वह दिन दूर नहीं है, जब प्रगति की दौड़ में भारत से आगे निकल भागेंगे म्यांमार जैसे अति पिछड़े देश। म्यांमार की नई राजधानी नैपिताव में बैठकर यह लेख लिख रही हूं।
इसके निर्माण में केवल दस वर्ष लगे। माना कि चीन ने हर तरह से मदद की उसकी, लेकिन यह भी मानना पड़ेगा कि अपने प्यारे वतन में दस वर्ष में तो हम एक सड़क भी बना नहीं पाते हैं।
यहां सड़कें हमारे यमुना एक्सप्रेस-वे से ज्यादा चौड़ी हैं और उनके किनारे पर दिखते हैं फूलों से लदे पेड़। होटल हैं महलनुमा और इतने सारे कि एक पूरा इलाका होटल जोन कहलाता है।
पुराने किस्म के बाजारों की जगह बने हैं आधुनिक मॉल। अगर आप यहां का सम्मेलन भवन देखेंगे, तो हैरान रह जाएंगे, क्योंकि अपने भारत महान में इतना आलीशान सभा घर किसी महानगर में भी नहीं दिखेगा।
माना कि म्यांमार में सैनिक शासक हैं, जो लोकतंत्र के इतने दुश्मन हैं कि आंग सान सू की ने जब 1989 में चुनाव जीता था, तो उनको फौरन गिरफ्तार कर लिया गया।
नजरबंदी से रिहा किया उनको बीस वर्षों के बाद और वह भी तब, जब अंतरराष्ट्रीय दबाव इतना बढ़ गया कि तानाशाही जरनैल भी नहीं बर्दाश्त कर सके।
म्यांमार में विदेशी निवेशकों की सख्त जरूरत है और सू की की रिहाई के बिना चीन के अलावा और कोई नहीं आता।
आंग सान सू की की रिहाई से म्यांमार की छवि इतनी बदल गई है कि अगर आप उस सम्मेलन को देख सकते, जिसमें मैं हिस्सा लेने आई हूं, तो आपको यकीन हो जाता कि वह दिन दूर नहीं है, जब म्यांमार भी भारत से आगे निकल जाएगा।
वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम का वार्षिक पूर्वी एशिया सम्मेलन है यह, जो पहली बार म्यांमार में हो रहा है। यहां पहुंचे हैं निवेशक दुनिया के तमाम विकसित, अमीर देशों के। पूर्वी एशिया के बड़े राजनेता भी यहां आए हुए हैं, सो इस नए, वीरान शहर में समृद्धि और संपन्नता दिखाई देती है।
सोनिया-मनमोहन सरकार ने अपने एक दशक लंबे शासन काल में निवेशकों को हतोत्साहित किया है इतना कि संपन्न भारत के सपने फिलहाल गायब हो गए हैं। कैसे हतोत्साहित किया है?
विदेशी और देसी निवेशकों को यह संदेश देकर कि भारत सरकार कभी भी, किसी समय, बिना खबरदार किए अपने कानून बदल सकती है, निवेश के नियम बदल सकती है। इस सोच को आधार बनाकर टैक्स लगाए हैं कई विदेशी कंपनियों पर, जिनकी वे कल्पना भी नहीं कर सकते थे।
सुनिए वोडाफोन की कहानी। इस अंग्रेजी सेलफोन कंपनी ने एक भारतीय कंपनी को खरीदा हांगकांग स्थित चीनी उद्योगपति से। सो उस समय जो टैक्स की मांग रखी थी भारत सरकार ने, उसको वोडाफोन ने अदा किया। लेकिन तत्कालीन वित्त मंत्री को लगा कि वोडाफोन ने जरूरत से कम टैक्स अदा किया है, सो करोड़ों रुपये और मांगे।
वोडाफोन ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और फैसला उसके पक्ष में हुआ। मामला वहीं खत्म हो जाना चाहिए था, लेकिन नहीं हुआ। सरकार ने पिछले बजट में ऐसा प्रावधान डाल दिया, जिसके तहत पुराने कर नियम बदले जा सकते हैं।
इससे दुनिया भर में यह संदेश गया कि विदेशी निवेशकों के पैसे भारत में सुरक्षित नहीं हैं। सो, भागने लगे निवेशक।
अर्थव्यवस्था में गहरी मंदी छा गई है। हमारे प्रधानमंत्री बार-बार कह चुके हैं कि बिना विदेशी निवेश के नहीं बन सकेंगे भारत में वे सड़कें, रेल पटरियां, बंदरगाह और हवाई अड्डे, जिनके बिना देश की गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती।
लेकिन अपने देश में अब फूंक-फूंककर आते हैं विदेशी निवेशक। सो जो पैसा भारत में आ सकता था, अब दक्षिण पूर्वी एशिया के उन देशों में जाना शुरू हो गया है, जहां निवेशकों का स्वागत होता है।
म्यांमार उन देशों में से एक है और यहां आने के बाद मुझे ऐसा लगने लगा है कि जैसे यह देश एक लंबे, बुरे सपने से निकलकर सुनहरे भविष्य की तरफ निकल पड़ा है।
दशकों की तानाशाही के बाद कुछ समय तो लगेगा ठोस बदलाव आने में, लेकिन इसका आभास अभी से दिखने लग गया है। यंगून के होटल और बाजारों में दिखते हैं विदेशी पर्यटकों के समूह, जो पहले नहीं दिखते थे।
इरावदी नदी की कश्तियां पर्यटकों से भरी हुई चलती हैं प्राचीन राजधानी बगान तक। और नैपिताव में पहली बार हो रहा है इतना बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन।