगातार इजाफा ही हुआ है। लेकिन इसके बावजूद मेरी जिन अर्थशास्त्रियों से बात हुई, वे सभी एकमत से ब्राजील की अर्थव्यवस्था के निकट भविष्य को लेकर शंकित ही दिखे।
दरअसल इन विशेषज्ञों के शक की सुई सबसे पहले तो जीडीपी की धीमी होती विकास दर की तरफ घूमी। तिस पर हाल-फिलहाल इसकी हालत सुधरने की कोई उम्मीद भी नहीं दिखती। इसमें संदेह नहीं कि इस शताब्दी की शुरुआत से देश के आर्थिक हालात में व्यापक सुधार हुए हैं। लेकिन उत्पादकता के संदर्भ में अर्थव्यवस्था की स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती। तमाम अर्थशास्त्रियों ने मुझे यह बताकर चौंका दिया कि बेरोजगारी की नीची दर की असली वजह अर्थव्यवस्था की घनघोर नाकाबिलियत रही है। अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा सरकारी नियंत्रण में है। इसके अलावा यह एक उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था है, जहां जरूरी निवेश भी नहीं हो पा रहा है। अर्थशास्त्री तो यह भी मानते हैं कि ब्राजील अब तक काफी भाग्यवान रहा है, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। यहां तक कि इकोनोमिस्ट पत्रिका ने भी हाल ही में ब्राजील की अर्थव्यवस्था पर प्रकाशित अपने एक लेख का शीर्षक 'द डेटीरियोरेशन' यानी पतन रखा।
दूसरी ओर अमेरिका को देखें। वर्ष 2013 की तीसरी तिमाही में यहां की विकास दर चार प्रतिशत से ज्यादा रही और अर्थव्यवस्था की उत्पादकता भी तेजी से बढ़ी। लेकिन इसके बावजूद बेरोजगारी की दर सात प्रतिशत से कम होती नहीं दिखी। यह अर्थव्यवस्था की उत्पादकता ही थी, जिसने मध्यवर्ग को फायदे की स्थिति में बनाए रखा। आय की असमानता तो अमेरिकी जीवन की ऐसी सच्चाई बन गई है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। सब कुछ जानते हुए भी राजनेता कुछ करते नहीं दिखते।
कुछ वर्ष पहले निकोलस लेमेन ने ब्राजील पर एक लेख लिखा। इसमें उन्होंने ब्राजील की राष्ट्रपति डिल्मा रॉसेफ के एक ई-मेल का उल्लेख किया। इसमें डिल्मा लिखती हैं, 'आर्थिक विकास का मुख्य लक्ष्य हमेशा लोगों की जिंदगी में सुधार लाना होना चाहिए। दरअसल आर्थिक विकास और बेहतर जिंदगी की अवधारणाएं एक दूसरे से अलग नहीं हैं।' इससे ब्राजील की वामपंथी सरकार की नीति का पता चलता है, जो केवल विकास की बात नहीं करती। इसका जोर तो गरीबी उन्मूलन और मध्यवर्ग के उदय को बढ़ावा देने पर है। यही वजह है कि यहां श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन ऊंचा रखा गया है। इतना ही नहीं, सुस्त कर्मचारियों को नौकरी से निकालना भी यहां इतना आसान नहीं है। तेल की कीमतें भी सरकारी नियंत्रण में हैं, ताकि वाहनों को चलाना घरेलू बजट पर भारी न पड़े।
ब्राजील का 'बोल्सा फैमिलिया' कार्यक्रम भी देश-विदेश में खासा मशहूर रहा है। इसके तहत गरीबी में गुजर-बसर करने वाली माताओं को प्रत्यक्ष आर्थिक मदद दी जाती है। बदले में, इन माताओं पर अपने बच्चों को स्कूल भेजने और स्वास्थ्य सुविधाएं देने की जिम्मेदारी होती है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ब्राजील में गरीबी कम करने में इस कार्यक्रम की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
दूसरी ओर अमेरिका है, जहां की संसद ने हाल ही में बेरोजगारों के लिए बीमा सुविधा में विस्तार करने से इन्कार किया है। इसके अलावा भी बेरोजगारी या गरीबी में कमी लाने वाले कई कार्यक्रमों में कटौती की गई है। हालत तो यह है कि इन कटौतियों का विरोध करने वाले भी मानते हैं कि एक बार अर्थव्यवस्था के पटरी पर आने पर सब कुछ ठीक हो जाएगा। इनकी सोच है कि वृद्धि दर में बढ़ोतरी ही सभी परेशानियों का समाधान है। दरअसल अमेरिका में आर्थिक वृद्धि दर को साधन के बजाय साध्य ज्यादा माना जाता है।
निवेश और उद्यमिता पर जोर देकर ब्राजील की अर्थव्यवस्था में सुधार लाया जा सकता है। नए-नए उदित हुए मध्यवर्ग ने हाल ही में सरकार के खिलाफ अपना विरोध जताया था। बेहतर सेवाएं, गुणवत्तायुक्त स्कूल और शिक्षा तथा भ्रष्टाचार में कमी ही वे मुद्दें हैं, जो मध्यवर्ग की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। ब्राजील का उदाहरण यह सवाल पैदा करता है कि ऐसा आर्थिक विकास किस काम का जब किसी के पास रोजगार ही न हो?