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स्टेंट के शोध में और निवेश की जरूरत

डॉ. ऋषि गुप्ता
Updated Wed, 11 Dec 2019 05:33 AM IST
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इसलिए जरूरी होता है स्टेंट

जीवनशैली के बदलने से बीमारियों की रूपरेखा बदल गई है। हृदय रोग दुनिया भर में काफी तेजी से फैल रहा है। इस समय यह रोग पूरे विश्व पर बोझ बन गया है और इस रोग से दुनिया भर में सबसे ज्यादा मरीजों की मौत हो रही है। भारतीय संदर्भ में देखा जाए, तो 2015 में पिछले वर्ष की तुलना में यहां एंजियोप्लास्टी 42 फीसदी तक बढ़ गई थी। हृदय रोग के इलाज के लिए अब कार्डिएक स्टेंट अग्रिम मोर्चे पर रहकर बढ़ती चुनौती का मुकाबला कर रहे हैं। इसके अलावा जहां बाजार में पहले विदेश में निर्मित स्टेंट का प्रभुत्व था, वहीं भारत ने अब स्वदेशी स्टेंट का वर्जन बना लिया है। घरेलू बाजार की यह प्रगति वाकई उत्साहजनक है। स्टेंट सुरक्षा, प्रभावशीलता और गुणवत्ता नियंत्रण की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।



स्टेंट को दिल के मरीजों के लिए उपलब्ध कराए जाने से पहले गुणवत्ता नियंत्रण के कड़े मानकों का पालन अवश्य किया जाना चाहिए, जिससे उनका सुरक्षित इस्तेमाल सुनिश्चित किया जा सके। विस्तृत क्लिनिकल ट्रायल से यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। भारत में केवल 100 मरीजों पर ट्रायल करने के बाद यह उपकरण बाजार में उपलब्ध कराया गया है। हालांकि, भारतीय आबादी के विभिन्न वर्गों में जटिल रोग और गंभीर बीमारियों से मरीजों को होने वाले नुकसान को देखते हुए यूएसएफडीए के मानकों के अनुसार, कम से कम 1000-2000 मरीजों पर क्लिनिकल ट्रायल होने चाहिए, जिससे दिल के विभिन्न रोगों के इलाज में इस उपकरण का मूल्यांकन किया जा सके। इस पर लंबे समय तक निगरानी रखी जानी चाहए, ताकि यह वैश्विक मानकों पर खरा उतर सके। सरकार, उद्योग और डॉक्टरों को साथ मिलकर ऐसे स्टेंट के विकास को बढ़ावा देना चाहिए, जो सभी गुणवत्ता नियंत्रण परीक्षण में खरा उतरे। उदाहरण के लिए, एक आदर्श डीईएस (ड्रग एल्यूटिंग स्टेंट) चार घटकों से बना होता है, जो इनकी सुरक्षा और प्रभावशीलता तय करते हैं। स्टेंट का चुनाव मुख्य रूप से इसे बनाने में इस्तेमाल किए गए विज्ञान, शोध और अनुसंधान पर निर्भर करता है। इसके लिए मजबूत क्लिनिकल ट्रायल के आंकड़ों की जरूरत होती है। क्लिनिकल ट्रायल मरीजों की अच्छी-खासी संख्या पर करना चाहिए। यह स्टेंट की सफलता की दर को स्थापित करने के लिए आवश्यक है। जब आप 1.4 अरब की करीब आबादी वाले देश के लिए स्टेंट बाजार में लेकर आते हैं, तो यह तभी अच्छा हो सकता है, जब बड़ी संख्या में मरीजों पर इसका क्लिनिकल ट्रायल किया गया हो और यह गुणवत्ता परीक्षण के मानकों पर खरा उतरा हो।


स्टेंट की सफलता की दर में सुधार का श्रेय लगातार होने वाले आविष्कारों को प्रमुख रूप से दिया जा सकता है। अब स्टेंट पहले से ज्यादा लचीले और पतले होते हैं। इससे न केवल डॉक्टरों को मरीजों के शरीर में इसे लगाने में मदद मिलती है, बल्कि इससे मरीजों के जीवन स्तर में भी सुधार होता है। इसी कारण उद्योग को हृदय की धमनियों (कोरोनेरी आर्टरीज) के रोग की लगातार बढ़ती जटिलता के कारण लगातार नए-नए स्टेंट के आविष्कार के क्षेत्र में निवेश करना चाहिए।


जहां तक कार्डियोलॉजी के क्षेत्र में शोध और निवेश की बात है, तो मौजूदा दौर में भारत ने स्टेंट के क्षेत्र में दुनिया भर में हो रहे शोध के क्षेत्र में केवल 0.9 फीसदी का निवेश किया है। जैसे भारत सबको गुणवत्तापूर्ण व सर्वसुलभ चिकित्सा सुविधा का आश्वासन देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी मेडिकल डिवाइस को बनाने में सुरक्षा और विश्वसनीयता के बुनियादी सिद्धांतों का पालन किया गया है।


-लेखक एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, फरीदाबाद में कार्डियोलॉजी विभाग के प्रमुख व क्लीनिकल सर्विसेज के निदेशक हैं।

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