वर्ष 2018 की विश्व खुशहाली रिपोर्ट (वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट) में 156 देशों के सूचकांक में भारत का स्थान 133 है। लोग क्यों खुश नहीं हैं, इसके अनेक कारण होंगे। लेकिन एक मुख्य कारण यह है कि लोगों को उचित न्याय नहीं मिलता। जबकि कानून का उद्देश्य है अधिक लोगों को खुशहाली देना। अभी भारत में 3.3 करोड़ मुकदमे विभिन्न कोर्ट-कचहरियों में पड़े हुए हैं। कानून के जानकार बताते हैं कि अगर कोई मुकदमा होता है, तो उससे 20 व्यक्ति प्रभावित होते हैं। इस प्रकार अगर लंबित मुकदमों के हिसाब से देखें, तो लगभग 64 करोड़ लोग प्रभावित हैं। इसके अतिरिक्त एक तथ्य यह है कि 30 प्रतिशत से अधिक लोग कोर्ट-कचहरियों में नहीं जाते। इसका अर्थ यह हुआ कि बहुत सारे लोग बिना कोर्ट-कचहरी जाए स्वयं ही कुढ़ते रहते हैं और गम, परेशानी के शिकार हो जाते हैं।
इस समस्या का समाधान है, ग्रामों में न्याय पंचायत या ग्राम न्यायालयों की स्थापना करना। यह मैं कोई नई बात नहीं बता रहा हूं। भारत में अतीत से स्थानीय न्याय पर व्यवस्था चलन में थी।
गांवों में झगड़े-फसाद के तीन मुख्य कारण हैं। प्रथम, नकारात्मकता, द्वितीय गांव में वर्चस्व और गांव की संपत्ति पर कब्जा और तीसरा है, अहं। सभी झगड़े फसाद इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमते हैं। अहं को लेकर एक किस्सा याद आता है। सहारनपुर के साढौली हरिया गांव के चौधरा रोशन नेता थे, जिन्हें आसपास के गांवों में झगड़ों को निपटाने के लिए बुलाते थे। वह मामले की जांच करके पाते थे कि यह तो अहं अर्थात् मंूछों की टकराहट है। वह कहा करते थे कि 'अरे मंूछों के चक्कर को छोड़ो, आजकल जमाना बदल रहा है। आजकल नाई मूंछों को काटकर कपड़े में लेकर नाली में डाल देता है। इसलिए झगड़ेबाजी छोड़ो, क्योंकि जो तुम्हारे पास पैसा है, इसे पुलिस एवं वकील ले लेंगे। इसलिए बच्चों को पढ़ाओ और यदि लड़की जवान हो रही है, उनकी शादी करो।'
स्थानीय न्याय व्यवस्था की खूबी यह है कि लोग जानते हैं कि वास्तव में समस्या क्या है और झगड़े में दो या अधिक पक्ष हैं, उनमें किस-किस की कितनी गलती है। स्थानीय लोग एक या दो बैठकों में झगड़े का समाधान करा देते थे।
भारत में पंचायती राज व्यवस्था को स्थायी रूप एवं स्वरूप देने के लिए 73वां संविधान संशोधन अमल में लाया गया। लेकिन पंचायत न्याय व्यवस्था के बारे में भी केंद्र स्तर पर कोई कानून नहीं बना। इस अंधेरे में एक प्रकाश की किरण बिहार में ग्राम कचहरी व्यवस्था है। भारत में अकेला बिहार ही ऐसा राज्य है, जहां पर ग्राम कचहरी के चुनाव ग्राम पंचायत के साथ कराये जाते हैं। बिहार में ग्राम पंचायतों के बराबर ग्राम कचहरियों का सामाजिक दायरा बढ़ा है। ग्राम कचहरी की जमीनी स्तर की सच्चाई को जानने के लिए लेखक सीतामढ़ी, नालंदा, नवादा एवं पटना जिलों के कुछ गांवों में गया और सरपंच, पंच, कचहरी सचिव, न्यायमित्र एवं अन्य लोगों से चर्चा की। इस चर्चा से अनेक बातें सामने आईं।
प्रथम, अधिकतर झगड़े-फसाद जमीन पर कब्जे, गंदे पानी की निकासी एवं मारपीट के रहे हैं। जब से स्वच्छता अभियान चला है, शौचालय बनाने को लेकर भी कुछ फसाद हुए हैं। द्वितीय, गांवों में गांव कचहरी है, फिर भी गांवों मे पुलिस का वर्चस्व है।
इस समस्या का समाधान यह है कि जो मसले ग्राम कचहरी के अधिकार में हंै, उनको पुलिस वापस ग्राम कचहरी में भेजे, ताकि स्थानीय न्याय व्यवस्था अधिक प्रभावी बन सके। एक ग्राम कचहरी के सरपंच जितेंद्र कुमार ने बताया कि उनकी कचहरी ने 2016 से अब तक 72 मुकदमे निपटाए हैं और 30 मुकदमे प्रक्रिया में हंै। उन्होंने दुख के साथ कहा है कि उन्हें समय पर मानदेय नहीं मिलता।
लेखक भारतीय आर्थिक सेवा के पूर्व अधिकारी हैं।