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समाज: एक महिला आईपीएस और घरेलू हिंसा, धारणाओं को ध्वस्त करने वाली होती हैं कुछ घटनाएं

ऋतु सारस्वत
Updated Mon, 13 May 2024 06:38 AM IST

सार

घरेलू हिंसा से निपटने के लिए कानून से अधिक, ठोस एवं समन्वित प्रयास आवश्यक हैं। घरेलू हिंसा पीड़ितों को समझना होगा कि  शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक प्रताड़नाओं को सहने से पारिवारिक वातावरण सुखद नहीं होगा और न ही भावी पीढ़ी का भविष्य उज्ज्वल हो सकता है।
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला।


दुनिया भर के विभिन्न समाजों में महिलाओं को उनकी लैंगिक भूमिकाओं के अनुरूप समाजीकृत किया जाता है और यह प्रक्रिया आधुनिकीकरण के तमाम दावों के बीच भी सफल वैवाहिक जीवन के निर्वहन का समस्त दायित्व स्त्री के कंधों पर डालती है और बड़ी ही निष्ठुरता से यह स्वीकार करती है कि वैवाहिक जीवन के उतार-चढ़ावों के बीच महिला का धैर्य और त्याग विवाह के स्थायित्व की नींव बनता है। इस ‘धैर्य’ की परिभाषा में मौखिक और मनोवैज्ञानिक दुर्व्यवहार को सहजता से स्वीकारना भी शामिल है। स्पष्ट है कि यह नियम कामकाजी महिलाओं पर भी लागू होता है।


पुरुष के आक्रामक व्यवहार पर मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत तर्क देता है कि पुरुष अपनी भावनात्मक असुरक्ष व तनाव की भरपाई करने के लिए अति पुरुषोचित व्यवहार करता है। आवेगी स्वभाव, आक्रामकता, विषाक्त पुरुषत्व, नियंत्रण की प्रवृत्ति और असुरक्षा जैसे कारक पुरुषों को जीवनसाथी को प्रताड़ित करने के लिए उकसाते हैं। सवाल यह है कि दुनिया भर में महिलाएं क्यों खामोशी से घरेलू हिंसा को स्वीकारती आ रही हैं। निस्संदेह इसके पीछे सामाजिक व पारिवारिक प्रतिष्ठा धूमिल होने का भय है। महिलाएं शुरू में यह सोचकर प्रताड़ना सहती हैं कि यह अल्पावधि के लिए है। भविष्य में उसके साथी का व्यवहार बदल जाएगा, लेकिन जैसे-जैसे पीड़िता अपमानजनक व्यवहार को स्वीकार करती है, मौखिक या मनोवैज्ञानिक प्रताड़ना उसके मस्तिष्क में मजबूत हो जाती है, जिससे उसके लिए समय के साथ दुर्व्यवहार की गंभीरता को पहचानना मुश्किल हो जाता है।


अल्बर्ट बंडूरा की ‘सोशल लर्निंग थ्योरी’ परिवार के भीतर हिंसा के कई पीढ़ियों तक संचरण की चर्चा करती हैं। इसके अनुसार बच्चे अंतरंग साथी के बीच हिंसा को पारिवारिक वातावरण में देखने और नकल करने की प्रक्रिया के जरिये ‘हिंसक व्यवहार’ को आत्मसात  कर लेते हैं। घरेलू हिंसा राष्ट्र के विकास को प्रभावित करती है तथा समाज के आर्थिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक कल्याण को बाधित करती है। शोधों से पता चलता है कि महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की लागत वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग दो प्रतिशत हो सकती है। घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम पर प्रतिक्रियाएं ध्रुवीकृत हैं। एक धड़ा जहां महानगरों में रहने वाले कुलीन वर्ग द्वारा इसके दुरुपयोग की शिकायत कर रहा है, वहीं दूसरा धड़ा पित्तृसत्ता के कठोर ढांचे में दबी ग्रामीण महिलाओं के लिए इसकी निरर्थकता पर ठप्पा लगा चुका है। इसलिए घरेलू हिंसा से निपटने के लिए कानून से अधिक, ठोस एवं समन्वित प्रयास आवश्यक हैं। घरेलू हिंसा पीड़ितों को समझना होगा कि  शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक प्रताड़नाओं को सहने से पारिवारिक वातावरण सुखद नहीं होगा और न ही भावी पीढ़ी का भविष्य उज्ज्वल हो सकता है।

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