फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

नई भूमिका में नड्डा

के. एस. तोमर Published by: Raman Singh Updated Thu, 23 Jan 2020 06:35 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
के. एस. तोमर - फोटो : a

पूर्व अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने 19 राज्यों में सत्ता पर कब्जा जमाकर नई ऊंचाई हासिल की। ऐसे में, नए राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा को भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जिनमें कैडर की वर्तमान गति बनाए रखना, पार्टी के घटते जनाधार पर रोक लगाना-जिसकी शुरुआत राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड में सत्ता गंवाने से हुई है, पार्टी की प्रगति सुनिश्चित करना और पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल करना तथा शाह की आक्रामक चुनावी मशीनरी को संरक्षित करने के साथ-साथ संगठन में अनुशासन बनाए रखना शामिल है।



पूर्व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के छह वर्षों के कार्यकाल को अलग-अलग तरीके से याद किया जाएगा। उनके नेतृत्व में एक के बाद एक राज्य पार्टी के खाते में आए, जिसने इतिहास रच दिया। नड्डा को मोदी और शाह के साथ समान तालमेल बनाना होगा, ताकि पश्चिम बंगाल पर विजय  के अधूरे एजेंडे को पूरा किया जा सके और बिहार, उत्तर प्रदेश में सत्ता बरकरार रखी जा सके। प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन में अमित शाह ने प्रौद्योगिकी और सोशल मीडिया के अधिकतम उपयोग पर ध्यान केंद्रित किया था, ऐसे में, पार्टी के नए अध्यक्ष को भी विरोधी पार्टियों को पछाड़ने के लिए इस विरासत को जारी रखना होगा। सूचना प्रौद्योगिकी में नड्डा की भी रुचि है, जो युवा पीढ़ी से जुड़ने में उनकी मददगार साबित होगी।


पार्टी की गिरावट पर रोक लगाना और उर्ध्वगामी विकास को संरक्षित करना नड्डा के लिए बड़ी चुनौती होगा। झारखंड का नकारात्मक नतीजा भाजपा के लिए चेतावनी की घंटी है। वह पूरी तरह से मोदी के करिश्मे पर निर्भर नहीं रह सकती।  अमित शाह के राष्ट्रवाद के साथ राम मंदिर और अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दे भी नहीं चल पाए। सत्ता में रहने या सत्ता पाने के लिए संबंधित मुख्यमंत्री का प्रदर्शन पैमाना हो सकता है। हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा चूंकि उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाई, ऐसे में, नड्डा को पश्चिम बंगाल में ममता सरकार को अस्थिर करने के लिए आक्रामक तेवर अपनाने के अलावा बिहार और उत्तर प्रदेश में जीत सुनिश्चित करने पर भी  ध्यान देना होगा।


पर्यवेक्षकों का कहना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष अधिकारियों के साथ घनिष्ठ संबंध होने के कारण नड्डा को भावी लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी। पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को उत्तर प्रदेश में 72 सीटें मिली थीं, जिसके पीछे प्रदेश प्रभारी नड्डा का बड़ा योगदान था। लेकिन बतौर अध्यक्ष नड्डा की सबसे बड़ी चुनौती भी इसी प्रदेश में है, क्योंकि पर्यवेक्षकों के मुताबिक, यहां सब कुछ ठीक नहीं है। भाजपा के मौजूदा गठबंधन सहयोगियों को बचाए रखने के लिए भी सबकी नजरें नड्डा पर होंगी, क्योंकि सीएए और एनआरसी के मुद्दे पर अकाली दल ने भाजपा से असहमति जताई है। नए गठबंधन बनाना नड्डा की परीक्षा होगा, जो क्षेत्रीय दलों को समायोजित करने पर निर्भर है, क्योंकि किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए अपने बूते पर चुनाव लड़ना मुश्किल होता ज रहा है।


नड्डा को अपने पूर्ववर्ती शाह द्वारा हासिल की गई ऊंचाइयों को बरकरार  रखना होगा, जो उनकी चतुराई और संगठन कौशल को देखते हुए असंभव भी नहीं लगता। मोदी-शाह की जोड़ी के ठोस मार्गदर्शन और समर्थन के अलावा नड्डा को पार्टी में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाने का भी लंबा अनुभव हासिल है। इसलिए वह हर कीमत पर अपनी नई भूमिका में सफलता हासिल करना चाहेंगे।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next