एनसीईआरटी द्वारा ग्यारहवीं के छात्रों के लिए प्रकाशित समाजशास्त्र की पाठ्यपुस्तक में बाबा साहेब अंबेडकर के एक पुराने कार्टून को लेकर हाल में बड़ा हड़कंप मचा। कुछ सांसदों ने प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर के इस (पचास बरस पुराने) कार्टून को संविधान निर्माण की सुस्त चाल पर कटाक्ष की बजाय उसे जातिवादी सामंती मनोवृत्ति से प्रेरित और दलित जन की छवि मलिन करने वाला बताया और उसे तुरंत किताब से हटाने की मांग कर दी।
बावेला बढ़ता देख सरकार ने वही किया, जो वह ऐसे मौकों पर करती है। यानी शिक्षाविद् सुखदेव थोराट की अगुआई में समाजशास्त्र की छह पाठ्यपुस्तकों की सामग्री की शैक्षिक नजरिये से पड़ताल और जरूरी सुधार-निर्देश देने का काम एक छह सदस्यीय जांच कमीशन को दे दिया गया। कमीशन की रपट अभी आई है और उसके अनुसार राजनेताओं के आरोप जायज हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार समिति के दो सदस्यों ने फोन पर ही रपट को अपनी स्वीकृति दी थी। बस एक सदस्य, एमएसएस पनाडियन ने इस तरह की सेंसरशिप के खिलाफ अपनी तीन पेज की असहमति दर्ज कराई। समिति ने कथित तौर से तेरह और विशेषज्ञों की राय भी ली, जिनका रपट में उल्लेख भर है। चालीस पेजी रपट के अनुसार समिति ने करीब इक्कीस चित्रों और कार्टूनों तथा अनेक अन्य टिप्पणियों को ‘शैक्षिक तौर से अनुचित’ पाया और छात्र हित में उनको पाठ्यपुस्तकों से हटाने का सुझाव दिया है। असहमत सदस्य पनाडियन का पत्र अंत में संलग्नक के बतौर लगाया गया है, पर उनका नाम मूल रपट से गायब है।
पनाडियन की राय में, वह एक अभिभावक होने के साथ शिक्षक भी हैं और समिति द्वारा रेखांकित सामग्री में उनको कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा। यह अंश व्यंग्य के माध्यम से छात्रों की प्रश्न पूछने की आदत को बढ़ावा देते हुए प्रकारांतर से शिक्षा को समाज में सार्थक बदलाव का कारगर माध्यम बना सकने का काम करते हैं। किसी को आहत करना इस तरह के कार्टूनों का उद्देश्य नहीं होता।
राजनीतिक कार्टूनों को शिक्षण सामग्री के लिए अभद्र और अनुपयोगी मानने वाली थोराट समिति की यह रपट यदि लागू होती है, तो वह भारतीय शिक्षा में हास्य-व्यंग्य विधा के नाम एक शोकगीत ही लिखेगी। जिस देश में हजार बरस पहले सामंतवाद के बावजूद,'अर्थशास्त्र' पुस्तक के लेखक चाणक्य ने कुशीलव (नाटककारों अभिनेताओं के) समुदाय को जब जरूरी लगे किसी भी जाति, धर्म या ख्यातनामा व्यक्ति के अहंकारी या हास्यास्पद कारनामों की सार्वजनिक खिल्ली उड़ाने का अधिकार दे दिया था, वहां बीसवीं सदी के उदार लोकतांत्रिक संविधान द्वारा दिए गए अभिव्यक्ति के हक पर तालाबंदी की यह पैरवी एक अशनिकारक संकेत देती है।
कक्षाओं में राज-समाज के इतिहास पर खुली चर्चा छेड़ने से बचा गया, तो आगे जाकर पाठ्यपुस्तकें छात्रों में राजनेताओं और जाति धर्म को लेकर संकीर्णता और नेता प्रजाति को लेकर अंधभक्ति को ही बढ़ावा देंगी। और तब राममोहन राय से लेकर राममनोहर लोहिया तक के दिखलाए खुले दिमाग और बड़े दिलवाले भारत के सपने का कचूमर निकल जाएगा।
जो लोग बहुआयामी पाठों के माध्यम से छात्रों को राष्ट्र निर्माण की जटिल प्रक्रिया पर नई दृष्टि देने की बजाय पाठ्यक्रम में जाति, धर्म, राजनीतिक छवि का हवाला देते हुए मिश्रित सभ्यता संस्कृति के नाम पर बनाया गया गड़बड़झाला बरकरार रखने का सुझाव देते हैं, वे बमुश्किल बनती राष्ट्रीय एकता में अलगावमूलक अंधभक्ति की दरारें खोलते हैं। अराजक खिचड़ीपन से प्राणवायु खींचनेवाली वोट बैंक राजनीति के समर्थकों को हाय, अमुक की भावना आहत हुई, के इस दर्शन से लगातार ओट मिली है, जबकि कानून और एकता की कीमत चुकाने के समर्थकों की असहमति अगर हुई भी, तो बस पीछे कहीं दर्ज कर ली गई है। इसके व्यावहारिक फलों पर टीवी से निकलते कुछ बेतुके वार्तालाप प्रकाश डालते हैं:
-आतंकियों के खिलाफ केंद्रीय बल क्यों भेजे जाएं? वे तो हमारे ही लोग हैं।
-केंद्रीय बल बिना राज्य सरकार के कहे नहीं भेजे जाते। फिर वे सब घोषित तौर से देश की एकता संप्रभुता को तोड़ना चाहते हैं।
-पर किसी मुठभेड़ में स्थानीय लोग चिह्नित या हमलावर हताहत हुए, तो उससे हमारी जातिगत धर्मगत बहुलता भी तो आहत होगी।
-नागरिकों की सुरक्षा जरूरी है, पर आतंकियों के मानवाधिकारों का हनन क्यों हो? क्यों नहीं इलाके में विकास लाया जाता?
-मानवाधिकार आतंकियों के द्वारा हताहत नागरिकों सैनिकों के भी होते हैं, जिनकी फेहरिस्त कहीं बड़ी है। इलाके का विकास तब होगा जब असुरक्षा अशांति खत्म हो। फिलवक्त वहां खेती नहीं हो सकती और सड़कें स्कूल आतंकी निशानों पर हैं। लंबी सरकारी पड़ताल के बाद स्वीकृत किए गए कारखाने भी कई जगह लगने नहीं दिए गए कि उससे खेतिहर (?) या आदिवासी और जंगल उजड़ जाएंगे। सच यह है कि जंगल या जमीन वहां बचे ही नहीं, कब के कट बिक गए हैं।
-तो क्या? कागजों पर तो वह इलाका आज भी जंगल ही है। जिन गरीबों ने जमीन बेची, वे बरगलाए गए थे।
यों अकसर शहर से आए धरना- प्रदर्शनकारी जत्थों की भी जय-जय करते हैं, और इलाके के भूखे बेरोजगार लोगों की भी। फिर वे टीवी कैमरों के आगे गाते हैं कि हो हो मन में है, विश्वास पूरा है विश्वास, कि होगी शांति चारों ओर एक दिन? कैसे? क्या किसी गैबी चमत्कार से घर-घर में रोजगार, बिजली-पानी कंप्यूटर आ जाएंगे?
इकतरफा तर्कों की इस बेतुकी शृंखला के बूते कई बार जाति-धर्म के आधार पर जनता को लामबंद कर उनके मतों से चुनाव जीत चुके जन मीडिया को आश्वस्त करते हैं कि भारत आज भी एक धर्म-जाति निरपेक्ष लोकतंत्र है। काला पैसा ले-देकर बिल पास कराने, घर खरीदने, बच्चों की भव्य शादियां आयोजित कराने और जातीय आरक्षण की परिधि येन-केन बढ़वाने के इच्छुक मतदाता भी उनको समर्थन देते हैं।
वे एकमत हैं कि देश आज दिशाहीन है। पर पाठ्यपुस्तक में किसी कार्टून में टस से मस न हो रही देश की गाड़ी को कोई खिजलाया जन लात मारे या उस पर चाबुक चलाए, कोई फटेहाल भिखारी नेता के आगे कटोरा रख दे या कोई मुख्यमंत्री धार्मिक चिह्नों वाली कुरसी को हाथ जोड़ता दिखे, तो गरजकर कहा जाता है कि क्या इससे राष्ट्रीय एकता खतरे में नहीं पड़ती? नेताओं की छवियां नहीं बिगड़तीं? कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या?