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इतिहास और पुराण की दुविधा में समय की चाल

Sat, 25 May 2013 08:41 PM IST
ज्योतिर्मय
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करीब बारह से पांच हजार साल पहले की पृष्ठभूमि पर लिखे गए पशुपति उपन्यास के पात्र, घटनाएं और उनका प्रवाह रोमांचित करने के लिए पर्याप्त है। लेकिन आप यह नहीं कह सकते कि इतिहास, संस्कृति और पौराणिक परिवेश का चित्रण भी यथातथ्य जीवंत और साकार कर देता है।
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इस तरह के उपन्यासों में कथानक के विस्तार, संवाद, समय, स्थान और वातावरण के वर्णन में छूट लेने का पूरा अवसर रहता है। पशुपति उपन्यास की लेखिका ने इस अवसर का बखूबी लाभ उठाया है।

पशुपति की कहानी के प्रारंभिक वक्तव्य पर गौर करें तो यह भारत के और दुनियाभर के मनुष्यमात्र की संस्कृति को समझने की चेष्टा है। यह भी कि यह सीधी रेखाओं से कभी न सुलझने वाली गांठ की कहानी है जो पशु से पशुपति- पाशविक स्तर से उठ कर नरोत्तम स्तर तक पहुंचने की यात्रा का घटना प्रधान विवरण है।
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इस विकास की कथा के लिए जो पौराणिक संदर्भ लिए हैं और शिल्प चुना गया है उसके लिए कुछ तथ्य रेखांकित करना जरूरी है। एक तो यही कि पौराणिक भाषा में पशु अपनी इच्छाओं और वासनाओं में जकड़े सामान्य मनुष्य का प्रतीक है। चौपायों से लेकर दो पैरों पर चलने वाले प्राणियों का नाम पशु नहीं है, जो जीवधारी कहे जाते हैं।

दूसरे कद्रू, विनता, सूर्य, वरुण, कर्दम, देवल, सव्या, सरमा, रेवा, त्वष्टा, प्रचेता, प्रज्ञा आदि नाम भी मात्र संज्ञाएं नहीं हैं। उन नामों से पुराणों और वैदिक ग्रंथों के मनुष्य की विविध प्रवृत्तियों और दैवी शक्तियों या प्रकृति के विभिन्न रूपों का मानवीकरण किया गया है।

पशुपति उपन्यास में इन संज्ञाओं का उपयोग सिर्फ पात्रों को संबोधित करने या नामरूप के लिए किया गया है। आज के समय में जिन व्यक्तियों के नाम रामचंद्र, शिव, कार्तिकेय या प्रजापति हैं तो उनका किया कराया या उनमें आरोपित किया गया विवरण पौराणिक तो नहीं हो जाता। उसी तरह नाम, स्थान या समय के आधार पर किसी कथानक को सभ्यता या संस्कृति की खोज नहीं कह सकते।

अमीष त्रिपाठी के पिछले चार वर्षों में प्रकाशित शिव ट्रियौलाजी सीरीज के उपन्यासों में इस तरह की अनाधिकारिक छूट ली गई है। हिंदी में पशुपति इस धारा का पहला उपन्यास है, जो  संस्कृतनिष्ठ हिंदी और उपन्यास के पूरे कलेवर में छाए स्थानों, पात्रों और वातावरण के कारण पौराणिक-ऐतिहासिक होने का आभास देता है।

वैदिक, पौराणिक और शास्त्रीय ग्रंथों के मूल उद्धरण, संदर्भ और परिशिष्ट में दी गई पुस्तकों/ग्रंथों की एक लंबी सूची भी उस आभास को और गहरा बनाती है। लेकिन जिन पुस्तकों/ग्रंथों की सूची दी गई है, उनके बारे में समझ नहीं आता कि उनके प्रकाशकों के नाम आधे-अधूरे और गलत क्यों है। आधे-अधूरे से मतलब ज्यादातर प्रकाशकों के शहरों के नाम नदारद हैं। आधे से ज्यादा प्रकाशक तो कभी रहे ही नहीं।

उदाहरण के लिए कल्याण प्रकाशन ने कभी उपनिषद छापे ही नहीं। इस नाम का प्रकाशन इलाहाबाद में है और वहां से तांत्रिक पुस्तकें छपती हैं। वेद किसी गायत्री प्रकाशन ने नहीं छापे। लेखक ने जिन संस्करणों का जिक्र किया है वे बरेली के संस्कृति संस्थान से छपे हैं।

उस तरह की असावधानियां या अतिरेक उपन्यास के कथ्य पर भी प्रश्नचिह्न लगाते हैं। बहरहाल पशुपति को सिर्फ उपन्यास की तरह पढ़ें तो शायद अच्छा लगे। लेकिन जिन पाठकों ने वयं रक्षाम:, कृष्णावतार, मृत्युंजय, युगंधर और महायात्रा आदि उपन्यास पढ़े हैं, उन्हें शायद ही संतोष हो।
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उपन्यास- पशुपति
लेखिका- राजश्री
प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन
मूल्य- 795 रुपए
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