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सख्त कानून की जरूरत इन्हें सबसे ज्यादा है

Fri, 27 Jun 2014 12:00 AM IST
तवलीन सिंह
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भारत और इंडिया में फासले हैं, इसे हम सब जानते हैं और इसके कारण भी। भारत अक्सर देश के उस हिस्से को कहा जाता है, जिसके दायरे में आते हैं गांव, कस्बे और छोटे शहर। यहां भारतीय भाषाएं बोली जाती हैं, भारतीय लिबास ज्यादा दिखता है और गरीबी भी ज्यादा दिखती है। यहां रोजमर्रा की दिकक्तें भी ज्यादा हैं।
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इंडिया सीमित है हमारे महानगरों तक, जहां रहते हैं अक्सर अंग्रेजी बोलने वाले, संपन्न लोग, जिनकी सभ्यता भारतीय कम और विदेशी ज्यादा है। ये लोग न सिर्फ संपन्न हैं, बल्कि ताकतवर भी हैं राजनीतिक तौर पर। इसे हम जैसे लोग अच्छी तरह से जानते हैं, पर पिछले सप्ताह मुझे मालूम हुआ कि भारत और इंडिया के बीच अब एक उतनी पक्की सरहद बन चुकी है, जितनी देशों को अलग रखने वाली सरहदें होती हैं। पहली बार एहसास हुआ मुझे कि इंडिया में रहने वाले लोग जानते तक नहीं हैं कि भारत में जो लोग रहते हैं, उनकी समस्याएं, उनकी सोच क्या है।

हुआ यह कि जिस दिन मशहूर अभिनेत्री प्रीति जिंटा ने नेस वाडिया के खिलाफ पुलिस में छेड़खानी की शिकायत दर्ज की, मुझे ऐसा लगा कि जिंटा कानून का गलत प्रयोग कर रही हैं। पुलिस तक जाने की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए थी, क्योंकि भरे स्टेडियम में सबके सामने बदसलूकी की शिकायत बहुत जमती नहीं। प्रीति इतनी मशहूर हैं कि अगर वास्तव में मारपीट तक बात पहुंची होती, जैसा उन्होंने अपनी शिकायत में लिखा है, तो क्या आधी जनता न खड़ी हो जाती उनकी हिफाजत के लिए? सो मैंने ट्वीट किया कि प्रीति जिंटा को शर्म आनी चाहिए कि उन्होंने एक ऐसे कानून का गलत इस्तेमाल किया है, जिनमें बेसहारा, बेजुबान महिलाओं और बच्चियों के हिफाजत को ध्यान में रखकर सख्ती लाई गई थी। यह सख्ती लाई गई थी निर्भया वाले हादसे के बाद। दुख की बात है कि यह नया कानून उन बेसहारा बच्चियों के काम नहीं आया, जिनकी लाशें पेड़ पर लटकी मिलीं बदायूं के गांव में। उस बेचारी महिला के काम नहीं आया, जिसके साथ पिछले हफ्ते खंडवा में बलात्कार किया दस दरिंदों ने।
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प्रीति जिंटा के खिलाफ ट्वीट करने के बाद इंडिया में रहने वाली महिलाओं ने मुझे जो गालियां दीं, वे मैं यहां पेश नहीं कर सकती। चर्चित लेखिका शोभा डे ने भी मेरी आलोचना की। टीवी पर चर्चा के दौरान मैंने शोभा डे को समझाने की कोशिश की कि प्रीति ने गलत इसलिए किया, क्योंकि वैसे भी इतने मुकदमे हैं हमारी अदालतों में कि लाख के करीब बलात्कार के मुकदमे दशकों से लटके पड़े हैं। जिन मुकदमों में फैसले आते भी हैं, तो उसके आने तक उमर गुजर जाती है पीड़ितों की, ऐसे में क्या जरूरत थी प्रीति जिंटा को पुलिस तक जाने की। एक-दो इंटरव्यू दे दिए होते, तो नेस वाडिया की हिम्मत न होती उनको आइंदा तंग करने की।

मेरी बातें न शोभा डे को समझ में आईं, न उन महिलाओं को जो इंडिया में रहती हैं, और यह नहीं देख पातीं कि भारत में रहने वाली महिलाओं की तुलना में उनकी समस्याएं कितनी छोटी और मामूली हैं। भारत की कोई पीड़ित महिला यदि हिम्मत करके थाने तक पहुंच भी जाती हैं, तो कई दफा पुलिस वाले भी उसके साथ बदसलूकी करते हैं। न थाने में सुनवाई होती है, न ही अपने घरों में। न कभी उनके काम आते हैं ये नए सख्त कानून।
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