महान सिख गुरु अर्जुनदेव जी की पत्नी गंगादेवी का मन निःसंतान होने के कारण अशांत रहता था। गुरुजी ने एक दिन कहा, तुम ब्रह्मज्ञानी संत बाबा बुड्ढा के दर्शन को जाओ। तुम्हें निश्चय ही शांति मिलेगी। माता गंगादेवी ने तरह-तरह के पकवान तैयार किए। वह लाव-लश्कर के साथ रथ में बैठकर बाबा बुड्ढा की तपस्थली जा पहुंची। बाबा बुड्ढा ने ताम-झाम और लाव-लश्कर देखा, तो समाधि में लीन हो गए। माता गंगादेवी को बिना आशीर्वाद के ही लौटना पड़ा।
गुरु अर्जुनदेव को पता चला, तो उन्होंने गंगादेवी से कहा, बुड्ढा बाबा ब्रह्मज्ञानी महापुरुष हैं। उनका आशीर्वाद प्राप्त करना है, तो सादगी में जाना होना। अगली सुबह मां गंगा ने रोटियां बनाईं। एक बरतन में लस्सी भरी। वह रोटियां व लस्सी सिर पर रखकर नंगे पांव आश्रम में पहुंची। बाबा बुड्ढा आगवानी के लिए स्वयं बाहर आए और बोले, माता जी, मुझे आज बड़ी भूख लगी थी। गुरुजी ने मेरी आवाज सुन ली। लाओ, मुझे रोटियां खिलाओ।
लस्सी के साथ रोटियां खाने के बाद बाबा बुड्ढा ने आशीर्वाद देते हुए कहा, माता जी, आपके यहां ऐसा महाप्रतापी पुत्र होगा, जो न्याय और धर्म की रक्षा के लिए दुश्मनों से संघर्ष करेगा। अधर्मी और अन्यायी उसके नाम से कापेंगे। गंगादेवी बाबा बुड्ढा का आशीर्वाद प्राप्त कर गद्गद हो उठीं। आगे चलकर उन्होंने पुत्र को जन्म दिया, जो सिखों के छठे गुरु हरगोविंद के नाम से विख्यात हुए।