मैं हर शनिवार त्रिवेणी कला संगम में होने वाली पीयूडीआर की बैठकों में जाता था। अपनी छात्रवृत्ति से मिलने वाले पैसे में से कुछ पैसा संगठन की रिपोर्ट तैयार करने के काम में भी देता था। एक बार संगठन द्वारा गठित एक जांच दल का हिस्सा बनकर एक मामले की पड़ताल के लिए भी गया। मैं पीयूडीआर का कभी कोई महत्वपूर्ण या सक्रिय सदस्य नहीं रहा। मैं केवल उसके साथ चलने वाला एक सहयात्री था- एक ऐसा समर्थक, जो संगठन के बाहरी घेरे में रहते हुए उसके काम से जुड़ा हुआ था। फिर भी मैं इस संगठन और उसके काम का बहुत सम्मान करता था, इसलिए उससे मेरा एक भावनात्मक रिश्ता बन गया था। 1990 के दशक की शुरुआत में जब मैं दिल्ली छोड़कर बंगलूरु चला गया, तो यह रिश्ता धीरे-धीरे कमजोर हो गया।
यह संगठन मेरे लिए कभी क्या मायने रखता था, इसकी पुरानी यादें तब फिर ताजा हो गईं, जब मैंने अंकिता पांडे की हाल में प्रकाशित पुस्तक ‘बिकमिंग अलाइज : सिविल लिबरटीज एक्टिविज्म इन इंडिया’ पढ़ी। पांडे ने नागरिक स्वतंत्रता संगठनों के प्रयासों को अलग नजर से देखा है। उनके अनुसार इसका अर्थ है- हाशिये पर पड़े या वंचित समूह के साथ एकजुटता में ऐसे लोगों द्वारा सामूहिक रूप से काम करना, जिनका उस मामले से कोई निजी या आर्थिक हित जुड़ा नहीं है।
उनका कहना है कि भारत में नागरिक स्वतंत्रता आंदोलन मोटे तौर पर दो दिशाओं में आगे बढ़ा। पहला समूह नागरिकों के उन अधिकारों की रक्षा पर जोर देता है, जिन्हें भारतीय संविधान ने मान्यता दी है। दूसरा समूह यापक सामाजिक और आर्थिक अधिकारों की मांगों के समर्थन में आवाज उठाता है। स्वतंत्र भारत में नागरिक स्वतंत्रता के लिए काम करने वाले संगठनों में सबसे पुराना संगठन कोलकाता का एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (एपीडीआर) है, जिसकी शुरुआत 1970 के दशक में हुई।
उसकी शुरुआती मांगों में एक नक्सलवादी आंदोलन से जुड़े कैदियों के साथ जेलों में मानवीय व्यवहार को लेकर थी। इन कैदियों ने खुद ‘बीड़ी-चिट्ठी आंदोलन’ शुरू किया था। वे जेल में बीड़ी-सिगरेट पीने और अपने दोस्तों एवं परिवार के लोगों से चिट्ठियां पाने की सुविधा की मांग कर रहे थे।
भारत में मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले अन्य महत्वपूर्ण संगठनों में ‘पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज’ (पीयूसीएल) भी शामिल है। इसके अलावा ‘आंध्र प्रदेश सिविल लिबर्टीज कमेटी’, आंध्र प्रदेश में सक्रिय ह्यूमन राइट्स फोरम और मुख्य रूप से महाराष्ट्र में काम करने वाली ‘कमेटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स’ (सीपीडीआर) भी महत्वपूर्ण संगठन हैं। सीपीडीआर के संस्थापकों में सामाजिक कार्यकर्ता असगर अली इंजीनियर भी शामिल थे। पांडे की पुस्तक का एक महत्वपूर्ण अध्याय उन तथ्य और जांच रिपोर्ट्स पर केंद्रित है, जिन्हें वे भारत में नागरिक स्वतंत्रता संगठनों की गतिविधियों का सबसे प्रमुख माध्यम मानती हैं। इन रिपोर्ट्स का उद्देश्य हिंसा को बढ़ावा देने तथा नागरिकों की सुरक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारों के उल्लंघन में राज्य और उसके अधिकारियों की क्या भूमिका है, उसे सामने लाना था।
इन रिपोर्ट्स को तैयार करने के लिए नागरिक स्वतंत्रता संगठन कुछ लोगों की टीम को संबंधित घटनास्थल पर भेजते हैं। ये टीमें मौके पर जाकर घटनाओं की जांच करती हैं, लोगों से बातचीत करती हैं और उपलब्ध तथ्यों तथा गवाहियों के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार करती हैं। पीयूडीआर और एपीसीएलसी जैसे संगठनों के कई प्रमुख कार्यकर्ता महिलाएं भी रही हैं। लेकिन उनके कुछ पुरुष सहयोगियों का मानना था कि इन संगठनों का ध्यान केवल राज्य द्वारा नागरिकों के खिलाफ की जाने वाली सार्वजनिक हिंसा पर होना चाहिए। उनका तर्क था कि परिवार या घर के भीतर होने वाली हिंसा उनके काम का विषय नहीं होनी चाहिए। महिला कार्यकर्ताओं ने इस सोच पर सवाल उठाया। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि भारत के कई हिस्सों में दहेज के कारण होने वाली महिलाओं की मौतों की संख्या भी बेहद गंभीर स्तर पर थी और इसे नागरिक अधिकारों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। धीरे-धीरे इन संगठनों ने इस तर्क को स्वीकार किया कि महिलाओं के अधिकार भी लोकतांत्रिक अधिकारों के व्यापक ढांचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसके बाद उन्होंने महिलाओं के अधिकारों और उनके खिलाफ होने वाली हिंसा को भी अपने काम के दायरे में शामिल करना शुरू किया।
अंकिता पांडे अपनी पुस्तक में लिखती हैं कि नागरिक स्वतंत्रता संगठनों से जुड़े लोग मुख्य रूप से तीन पेशों से आते हैं—अकादमिक, पत्रकारिता और कानून। वे नौकरीशुदा हैं, लेकिन त्याग और आदर्शवाद की भावना उन्हें प्रेरित करती है। उनका उद्देश्य भारत को एक अधिक न्यायपूर्ण और मानवीय समाज बनाना है। इन लोगों के व्यक्तित्व की एक खास विशेषता यह होती है कि वे अपने योगदान को बहुत बड़ा करके पेश नहीं करते, बल्कि अक्सर अपनी भूमिका को कम करके आंकते हैं। पांडे ने कार्यकर्ता और वकील सुधा भारद्वाज का उदाहरण दिया है। वे दो प्रतिष्ठित शिक्षाविदों की बेटी हैं और स्वयं कानपुर आईआईटी से पढ़ी हैं। अपनी गिरफ्तारी और जेल में बिताए समय के बारे में उन्होंने कहा था कि तीन साल जेल में रहना निश्चित रूप से पीड़ादायक था, लेकिन अधिक दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में बहुत से लोग थे। उनका ध्यान उन्हीं लोगों की ओर चला जाता था। उनका कहना था कि जब आप अपने आसपास इतनी अधिक पीड़ा और बदहाली देखते हैं, तो अपनी तकलीफ के बारे में दुखी रहना मुश्किल हो जाता है, तब आपको दूसरों की मदद करनी होती है।
अपने योगदान को पीछे रखने और उसका श्रेय न लेने की यही प्रवृत्ति लंबे समय तक ‘पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स’ की गतिविधियों की प्रमुख प्रेरक शक्ति रहे दिवंगत सीवी सुब्बा राव में भी दिखाई देती थी। अंकिता पांडे की पुस्तक में उनका उल्लेख नहीं मिलता, जबकि पुस्तक की शुरुआत ही 1984 के सिख विरोधी दंगों पर तैयार की गई ऐतिहासिक रिपोर्ट ‘हू आर द गिल्टी’ से होती है। इस रिपोर्ट को तैयार करने में सुब्बा राव की महत्वपूर्ण भूमिका थी। सुब्बा राव को वास्तव में समझने के लिए उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलना और उन्हें करीब से देखना जरूरी था। तभी यह जाना जा सकता था कि वे वास्तव में क्या थे। इन कमियों के बावजूद, अंकिता पांडे की किताब भारत के नागरिक स्वतंत्रता आंदोलन का समग्र और उपयोगी परिचय प्रस्तुत करती है। इसे दिवंगत नीलांजन दत्ता की पुस्तक ‘सिविल लिबर्टीज मूवमेंट इन इंडिया : फ्रॉम कॉलोनियल टाइम्स टू द प्रजेंट’ के साथ पढ़ा जा सकता है। ये दोनों पुस्तकें उपयोगी हैं। मेरा मानना है कि आज पहले से कहीं अधिक नागरिक स्वतंत्रता के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं की जरूरत है।