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पुरानी सोच से बाहर आएं

Sun, 22 Jun 2014 08:04 PM IST
नीलांजन मुखोपाध्याय
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सरकार और उसके प्रतिनिधियों के आधिकारिक सोशल मीडिया एकाउंट में हिंदी के प्रयोग के सरकारी निर्देश पर पैदा हुआ विवाद एक बहुत संकीर्ण सोच का परिचय है, जिसमें इतिहास बोध का अभाव है। देर से ही सही, पर शुक्र है कि सरकार ने यह कहते हुए इस मुद्दे का अंत कर दिया कि सोशल मीडिया से संबंधित राजभाषा विभाग का निर्देश सिर्फ हिंदी पट्टी में लागू होगा। बेशक इस विवाद में नरेंद्र मोदी सरकार की भूमिका आधी ही थी। इसके बावजूद यह सरकार अपनी जिम्मेदारी से कन्नी नहीं काट सकती। इस विवाद की शुरुआत गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग द्वारा 10 मार्च को जारी किए गए एक परिपत्र से हुई, जिसमें कहा गया था कि 'ए' श्रेणी के राज्यों यानी हिंदीभाषी प्रांतों को सोशल मीडिया के मंचों पर हिंदी को बराबर का महत्व देना होगा। चुनाव अभियान के बीच में उस परिपत्र की उपेक्षा कर दी गई, और चुनावी नतीजे के बाद, राजभाषा विभाग ने रूटीन के तहत वह दिशा-निर्देश संबंधित मंत्रालयों को प्रेषित कर दिया।
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वरिष्ठ अधिकारियों को इस मुद्दे की संवेदनशीलता का एहसास नहीं था, हालांकि यह स्वीकार करना चाहिए कि यह काम 27 मई को, यानी नरेंद्र मोदी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के बाद और राजनाथ सिंह द्वारा अपना कार्यभार संभालने से पहले हुआ। लेकिन जो सरकार बदलाव और प्रशासन को गति देने के वायदे के साथ आई है, क्या उसके गृह मंत्री से यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि वह उन तमाम निर्णयों की समीक्षा करेगी, जो तब लिए गए थे, जब खुद वह सत्ता में नहीं थी? विपक्ष में बैठकर सरकार की आलोचना करना अलग चीज है और प्रभावी ढंग से सरकार चलाना बिल्कुल भिन्न चीज।

इसमें किसी को संदेह नहीं कि हिंदी इस देश के ज्यादातर लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। आर्थिक रूप से भारत के एक ताकत बनने के साथ हिंदी की शक्ति भी बढ़ी है। न सिर्फ देश के भीतर हिंदी को लेकर अब पहले जैसा दुराग्रह नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसके प्रभाव में वृद्धि हुई है। लेकिन भाजपा को पता होना चाहिए कि देश के दक्षिणी इलाके, खासकर तमिलनाडु में, हिंदी-विरोधी भावनाओं का उग्र इतिहास है। 26 जनवरी, 1965 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिलना था, लेकिन जब इसका समय निकट आया, तब तमिलनाडु में हिंदी-विरोधी आंदोलन ने गति पकड़ ली थी। 1964 के अंत और 1965 की शुरुआत में वहां दंगों और आत्मदाह के सिलसिलों की जगह बाद में राज्य के कई शहरों में गणतंत्र दिवस के दौरान छात्र आंदोलनों ने ले ली। स्थिति आखिरकार तब नियंत्रण में आई, जब लालबहादुर शास्त्री ने आश्वस्त किया कि जब तक अहिंदी भाषी राज्य नहीं चाहते, तब तक अंग्रेजी ही सरकारी कामकाज की भाषा बनी रहेगी। इसके बावजूद वहां कांग्रेस-विरोधी भावनाएं इतनी उग्र थीं कि उसे वहां 1967 का विधानसभा चुनाव हारना पड़ा, जिसके बाद वह कभी वहां सत्ता में नहीं आ पाई। कायदे से भाजपा ने तमिलनाडु में अभी अपने पांव ही रखे हैं, ऐसे में, यह विवाद उसके लिए राजनीतिक आत्मघात से कम नहीं है।
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भाजपा दरअसल भारत के बारे में अपनी संकीर्ण सोच की बंधक है। चुनाव अभियान के दौरान उसने 'एक भारत-श्रेष्ठ भारत' का नारा दिया था। उस समय पार्टी ने परोक्ष रूप से यह भी जताया कि देश के नागरिकों को एक भाषा और एक संस्कृति का वरण करना चाहिए। जब-जब धार्मिक विश्वास का मामला सामने आया है, तब-तब संघ परिवार के नेताओं ने ये तर्क दिए हैं-हर आदमी अपनी धार्मिक भावना का पालन करे, इसका स्वागत है, पर देश के प्रत्येक आदमी को हर उस व्यक्ति का सम्मान करना पड़ेगा, जिन्हें यहां का बहुसंख्यक समुदाय महापुरुष मानता है।

भारत जैसे देश में, जहां विभिन्न समुदाय विभिन्न भाषाएं बोलते हैं और विभिन्न सांस्कृतिक परंपराओं का पालन करते हैं, किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए 'सांस्कृतिक संघवाद' का पालन करना बहुत जरूरी है। मैं यहां सांस्कृतिक संघवाद का प्रयोग इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि यह देश अपने बहुलतावादी विचारों के लिए जाना जाता है। लिहाजा भाजपा को चाहिए कि वह भारत के बारे में अपनी पुरानी सोच से बाहर आए और इसे एक विविधतावादी देश के रूप में देखे। भाजपा के साथ समस्या यह है कि भारत के बारे में उसके विचार भारतीय राष्ट्रवाद से संबंधित संघ की पुरानी सोच से जुड़ी है। अयोध्या आंदोलन के दौरान सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विचार ने तब गति पकड़ी थी, जब संघ परिवार के नेताओं ने तर्क दिया था कि राम जन्मभूमि आंदोलन सिर्फ अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सोच को आगे बढ़ाना भी इस आंदोलन का लक्ष्य है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सिद्धांत धर्म पर आधारित है, क्योंकि संघ परिवार ने लगातार यह तर्क दिया है कि भारत जैसे देश में धर्म ही हमारी संस्कृति का मूलाधार है। ऐसे में जो आदमी दूसरे धर्म का अनुयायी है, उसे या तो बहुसंख्यक के धार्मिक विश्वास से जुड़ना चाहिए या बहुसंख्यक सोच के खिलाफ जाने के कारण आलोचना के लिए तैयार रहना चाहिए।

हालांकि हमले तेज होने के बाद सरकार ने स्पष्टीकरण देकर इस विवाद को खत्म करने का प्रयास किया है, लेकिन बेहतर यह होता कि भाजपा साथ ही यह स्पष्ट करती कि वह किसी भी भाषा के वर्चस्व के खिलाफ है। भारत जैसे विविध संस्कृतियों वाले देश में भाषा एक संवेदनशील मुद्दा रही है, लिहाजा केंद्र की सरकार संस्कृति, भाषा और धर्म के मामले में भारतीय बहुलतावाद को जितनी जल्दी तरजीह देती है, उतना ही वह देश के लिए भी अच्छा होगा और खुद सरकार की छवि और स्थिरता के लिए भी।
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(वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक)
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