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मुद्दा: एएमआई में दिखा विनिर्माण का 'आकार', ताकि बनी रहे रफ्तार

पत्रलेखा चटर्जी Published by: पवन पांडेय Updated Thu, 29 Jan 2026 07:30 AM IST

सार

भारत विनिर्माण महाशक्ति बनने का जो सपना देख रहा है, एशिया मैन्युफैक्चरिंग इंडेक्स उसकी तैयारी और सीमाओं की तस्वीर पेश करता है। भारत का स्थान सम्मानजनक तो है, पर एशिया की विनिर्माण दौड़ में ठहराव का सीधा मतलब पिछड़ जाना है।
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एएमआई में दिखा विनिर्माण का 'आकार' - फोटो : ANI


भारत का इस तालिका में चीन, मलयेशिया, वियतनाम, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया जैसे देशों से पीछे रहना उसकी घरेलू चुनौतियों को तो उजागर करता ही है, यह भी दर्शाता है कि क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी देश किस तेजी से सुधार कर रहे हैं। इसका संदेश बिल्कुल साफ है कि अगर क्रियान्वयन में धार, नवाचार में गहराई और लॉजिस्टिक्स में तेजी से सुधार नहीं किया जाता, तो जिस आपूर्ति-शृंखला विविधीकरण के अवसर का भारत लाभ उठाना चाहता है, वह उसी में पीछे छूट सकता है। अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव का असर एशिया की पूरी आपूर्ति-शृंखला पर पड़ रहा है। यूरोप अपने औद्योगिक आधार को नए सिरे से गढ़ने में लगा है। दक्षिण चीन सागर से लेकर पश्चिम एशिया और ग्रीनलैंड के आसपास आर्कटिक सीमा तक फैले भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक बाजारों में अस्थिरता पैदा कर रहे हैं। इस बदलते परिवेश में, विनिर्माण की प्रतिस्पर्धात्मकता का असली पैमाना अब ‘लचीलापन’ हो गया है, यानी टैरिफ युद्धों को झेलने की क्षमता, तकनीकी बदलावों के साथ खुद को ढालने की ताकत और भू-राजनीतिक जोखिमों के बीच आपूर्ति-शृंखला को सुरक्षित रखने का कौशल। भारत की रैंकिंग को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। भले ही भारत के पास विशाल घरेलू बाजार, बेहतर बुनियादी ढांचा और बढ़ते कार्यबल जैसी ताकतें हैं, पर अब भी उसे ज्यादा फुर्ती और गंभीर नवाचार क्षमता की जरूरत है।


सूचकांक में चीन शीर्ष पर बरकरार है। रिपोर्ट के अनुसार, चीन का विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र दुनिया में सबसे व्यापक बना हुआ है। इससे उसे कम समय में उत्पादन पूरा करने और लचीलापन बनाए रखने की ताकत मिलती है। मलयेशिया का दूसरे स्थान पर पहुंचना चौंकाने वाला है, जो उसके सुनियोजित प्रयासों का ही नतीजा है। वियतनाम, तीसरे स्थान पर खिसक गया है। चौथे और पांचवें स्थान पर काबिज सिंगापुर व दक्षिण कोरिया यह दिखाते हैं कि कैसे उन्नत अर्थव्यवस्थाएं एक स्थिर नीतिगत ढांचे के साथ नवाचार के पारिस्थितिकी तंत्र को जोड़ सकती हैं। भारत का स्थान सम्मानजनक तो है, पर एशिया की विनिर्माण दौड़ में ठहराव का सीधा मतलब पिछड़ जाना है।


भारत के पास अनुकूल जनसांख्यिकी और नीतिगत सुधारों की जबर्दस्त रफ्तार है। प्रोडक्शन लिंक्ड इंसंेटिव (पीएलआई) जैसी योजनाएं रणनीतिक क्षेत्रों को मजबूती दे रही हैं। विनिर्माण क्षेत्र में बढ़ता प्रत्यक्ष विदेशी निवेश वैश्विक भरोसे का प्रतीक है। पर सबसे बड़ी चुनौती बुनियादी ढांचे की है। लॉजिस्टिक्स दक्षता के मामले में हम अग्रणी आसियान देशों से भी पीछे हैं। सुधारों ने व्यापार सुगमता (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) को बढ़ाया है, पर राज्य स्तर पर प्रशासनिक प्रक्रियाएं अब भी धीमी और अनिश्चित हैं। हालांकि, वैश्विक टैरिफ युद्ध भारत के लिए जोखिम के साथ-साथ अवसर भी लेकर आए हैं। जैसे-जैसे कंपनियां अपनी आपूर्ति-शृंखला को चीन से बाहर ले जाने के विकल्प तलाश रही हैं, भारत के पास खुद को एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में स्थापित करने का सुनहरा मौका है। पर इस अवसर को भुनाने के लिए निवेशकों को भरोसेमंद नीतियां, कुशल लॉजिस्टिक्स और श्रमबल चाहिए। इनके बिना, भारत मलयेशिया, वियतनाम या इंडोनेशिया जैसे देशों से भी पिछड़ सकता है, जो पहले से ही आपूर्ति-शृंखला विविधीकरण का लाभ उठा रहे हैं। अनिश्चितता के इस दौर में, औद्योगिक क्षमता ही वास्तव में राष्ट्रीय सुरक्षा है। एक बहुध्रुवीय दुनिया में प्रमुख शक्ति बनने की भारत की आकांक्षा न केवल उसकी सैन्य शक्ति या कूटनीतिक आवाज पर, बल्कि उसकी औद्योगिक मजबूती और लचीलेपन पर भी निर्भर करती है।


आखिर भारत को करना क्या होगा? भारत को उन सुधारों की गति तेज करनी होगी, जो नौकरशाही की अड़चनों को कम करें और व्यापार सुगमता में सुधार लाएं। उसे अपनी लागत घटाने व विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए लॉजिस्टिक्स तथा बुनियादी ढांचे में भारी निवेश करना होगा। नवाचार क्षमता को बढ़ाने के लिए कौशल और शोध व विकास (आरएंडडी) को प्राथमिकता देनी होगी। निवेशकों का भरोसा जीतने के लिए नीतिगत स्थिरता सुनिश्चित करना जरूरी है। इसके अलावा, भारत को अपनी विनिर्माण रणनीति को ऊर्जा सुरक्षा से लेकर जलवायु लचीलेपन जैसे व्यापक राष्ट्रीय लक्ष्यों के साथ जोड़ना होगा।

एक ऐसे क्षेत्र में, जहां पड़ोसी देश पूरी रफ्तार से आगे दौड़ रहे हैं, भारत आधे-अधूरे उपायों का जोखिम नहीं उठा सकता। विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता केवल नौकरियों या निर्यात के बारे में नहीं है; यह उथल-पुथल भरी दुनिया में राष्ट्र की समग्र मजबूती और स्थिरता का आधार है।
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