मौजूदा वर्ष 2019-20 में चीनी का आरंभिक भंडार 143 लाख टन है। यानी हमारी सात महीने की खपत के बराबर चीनी पहले ही गोदामों में है। इसे देखते हुए सरकार ने चीनी मिलों को चीनी की जगह एथनॉल बनाने के लिए कई प्रोत्साहन दिए। परंतु पहले सूखा और बाद में अत्यधिक बेमौसम बारिश के कारण गन्ने की फसल को काफी नुकसान हुआ। इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के अनुसार देश में इस वर्ष चीनी का उत्पादन पिछले वर्ष के मुकाबले 21 प्रतिशत घटकर लगभग 260 लाख टन होने का अनुमान है, जो घरेलू खपत के लिए ही पर्याप्त होगा।
वर्ष 2019-20 में विश्व में चीनी का उत्पादन 1,756 लाख टन और मांग 1,876 लाख टन रहने की संभावना है। यानी मांग से 120 लाख टन कम उत्पादन रहने का अनुमान है। जाहिर है, इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की मांग अच्छी होगी, जिसकी हम आपूर्ति कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों और चीनी उद्योग को ऐसे में सबसे ज्यादा लाभ होगा, जहां इस वर्ष 120 लाख टन चीनी उत्पादन का अनुमान है। पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश के किसानों ने लगभग 33,000 करोड़ रुपये मूल्य के गन्ने की आपूर्ति मिलों में की थी। परंतु आज भी किसानों का लगभग 3,600 करोड़ रुपये का भुगतान बकाया है। पिछले दो वर्षों से अत्यधिक चीनी उत्पादन और भरे हुए भंडारों का हवाला देकर चीनी मिल किसानों का भुगतान टालती रही हैं, और सरकार ने भी गन्ने के दाम नहीं बढ़ाए। उत्तर प्रदेश में राज्य का परामर्श मूल्य पिछले दो वर्षों से 315-325 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर ही है।
पिछले दिनों उत्तर प्रदेश सरकार ने इस वर्ष के गन्ना मूल्य निर्धारण के लिए सभी हितधारकों से विचार-विमर्श किया, जिसमें प्रदेश चीनी मिल्स एसोसिएशन ने एक बार फिर खराब माली हालत, अधिक उत्पादन और भंडार का डर दिखाकर गन्ने का रेट न बढ़ाने की मांग रखी। गन्ने की उत्पादन लागत लगभग 300 रुपये प्रति क्विंटल है। ऐसे में कम से कम 400 रुपये प्रति क्विंटल का भाव किसानों को मिलना चाहिए। वास्तविकता तो यह है कि चीनी मिलें चीनी के सह-उत्पादों से अच्छी कमाई करती हैं। गन्ना (नियंत्रण) आदेश के अनुसार, चीनी मिलों को 14 दिन के अंदर गन्ना भुगतान कर देना चाहिए। परंतु चीनी मिलें साल-साल भर गन्ना भुगतान नहीं करतीं और किसानों की पूंजी का बिना ब्याज दिए इस्तेमाल करती हैं। सरकार ने चीनी मिलों को अनेक प्रोत्साहन दिए हैं, इसके बावजूद मिलों ने समय पर भुगतान नहीं किया।
हर साल होने वाली इस समस्या से निपटने के लिए हमें एक अलग नीति बनाने पर विचार करना होगा। देश में चीनी का 75 प्रतिशत उपयोग व्यावसायिक प्रतिष्ठानों द्वारा किया जाता है। जिस प्रकार व्यावसायिक इस्तेमाल वाले गैस सिलिंडर का रेट घरेलू उपयोग वाले सिलिंडर से ज्यादा होता है, उसी प्रकार व्यावसायिक इस्तेमाल वाली चीनी का रेट घरेलू से ज्यादा तय कर दिया जाए, तो चीनी मिलों और गन्ना किसानों, दोनों की समस्या का हल हो सकता है। दूसरे, ब्राजील की तरह हमें भी गन्ने का प्रयोग बाजार की मांग के अनुसार चीनी, एथनॉल या अन्य उत्पादों को बनाने में नियंत्रित रूप से करना चाहिए। इससे एक तो अत्यधिक चीनी उत्पादन से बचा जा सकता है और दूसरा एथनॉल का प्रयोग पेट्रोल में मिलाकर पेट्रोलियम पदार्थों के आयात में खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा को भी कुछ बचाया जा सकता है। इससे वायु प्रदूषण भी कुछ कम होगा। ये दोनों कदम देश, सरकार, किसान और चीनी उद्योग के हित में हैं।
-लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं।