पश्चिम तिब्बत में पिरामिड के आकार का एक पर्वत है-कैलाश पर्वत। यह एशिया के चार धार्मिक समूहों-बौद्ध, जैन, हिंदू और बोनपो के लिए एक पवित्र स्थल है। बोपनो शैमनिज्म का पालन करते हैं, जो बौद्ध धर्म से पहले का तिब्बत का धर्म है। माना जाता है कि शैमनिज्म धर्म का पालन करने वालों के पास आत्माओं को प्रभावित करने की शक्तियां होती हैं। इन चारों धर्मों के तीर्थयात्री पहाड़ की 33 मील की परिक्रमा करने के लिए दारचेन के छोटे-से शहर में आते हैं। कैलाश, जिसे कैलास भी कहा जाता है, हिमालय में 22,028 फुट ऊंचा पर्वत है। यह हिंदू देवता शिव का राज-सिंहासन है, हिंदू एवं बौद्धों के लिए दुनिया का नाभि (केंद्र) है, मेरू पर्वत की सांसारिक छवि है, यह वह पर्वत है, जिसकी जड़ें बौद्ध मान्यताओं के अनुसार सातवें नरक तक और सबसे ऊंचे स्वर्ग तक जाती हैं।
बौद्ध इस पर्वत को कांग रिनपोछे कहते हैं और इसे ध्यान के देवता डेमचोग और गुरु-कवि मिलारेपा से जोड़ते हैं, जो जादुई प्रतियोगिताओं की एक शृंखला में बोनपो साधक नारो बोनचुंग को हराकर इस पर्वत के शिखर पर पहुंचे थे। जैनियों के लिए यह वह स्थान है, जहां उनके संस्थापक संतों में से पहले संत ऋषभ देव ने ज्ञान प्राप्त किया था। हिंदुओं के लिए यह शिव और पार्वती का घर है। बोनपो के लिए यह वह स्थान है, जहां उनके धर्म के संस्थापक, टोनपा शेनरब धरती पर आए थे।
हम चार लोग थे, जिनमें से एक को पहले से तिब्बत का अनुभव था। हम चारों ल्हासा से पांच दिन में दारचेन पहुंचे। आध्यात्मिकता से जुड़े कई शहरों की तरह दारचेन भी गंदगी से भरे धंधेबाजों का स्वर्ग है, खासकर मई के मध्य में, जब तीर्थयात्रा का मौसम होता है, और इसी दौरान हम वहां गए थे। आगंतुक स्पार्टन होटलों के कमरों में रह सकते हैं, जहां गर्म पानी का थर्मस और एक खाट उपलब्ध कराई जाती है। कंकरीट के प्लेटफॉर्म पर स्थायी रूप से तंबू भी खड़े हैं, जो भारत से आने वाले हिंदू तीर्थयात्रियों के पसंदीदा हैं। जैसा कि कभी रूसियों के लिए सच था, चीनी भी अपने नागरिकों को विदेशियों से अलग रखने में विश्वास करते हैं। बाहरी लोग तिब्बती शिविर क्षेत्र में अपने तंबू नहीं लगा सकते, लेकिन वे वहां पैसा जरूर खर्च कर सकते हैं। वहां तंबुओं में अनेक अनौपचारिक दुकानें थीं, जहां से आप कांच के जार में मंदारिन संतरे से लेकर चांदी जड़ित काठी तक, सब कुछ खरीद सकते थे। वहां एक तंबू में आशीर्वाद दिए जाते थे। कई अन्य तंबुओं में ताश के खेल खेले जाते थे। दारचेन में गाइड से कहकर आप तंबुओं और उपकरणों को उठाने के लिए स्थानीय कुली किराये पर ले सकते हैं।
माना जाता है कि कैलाश पर्वत की चोटी पर कोई नहीं पहुंच पाया है। लेकिन एक पुरानी कथा के अनुसार, केवल मिलारेपा नाम के एक बौद्ध भिक्षु ने ही कैलाश पर्वत पर चढ़ाई की थी। चोटी के दक्षिणी किनारे से देखने पर कैलाश पर्वत का हिंदू ओम (ॐ) चिह्न दिखाई देता है। यह प्रतीक विशाल बर्फ के गर्त और पहाड़ की सबसे ऊपरी क्षैतिज चट्टान संरचनाओं से बना है। कहा जाता है कि जो लोग कैलाश के पास 12 घंटे बिताते हैं, उनके नाखून और बाल सामान्य से ज्यादा तेजी से बढ़ते हैं।
शोधकर्ताओं ने पाया है कि वास्तव में कैलाश पर्वत का शिखर एक मानव निर्मित खाली पिरामिड है। इसके चारों ओर सौ से ज्यादा छोटे पिरामिड हैं। यह संभव है कि कैलाश स्थित पिरामिडों के निर्माण के लिए जिम्मेदार प्राचीन सभ्यता ऊर्जा के सूक्ष्म नियमों (ट्विस्ट फील्ड) से परिचित थी और समय और ऊर्जा को नियंत्रित करना जानती थी। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, कैलाश पर्वत ऊर्जा का एक भंवर है, जो शरीर और चेतना को उर्ध्वगामी बनाता है।
पर्वत की परिक्रमा, जिसे तिब्बती बौद्ध कोरा कहते हैं, 15,000 फीट से शुरू होती है। कुछ तिब्बती परिक्रमा पथ के 33 मील की दूरी एक ही दिन में पूरी कर लेते हैं। मान्यता है कि यदि आप एक परिक्रमा पूरी करते हैं, तो न केवल आपके जीवन के अब तक के सभी पाप धुल जाते हैं, बल्कि आपको 12 परिक्रमाओं का श्रेय भी मिलता है। अपनी परिक्रमा के पहले दिन हमने थोड़ी-सी ऊंचाई चढ़ी-15,000 फीट से 16,000 फीट तक। लेकिन विशाल चट्टानों की संरचनाएं, वीरान चोटियां और कैलाश पर्वत के दृश्य मन मोहने वाले थे।
कुछ मील चलने के बाद हम परिक्रमा की आधिकारिक शुरुआत पर पहुंचे, जिसे पत्थरों के ढेर से चिह्नित किया गया था। रास्ते में हमें पत्थरों के और ढेर, याक की खोपड़ियां और रास्ते को चिह्नित करने वाले प्रार्थना के झंडे मिले। वहां अपने प्रार्थना के झंडे लगाने के बाद हम तारबोचे की ओर चल पड़े : वहां लकड़ी का एक विशाल ध्वजस्तंभ (जिसे तारबोचे कहते हैं) प्रार्थना के झंडों और खटास से ढका हुआ था। खटास सफेद स्कार्फ होते हैं, जिन्हें तिब्बती लोग देवताओं को भेंट करते हैं। तीर्थयात्रियों का एक समूह स्तंभ के पास नाच-गा रहा था। पास में ही एक छोटा स्तूप जैसा ढांचा है, जिसे कांगनी कहा जाता है। ल्हा चू नामक नदी के पार हम सीढ़ियों से चढ़कर चोकू गोंपा पहुंचे, जो कोरा के तीन प्राचीन मठों में से एक था, जिसे सांस्कृतिक क्रांति के दौरान नष्ट कर दिया गया था, पर बाद में इसका पुनर्निर्माण किया गया।
उस दिन बाकी का रास्ता एक घाटी के साथ था, जिसके बाईं ओर बर्फ से ढके पहाड़ थे। उस दोपहर हमने ल्हा चू के पास डेरा डाला। याक का एक कारवां अपनी काठी पर बढ़िया कालीन लिए हुए गुजरा। नदी के उस पार एक झरना सूरज की रोशनी में चमक रहा था। हमारे तंबू के चारों ओर धरती पर गुलाबी फूल खिले हुए थे। दूसरे दिन हम नदी पार करके दूसरे मठ द्रारा फुक पहुंचे, जिसमें एक गुफा है, जिसमें एक मादा याक (द्रि) की छाप है, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसने पहले परिक्रमा करने वाले गुरु गोतशांगपा को इस गुफा तक पहुंचाया था।
परिक्रमा का तीसरा दिन बहुत ही घातक था। हमने सुबह आठ बजे यात्रा शुरू की। तीर्थयात्री पहले से ही ड्रोलमा ला की ओर बढ़ रहे थे, जो 18,600 फीट की ऊंचाई पर स्थित एक दर्रा है। यह रास्ता बड़े-बड़े ग्लेशियर से गिरे पत्थरों के बीच से होकर गुजरता है। अंत में चट्टानों को पार करते हुए हम ड्रोलमा ला के शीर्ष पर स्थित विशाल चट्टान पर पहुंचे, जो पूरी तरह से प्रार्थना के झंडों और खटासों से घिरा हुआ था। यहां पापों की माफी मिल जाती है। तिब्बती बौद्धों का मानना है कि यहीं पर 21 ड्रोलमा, जिन्होंने गोत्संगपा को दर्रे तक पहुंचाया था, भेड़ियों में बदल गए और चट्टान में विलीन हो गए।
जब हम दर्रे से पत्थरों से भरे रास्ते से नीचे उतर रहे थे, तो नीचे उतरते समय उत्साहित तीर्थयात्रियों के गीत ढलानों पर गूंज रहे थे। मेलुंग चू पहुंचकर हम दलदली किनारों के साथ-साथ नदी के बीच में बने एक द्वीप पर अपने शिविर स्थल तक गए।
अगली सुबह पहाड़ ठंडी धुंध से घिरे हुए थे। हम जुत्रुल फुक मठ में पहुंचे। वहां हम मिलारेपा की एक पवित्र मूर्ति और छत पर छोड़े गए उनके हाथ के निशान देख सकते थे, जब उन्होंने बोनपो पुजारी बोनचुंग के साथ प्रतियोगिता के दौरान छत को ऊपर उठाया था। हालांकि, उनकी अंतिम प्रतियोगिता इस बात पर हुई थी कि कौन पहले कैलाश की चोटी पर पहुंच सकता है।