अनुभवी लड़ाकू पायलट देब गोहेन लिखते हैं, ‘जैसे ही मीटर गेज की ट्रेन धीरे-धीरे अंधेरे प्लेटफॉर्म पर पहुंचती है, कोई यह सुनिश्चित नहीं कर सकता कि यह सही स्टेशन है या नहीं। हालांकि, जब यात्री प्लेटफॉर्म पर मौजूद साइनबोर्ड की एक झलक पाने के लिए अंधेरे में झांकते हैं, तो वे एक सफेद दाढ़ी वाले बूढ़े आदमी को लालटेन के साथ प्लेटफॉर्म पर एक छोर से दूसरे छोर तक चलते हुए देखते हैं, जो धीमी आवाज में घोषणा करता है-हा...शि...मा...रा...। किसी को नहीं पता कि वह भूत था या कल्पना'। इस दयालु बूढ़े व्यक्ति की पेंटिंग देब गोहेन ने बनाई थी, जिसने इतिहास रच दिया। एक और विवरण देखिए-‘यह मार्च 1971 की बात है। मैं बंबई से नई-नई शादी करके आया था। ट्रेन आधी रात के बाद आती है। हमारा डिब्बा छोटे प्लेटफॉर्म से काफी दूर है, और मैं जीवन के किसी संकेत के लिए हताश होकर बाहर झांक रहा हूं। लड़के हमारे हाथों में शराब के गिलास थमा रहे हैं और कुछ डिब्बों को पीटते हुए ‘स्वागत है’ चिल्ला रहे हैं।
मैं उन्हें यह समझाने की कोशिश कर रहा हूं कि मेरा नया फ्रिज ब्रेक वैन में है, और उसे उतारना होगा। कुछ ही मिनटों में तेज सीटी बजती है और ट्रेन आगे बढ़ने लगती है। नीरू (मेरी पत्नी) हतप्रभ होकर मेरी ओर देखती है।’ एक और विवरण-‘हाशिमारा पहुंचने की उम्मीद में ट्रेन रुक गई और उसने सबसे पहले होल्डॉल फेंका, लेकिन इससे पहले कि वह अपना ट्रंक फेंक पाता, उसने महसूस किया कि उसने होल्डॉल के जमीन पर गिरने की आवाज नहीं सुनी है। तब तक ट्रेन चल पड़ी और दो मिनट बाद रुक गई और उसने लालटेन वाले आदमी को देखा। वह वहां उतरा और महसूस किया कि ट्रेन पुल पर रुक गई थी और सामान पानी में चला गया है। शुक्र है कि उसने अपना ट्रंक बचा लिया।’ प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुभवों को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखता है।