हमारे नीतिशास्त्रों में कई ऐसे प्रसंग हैं, जिनमें सीख दी गई है कि वेशभूषा से कोई महान नहीं बनता, बल्कि विचार ही लोगों को समाज में ऊंचा स्थान दिलाते हैं। जो व्यक्ति नए-नए विचार आत्मसात करता है, वह स्वतः विद्वानों की संगति का पात्र बन जाता है।
विख्यात संत स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी का नाम उन दिनों मदनमोहन था। वह आगरा के एक कॉलेज में शिक्षा प्राप्त करने पहुंचे। अंग्रेज शिक्षक ने देखा कि एक युवक खादी की धोती तथा गलबंदी (ब्रजवासियों का विशेष प्रकार का कुर्ता) पहने, माथे पर तिलक लगाए कक्षा में विराजमान है। शिक्षक उसकी वेशभूषा देखकर भौंचक्का रह गया। उसने संकेत कर छात्र को पास बुलाकर अंग्रेजी में कोई प्रश्न किया। छात्र ने अंग्रेजी में ही उत्तर दिया। यह देखकर शिक्षक ने कहा, तुम्हें ब्रिटिश वेशभूषा में कक्षा में आना चाहिए।
छात्र ने उत्तर दिया, मैं अपने देश में, अपनी वेशभूषा में कॉलेज क्यों नहीं आ सकता? अंग्रेज शिक्षक चुप हो गए। बाद में उसने मदनमोहन की असाधारण प्रतिभा देखकर भविष्यवाणी की कि यह छात्र आगे चलकर ख्याति प्राप्त करेगा। और आगे चलकर यही मदनमोहन आध्यात्मिक जगत में स्वामी कृष्णबोधाश्रम के नाम से विख्यात हुए। स्वामी जी ने 1942 में गांव-गांव पहुंचकर स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग की प्रेरणा दी।