नगा विद्रोही गुटों के साथ 22 वर्षों की वार्ता के बाद ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार इस 72 वर्षीय समस्या के समाधान के नजदीक पहुंच गई है। मोदी सरकार और एनएससीएन (इसाक-मुइवा) गुट के बीच 2015 में हुए फ्रेमवर्क एग्रीमेंट के बाद अलग झंडे और अलग संविधान की विद्रोहियों की मांग जैसे जटिल मुद्दों के कारण यह वार्ता टूट गई थी। इसी के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने वार्ताकार ( और अब नगालैंड के राज्यपाल) आर एन रवि को अंतिम समाधान के लिए तीन महीने का वक्त दिया था, जो कि 31 अक्तूबर को खत्म हो गया। जब एनएससीएन सुप्रीमो थुइंगलेंड मुइवा ने जोर दिया कि उनका गुट तब तक समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेगा, जब तक कि भारत नगालैंड को एक पृथक झंडा और पृथक संविधान देने को राजी न हो जाए, तो रवि ने धमकी दी कि वह छोटे नगा गुटों के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर कर देंगे, फिर चाहे एनएससीएन (इसाक-मुइवा) का गुट इसमें शामिल हो न हो।
नगा होहो या काउंसिल ऑफ ट्राइबल एल्डर्स और अन्य महत्वपूर्ण नागरिक समाज गुट मुइवा का समर्थन कर रहे थे, जिससे लगने लगा था कि नगा समस्या कभी खत्म नहीं होगी। मुइवा के बिना छोटे गुटों के साथ किसी भी तरह का समाधान हादसा साबित होगा। एनएससीएन (आई-एम) के पास न केवल छह हजार से सात हजार सशस्त्र लड़ाकों की अनुशासित गुरिल्ला फोर्स है, बल्कि नगालैंड के बड़े हिस्से और पड़ोसी राज्यों के नगा बहुल इलाकों में उसका प्रभाव है। जबकि 1997 के शांति समझौते पर जब हस्ताक्षर किए गए थे, तब उसके पास महज ढाई से तीन हजार लड़ाके थे। एनएससीएन (आई-एम) भारतीय सुरक्षा तंत्र के लिए एक चुनौती है। मुइवा और उनके तांगखुल आदिवासी समुदाय को नगालैंड में 'बाहरी' बताकर (तांगखुल आदिवासी प्रायः पूर्वी मणिपुर में बसे हुए हैं) उन्हें अलग-थलग करने की कोशिश पूर्वोत्तर के आदिवासी विद्रोह से निपटने के लिए भारतीय राज्य ने बांटो और राज करो की नीति के तहत आगे बढ़ाया जिससे अतीत में ताकतवर विद्रोही गुटों को तोड़ने में मदद मिली। ऐसे गुटों में नगा नेशनल काउंसिल और नगा आर्मी भी शामिल थे, जिन्हें कभी दुर्जेय माना जाता था।
लेकिन पूर्वोत्तर में युद्ध और शांति के सात दशक के सफर का कोई एक सबक दिल्ली के लिए है, तो वह यह कि बांटों और राज करो की नीति या चाणक्य का 'भेद' किसी ताकतवर आंदोलन को सैन्य तरीके और अस्थायी तौर पर नियंत्रित करने में कारगर होता है, लेकिन विभाजित और विखंडित आंदोलन एक बड़ी चुनौती है और जब राज्य इसका अंतिम राजनीतिक समाधान चाहता है, तो इसे नियंत्रित करना आसान नहीं है। इससे समझा जा सकता है कि आखिर क्यों मिजोरम में एमएनएफ के साथ 1986 में हुए समझौते के बाद शांति कायम हुई, जो कि मुख्यधारा की राजनीति में वापस आ चुका है, और क्यों नगालैंड में अंतिम समाधान में इतना वक्त लग रहा है।
ऐसा हो सकता है कि मोदी ने 31 अक्तूबर की समय सीमा इसलिए रखी, ताकि मुइवा पर दबाव बनाया जा सके और वह अलग झंडे और अलग संविधान की मांग से पीछे हट जाएं। आखिर मोदी कश्मीर में उन्होंने जो कुछ किया है, उसके बाद नगाओं को एक पृथक झंडा और एक पृथक संविधान देने के लिए कैसे राजी हो सकते हैं? ऐसा किया गया, तो ताकतवर राष्ट्रवाद की हवा ही निकल जाएगी। लेकिन मुइवा को बाहर रखने की नादानी से होने वाले नुकसान का एहसास कर सरकार आखिरकार नगाओं को निजी कार्यक्रमों में अपना ध्वज फहराने की इजाजत देने को राजी हो गई, लेकिन सरकारी कार्यालयों या सरकारी कार्यक्रमों में इसे नहीं फहराया जा सकेगा। यह एक सांकेतिक रियायत है, जिसमें तात्विकता नहीं है, लेकिन इसने मुइवा का मकसद पूरा कर दिया। एक बार जब उनका गुट समझौते पर हस्ताक्षर कर देगा और बाहर निकलकर खुद को राजनीतिक तौर पर पेश करेगा, तो यही झंडा मुइवा को खुद के नेतृत्व में एकीकृत नगालैंड के उनके लक्ष्य को आगे बढ़ाने में मदद करेगा, भले ही वह खुद तांगखुल क्यों न हों। चूंकि संकेत यही है कि एनएससीएन (आई-एम) और छह छोटे गुटों का नगा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप (एनएनपीजी) अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, ताकि यह सुनिश्चित हो कि कोई भी विद्रोही गुट न छूटे, और मुइवा खुद को शानदार तरीके से राजनीति के मैदान में उतार सकें।
1966 में सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व करने से पहले ही एमएनएफ एक राजनीतिक पार्टी थी। अपने गुट को उसकी तरह राजनीतिक पार्टी में बदलने की चाहत के लिए मुइवा को त्याग करना होगा। यदि वह नगा समाज में व्यापक सहमति चाहते हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि समझौता टिकाऊ हो तो फिर उन्हें अपने गुटीय हितों से ऊपर उठकर विभिन्न नगा विद्रोही गुटों और राजनीतिक गुटों को एक वृहत नगा राजनीतिक मंच में एकीकृत करने के लिए आगे आना होगा, ताकि गुटों में आपसी टकराव न हो। इससे नगाओं को प्रस्तावित क्षेत्रीय परिषद (जिसका स्वरूप अभी तय नहीं) को तीव्र आदिवासीवाद के ऐतिहासिक संकट के खिलाफ अपनी उप-राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने में मदद मिलेगी।
लेकिन मुइवा की सबसे बड़ी चुनौती तीन पड़ोसी राजों से निपटने की होगी। मणिपुर, असम या अरुणाचल प्रदेश से यदि कुछ हिस्सा निकलता है, तो उस पर तीखी प्रतिक्रिया हो सकती है। रवि ने कहा है कि मुइवा के गुट को इसे नियंत्रित करना होगा, जबकि यह ऐसा काम है, जो चीन में प्रशिक्षित और युन्नान तक कई लांग मार्च में हिस्से लेने वाले विद्रोही नेता को रास नहीं आएगा। नगालिम के अपने सपने को उन्हें उन राज्यों से बातचीत के लिए छोड़ना पड़ा है, जो इस विचार के विरोधी हैं, लेकिन मुइवा अब इस स्थिति में भी नहीं हैं कि वह बातचीत से खुद को अलग कर लें। एक समाधान सामने दिख रहा है, लेकिन जब तक समझौता अंतिम रूप न ले ले, इंतजार करना होगा। अच्छा संकेत यह है कि न तो मुइवा और न ही मोदी चाहेंगे कि वार्ता विफल हो, कश्मीर के विपरीत जहां वार्ता को मौका ही नहीं दिया गया।