हालांकि, इस समझौते के आर्थिक प्रभाव का समग्र मूल्यांकन आगे चलकर सामने आएगा, लेकिन अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव के बारे में कुछ विचार यहां उजागर करने लायक हैं। ब्रिटेन के व्यवसाय और व्यापार विभाग ने ब्रिटिश अर्थव्यवस्था पर एफटीए के संभावित प्रभाव का प्रारंभिक आकलन किया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि ये अनुमान जीडीपी और अन्य व्यापार-संबंधित घटकों पर एफटीए के सकारात्मक प्रभाव का सुझाव देते हैं। एफटीए का मूल सिद्धांत भागीदार देशों के आपसी लाभ को बढ़ाना है।
ब्रिटिश सरकार द्वारा इस एफटीए से संबंधित नीति दस्तावेज में इस बात पर जोर दिया गया है कि ‘ब्रिटेन-भारत समझौता वैश्विक ब्रिटेन को हिंद-प्रशांत क्षेत्र के केंद्र में रखने में मदद करेगा, जो वैश्विक जीडीपी का 40 फीसदी से अधिक प्रतिनिधित्व करता है और जिसमें दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। जैसे-जैसे ये अर्थव्यवस्थाएं बढ़ रही हैं, यह महत्वपूर्ण है कि ब्रिटेन की उनके बाजारों तक पहुंच हो। भारत के साथ समझौता इस क्षेत्र में ब्रिटेन की अन्य प्रतिबद्धताओं का पूरक होगा, जैसे ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ व्यापार समझौते और ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप के लिए व्यापक और प्रगतिशील समझौते के 11 सदस्य देशों के साथ चल रही बातचीत, जिसे लोकप्रिय रूप से सीपीटीपीपी के रूप में जाना जाता है।’
दूसरे शब्दों में, इस एफटीए को भारत-प्रशांत क्षेत्र में अपनी आर्थिक मौजूदगी का विस्तार करने के लिए ब्रिटिश सरकार की हालिया व्यापार नीति के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इस संदर्भ में, यहां यह रेखांकित करना उचित है कि हाल के वर्षों में, ब्रिटेन सरकार ने ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान, न्यूजीलैंड और सिंगापुर के साथ एफटीए पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता भारत के लिए एक गेम चेंजर भी साबित हो सकता है। 2040 तक दोनों देशों के बीच व्यापार 25.5 अरब पाउंड तक पहुंचाने का लक्ष्य भारत के छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए नए दरवाजे खोल सकता है। हाल के दिनों में भारत ने ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त अरब अमीरात के साथ भी एफटीए पर हस्ताक्षर किए हैं। साथ ही, इसी अवधि के दौरान ब्रेग्जिट हुआ और ब्रिटेन यूरोपीय संघ से बाहर निकल गया। ब्रेग्जिट के बाद ब्रिटेन ने चुनिंदा देशों के साथ, विशेष रूप से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में, अनिश्चित वैश्विक माहौल और दुनिया भर में बढ़ते संरक्षणवाद के बीच सहज व्यापार व्यवस्था बनाने के लिए एक के बाद एक मुक्त व्यापार समझौते किए।
यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के अचानक बाहर निकलने से भी ब्रिटेन को नए अधिमान्य व्यापार साझेदारों, विशेषकर भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बारे में सोचने के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार, बदलती भू-राजनीतिक स्थिति और बढ़ती वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं में इस संधि का रणनीतिक महत्व संभवतः ज्यादा महत्वपूर्ण है, और इसे केवल आर्थिक लाभ के नजरिये से नहीं देखा जा सकता। इस संधि को अमेरिका के लिए एक संकेत के रूप में भी देखा जा सकता है।
मीडिया में ऐसी खबरें हैं कि पिछले तीन महीनों में इस संधि से जुड़ी बातचीत बहुत तेजी से आगे बढ़ी है। यह अमेरिका में ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के पहले 100 दिनों के दौरान हुआ है। हालांकि, अब कुछ हद तक तनाव कम हो गया है, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने पदभार संभालते ही अमेरिका के व्यापारिक साझेदारों के साथ टैरिफ युद्ध छेड़ दिया था। राष्ट्रपति ट्रंप के टैरिफ अस्त्र के कारण व्यापार और पूंजी बाजारों में जिस तरह की वैश्विक उथल-पुथल देखी गई, वह अभूतपूर्व थी। अगर भारत-ब्रिटेन एफटीए अच्छी तरह से काम करता है, तो यह अनिश्चितताओं के कारण अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उभरने वाले कुछ झटकों से बचा सकता है। इस संधि से संबंधित ब्रिटिश सरकार के नीति दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि हिंद-प्रशांत की ओर झुकाव से ब्रिटेन के व्यापार में विविधता लाने, आपूर्ति शृंखला प्रबंधन में सुधार करने और दुनिया भर से राजनीतिक और आर्थिक झटकों के प्रति ब्रिटेन की भेद्यता को कम करने में भी मदद मिलेगी।
एक उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में, भारत को इस अवसर का उपयोग ब्रिटेन के एक प्रमुख व्यापार भागीदार के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत करने और अपने निर्यात को वर्तमान स्तर से बढ़ाने के लिए करना चाहिए, जो भारत के निर्यात का लगभग तीन फीसदी है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि यह समझौता भारत के लिए ‘मेक इन इंडिया’ पहल को बढ़ावा देने और ब्रिटेन के लिए ब्रेग्जिट के बाद वैश्विक व्यापार में अपनी स्थिति को मजबूत करने का सुनहरा अवसर है। किसी भी एफटीए में कुछ देना और कुछ लेना होता है। इस प्रक्रिया में, भारत ने अर्थव्यवस्था के कृषि क्षेत्र के हितों की रक्षा करने की कोशिश की है।
अल्पावधि से मध्यम अवधि में द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने से भारत को ठोस आर्थिक लाभ मिलने की उम्मीद है। जैसा कि मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस एफटीए से भारतीय अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों, यथा ऑटो, टेक्सटाइल और फार्मा इत्यादि को लाभ मिलने की उम्मीद है। हालांकि, इस समझौते के लाभों को पूरी तरह से हासिल करने के लिए कुछ चुनौतियों का सामना भी करना पड़ेगा। भारतीय व्यवसायों को ब्रिटेन के बाजार में प्रतिस्पर्धा के लिए अपनी गुणवत्ता और नवाचार पर ध्यान देना होगा। साथ ही, समझौते के कार्यान्वयन में पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित करनी होगी। इसके अतिरिक्त, भारत को यह भी देखना होगा कि इस समझौते से छोटे और मध्यम उद्यमों को भी लाभ मिले, ताकि आर्थिक विकास समावेशी हो। पड़ोस में बढ़ते तनाव और व्यापार नीति पर अमेरिकी रुख के संदर्भ में यह भारत के लिए एक सकारात्मक और महत्वपूर्ण विकास है।