कुछ अजीब-सा मंजर सामने है- लोकतंत्र के सिपाहियों के हथियार से लोकतंत्र लहूलुहान होता जा रहा है! मतदाताओं को उन्मादी भीड़ में बदल कर, लोकतंत्र पर कब्जा करने का खतरनाक खेल नौ चरणों के इस चुनाव में जिस तरह खेला गया, उससे माहौल में बारूदी गंध भर गई है। लोकतंत्र में यह अधिकार सबका है कि वे अपने विश्वासों और विचारों के आधार पर एक-दूसरे का विरोध करें, जनता को अपने पक्ष का कायल करें और उसकी रजामंदी से तब तक देश को अपनी दिशा में ले जाएं, जब तक जनता रजामंदी वापस नहीं ले लेती है। लेकिन यह अधिकार किसी को भी नहीं है कि वह लोकतंत्र को ही चुनौती दे।
अंधकार को सबसे बड़ा खतरा आंधी से नहीं, आंधी में कहीं टिमटिमाती लौ से होता है। हम यही देख रहे हैं। सारे राजनीतिक दलों को, एक-दूसरे के प्रति जितना गुस्सा है, उससे ज्यादा गुस्सा चुनाव आयोग से है। सभी एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव आयोग के पास दौड़ते भी रहे हैं और सब मिल कर उसी आयोग पर हमले भी करते रहे हैं। यह जहर यहां तक गया है कि सबसे नवजात राजनीतिक दल ने भी अपना संतुलन खो दिया है।
लोकतंत्र शासन की व्यवस्था मात्र नहीं है, यह हमारा आंतरिक विश्वास है। इसलिए आपका मिजाज लोकतांत्रिक है या नहीं, यह जानना कहीं महत्वपूर्ण है, न कि यह कि आपने लोकतंत्र की पोशाक पहन ली है या नहीं। और जब हम यह देखने जाते हैं, तब कितने ही अपशकुन दिखाई देने लगते हैं- फिर उसका नाम नरेंद्र मोदी हो, आजम खान हो या अमित शाह। सबको चुनाव आयोग से शिकायत है।
आयोग एक सांविधानिक संस्था है। अगर सांविधानिक संस्थाओं के बारे में आपके भीतर इतनी हिकारत भरी है, तो संविधान के बारे में आप क्या करेंगे? संविधान आखिर है क्या? आपके लोकतांत्रिक अधिकारों की गारंटी देने और आपके लोकतांत्रिक व्यवहार की मर्यादाएं तय करने वाला दस्तावेज है। हमें उसका पहला हिस्सा बहुत भाता है। दूसरा भी बहुत भाता है, तब तक, जब तक वह दूसरों पर नकेल कसता है। संविधान निर्माताओं ने राजनीति के ऐसे पतन की कल्पना नहीं की थी। इसलिए अपराधियों के चुनाव लड़ने की आशंका, एक आदमी के दो जगहों से चुनाव लड़ने, चुनावी भ्रष्टाचार की सारी चालों की पक्की काट बनाने में, सांप्रदायिकता-जातीयता-इतिहास-भूगोल के बारे में गलतबयानी का निषेध करने, मतदाताओं को किसी भी तरह का लोभ देने या उनमें भय फैलाने आदि के संदर्भ में वे पक्की लकीरें नहीं खींच गए।
उन्हें शायद यह आशा थी कि समय बीतने के साथ-साथ हमारे राजनीतिक संस्कार मजबूत होते जाएंगे, लेकिन हुआ यह कि हमारी लोकतांत्रिक परंपराएं बहुत धीमी चाल से चलीं और हमारी सत्ता-लोलुपता दानवाकार होती गई। हम कांग्रेस को इन सारे अलोकतांत्रिक अपराधों की जड़ में मान सकते हैं, क्योंकि स्वतंत्रता के बाद वही लंबे समय तक निर्बाध सत्ता में रही। इस कहानी को लिखने और इसे समय-समय पर सकारात्मक मोड़ देने की जिम्मेदारी उसकी थी। लेकिन कांग्रेस पर सारा ठीकरा फोड़ देने से कोई बात बनती नहीं है, क्योंकि दूसरे सभी भी तो कांग्रेस की कार्बन-कॉपी साबित हुए।
इस चुनाव के अनुभवों से हमारे संविधान के कान खड़े हो जाने चाहिए। हमारी सारी सांविधानिक संस्थाओं को अपने मूल स्वरूप को प्रभावी बनाने की सशक्त कोशिश शुरू कर देनी चाहिए। चुनाव आयोग को सांविधानिक अधिकारों से लैस करने की प्रक्रिया के प्रति सर्वोच्च न्यायालय को भी सक्रिय हो जाना चाहिए। सरकार किसकी बनती है और कैसे, इसके बंदरबांट से अलग इस देश के लोकतांत्रिक भविष्य को पुख्ता करने की जिम्मेदारी लेने का वक्त आ गया है, अन्यथा हमारे लोकतंत्र के भीतर से भी कोई नाजी जर्मनी की कहानी जन्म ले सकती है।