मानस में बैठी मां
आंखों में है उसे संजोये सारा
गांव-गिरांव।
देवलोक दिखता था, जब भी छूता
मां के पांव॥
बिना कहे ही मेरे मन का
दर्द समझती थी।
अनपढ़ होकर भी कविता का
अर्थ समझती थी।
सगुन मनाती थी पाहुन का, सुन
कागा के कांव॥
फूलों की पंखुरी जैसी थी
उसकी अद्भुत डांट।
शब्द-शब्द लगते थे
जैसे सामवेद का पाठ।
जान-बूझ कर भी हारा करती
थी अपना दांव॥
पलती पीर प्राण में
पर मुसकाती रहती थी।
गीत प्रार्थना के ही
हर पल गाती रहती थी।
कभी भोर की धूप बन गई, कभी
धूप में छांव॥
मेरे मानस में बैठी
चौपाई लिखती थी।
गीता, वेद, कुरान, बाइबिल
सबमें दिखती थी।
और कबीरा की साखी में मिल
जाती हर ठांव॥
बैठ देहरी पर जाने क्या
सोचा करती थी?
आंचल से आंखों का अपनी
पोंछा करती थी।
चली गई सब छोड़ अचानक,
सपनों वाले गांव॥
-सतीश आर्य
इनकी कविताओं में शब्दों की विनयशीलता बार-बार प्रभावित करती है।
मनकापुर (गोंडा) में रहते हैं।