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संस्कृति के पन्नों से: अगस्त्य ने वातापि को कैसे मारा, पितरों की मुक्ति को पत्नी की शर्त पूरी करने के लिए

आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 14 Jul 2024 06:34 AM IST

सार

महर्षि ने पत्नी से संतान उत्पन्न करने की बात छेड़ी, तो लोपामुद्रा बोली, ‘ऋषिवर, मैं संतानोत्पत्ति के लिए तैयार हूं, किंतु पहले मुझे धन, आभूषण और वस्त्र लाकर दीजिए। मैं दीन-जीर्ण अवस्था में समागम नहीं करना चाहती!’
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महर्षि अगस्त्य (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला


पितरों की मुक्ति के लिए लोपामुद्रा की शर्त पूरी करना अनिवार्य था। आखिरकार अगस्त्य ने किसी राजा से धन मांगने का निश्चय किया। शर्त यह थी कि जिस राजा के आय-व्यय का हिसाब बराबर होगा, उससे धन नहीं लिया जाएगा, क्योंकि ऐसा करने से उस राज्य की प्रजा के हितों की हानि होगी। यह सोचकर अगस्त्य, अनेक राजाओं के पास गए, किंतु सबके आय-व्यय का हिसाब बराबर मिला। तब त्रसदस्यु नामक एक राजा ने अगस्त्य को इसका उपाय बताया-‘इल्वल और वातापि नाम के दो असुर भाई हैं। वह अवश्य आपकी सहायता करेंगे। परंतु किसी ब्राह्मण ने दोनों भाइयों को आशीर्वाद देने से मना कर दिया था। तभी से दोनों असुर ब्राह्मणों का वध करने में लगे हैं। पहले इल्वल आसुरी शक्ति से अपने भाई वातापि को बकरा बनाता है, फिर उसे ही काटकर उसका मांस भोजन में मिलाकर ब्राह्मण को खिला देता है। इल्वल के पास एक और शक्ति है कि वह जिस मृत प्राणी को उसके नाम से पुकारता है, वह जीवित होकर पुन: प्रकट हो जाता है। इस तरह, वातापि का मांस ब्राह्मण को परोसने के बाद इल्वल जैसे ही वातापि का नाम पुकारता है, तो वातापि पुनः जीवित हो जाता है और ब्राह्मण का पेट फाड़कर बाहर आ जाता है और ब्राह्मण की तत्काल मृत्यु हो जाती है! इस तरह दोनों भाई अनेक ब्राह्मणों की हत्या कर चुके हैं।'

  • अगस्त्य मुस्कराए और इल्वल-वातापि से धन मांगने चल पड़े। अगस्त्य को देखते ही दोनों भाई प्रसन्न हो गए। अगस्त्य ने इल्वल के सामने जैसे ही धन की मांग रखी, वह तत्काल धन देने को तैयार हो गया।


इल्वल बोला, ‘मुनिवर! आपको जितना धन चाहिए, मैं दूंगा। परंतु पहले आप मेरे यहां भोजन करके मुझे कृतार्थ करें।' उसने अपनी पुरानी चाल चली। भाई वातापि का मांस भोजन में मिलाकर अगस्त्य को परोस दिया। अगस्त्य ने चुपचाप भोजन खाया। फिर वह इल्वल से बोले, ‘इल्वल, मैंने भोजन कर लिया है। अब मुझे धन दे दो, तो मैं चलूं।’


इल्वल जोर से हंसा। उसने आवाज लगाई, ‘वातापि! बाहर आओ!’ लेकिन वातापि नहीं आया। इल्वल ने कई बार वातापि का नाम पुकारा, लेकिन कुछ नहीं हुआ। अब हंसने की बारी अगस्त्य की थी! उन्होंने इल्वल से कहा, ‘मुझे पता है कि तुमने वातापि को मारकर उसका मांस मेरे भोजन में मिलाया था। परंतु तुम्हारा भाई अब वापस नहीं आएगा, क्योंकि मैं उसे खाकर पचा चुका हूं!’


अगस्त्य बोले, ‘इल्वल! यदि मैं समुद्र में छिपे कालकेयों को मारने के लिए एक घूंट में समुद्र का पानी पीकर उसे पचा सकता हूं, तो तुम्हारा भाई क्या चीज है! उसे भूल जाओ। मुझे जल्दी से धन दो, मुझे विलंब हो रहा है।’


इल्वल ने चुपचाप अगस्त्य को प्रचुर धन दे दिया, जिसे लेकर अगस्त्य अपनी पत्नी लोपामुद्रा के पास आ गए। धन पाकर लोपामुद्रा बहुत प्रसन्न हुई। इसके बाद लोपामुद्रा ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम दृढ़स्यु रखा गया। दृढ़स्यु के जन्म का समाचार सुनकर अगस्त्य के पितरों को शांति मिल गई। उन्होंने अगस्त्य को आशीर्वाद दिया और फिर वे सब परलोक सिधार गए।

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