मेरे घर में नमाज-रोजा को लेकर कोई बंदिश नहीं थी। मेरी मां रात को सोने से पहले घर के तमाम सदस्यों से पूछती थीं कि कल कौन-कौन रोजा रखेगा। घर के जो लोग रोजा रखते, भोर को सहरी खाने के लिए मां सिर्फ उन्हें ही उठातीं। साथ ही, इसका भी ध्यान रखतीं कि जो लोग रोजा नहीं रख रहे, उनकी नींद में कोई बाधा न आए। इसलिए वे सहरी के लिए जगाते हुए अपनी आवाज धीमी रखतीं।
नमाज के मामले में भी हमारे यहां ऐसा ही नियम था। जिसकी इच्छा होती, वह नमाज पढ़ता, जिसकी इच्छा नहीं होती, वह नहीं पढ़ता। लेकिन इस वजह से कोई किसी की निंदा नहीं करता था। मेरे घर का यह नियम लिखित या मौखिक नहीं, बल्कि सहज स्वाभाविक था। इफ्तार के समय मां सबको खाने के लिए बुलातीं। सब एक साथ खाने के लिए बैठते, तो मां सबकी थाली में एक ही तरह परोसतीं। उस समय वह रोजा रखने वालों और न रखने वालों में कोई भेद नहीं करती थीं। तब मैं समझ नहीं पाई थी। लेकिन आज समझ पाती हूं कि मेरा घर एक आदर्श घर था।