जिस सूची को प्रायः स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय की शीर्ष दो फीसदी वैज्ञानिकों की सूची कहा जाता है, वह वैज्ञानिक जॉन इओनिडिस और उनके सहयोगियों द्वारा विकसित उद्धरण, यानी साइटेशन आधारित डाटाबेस है। इसमें शोधपत्रों को मिले साइटेशन, एच-इंडेक्स और सहलेखन जैसे मानकों के आधार पर वैज्ञानिकों का समग्र स्कोर तय किया जाता है। उनके पूरे कॅरिअर और किसी एक वर्ष के उद्धरण प्रभाव के लिए अलग-अलग आंकड़े उपलब्ध होते हैं। इसलिए, इसे वैज्ञानिक प्रतिभा की सार्वजनिक परीक्षा या कोई प्रतिष्ठित पुरस्कार समझना तथ्यात्मक रूप से गलत है। यहां सबसे बड़ी समस्या वैज्ञानिक गुणवत्ता और उद्धरणों की संख्या को लगभग समानार्थी मान लेने की है। किसी शोधपत्र को अधिक उद्धृत किए जाने के कई कारण हो सकते हैं।
यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि उसका वैज्ञानिक निष्कर्ष सही है या फिर उससे समाज को कोई लाभ हुआ है। पर, जब साइटेशन बढ़ाना ही अकादमिक सफलता का मकसद बन जाता है, तो शोधपत्रों व संदर्भों की संख्या बढ़ाने के प्रलोभन भी पैदा होते हैं। निजी महत्वाकांक्षा ही नहीं, विश्वविद्यालयों की मूल्यांकन प्रणालियां भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। जब नियुक्ति, पदोन्नति, शोध अनुदान, संस्थागत प्रतिष्ठा और प्रदर्शन मूल्यांकन में संख्यात्मक उपलब्धियों को ज्यादा महत्व मिलने लगे, तो स्वाभाविक ही कृत्रिम साइटेशन की बाढ़ आ जाती है। इसलिए, वैश्विक स्तर पर शोध मूल्यांकन की ऐसी प्रणालियों की आलोचना बढ़ रही है।
हमारे देश में प्रदूषित नदियां, महानगरों की जहरीली हवा, जल संकट, सस्ती स्वास्थ्य तकनीक, कृषि की अनिश्चितता, जलवायु परिवर्तन और ग्रामीण क्षेत्रों की तकनीकी जरूरतें वैज्ञानिक हस्तक्षेप का इंतजार कर रही हैं। यदि कोई विश्वविद्यालय अपने 50 शिक्षकों के शीर्ष दो फीसदी वैज्ञानिकों के सूची में आने का उत्सव मनाता है, तो समाज को यह पूछने का भी हक है कि इन शोधों से किन समस्याओं के समाधान में योगदान मिला। वैज्ञानिक उत्कृष्टता के लिए आधुनिक प्रयोगशालाएं, शोध की स्वतंत्रता, नैतिकता, दीर्घकालिक निवेश और असफलताओं को स्वीकारने वाली संस्कृति जरूरी है। केवल रैंकिंग के आधार पर संस्थान की वैज्ञानिक श्रेष्ठता घोषित करना अधूरी तस्वीर प्रस्तुत करना है।
इसके लिए भारतीय विश्वविद्यालयों को अपनी मूल्यांकन प्रणाली में बुनियादी बदलाव करने होंगे। भारत को ऐसे वैज्ञानिक चाहिए, जो कठिन सवाल पूछने का साहस रखते हों, स्थापित मान्यताओं को चुनौती दे सकें और ज्ञान की नई सीमाएं खोल सकें।