इस देश में अचानक ईमानदारी की लहर-सी दौड़ने लगी है। सौ-सौ चूहे खाकर बिल्लियां हज को चलीं। यह बदलाव देखकर आश्चर्य होता है। क्या बिल्लियां अब चूहों की जान बख्श देंगी? बिल्लियों को अहिंसक होते देखकर खुद चूहे भी अचरज में हैं। वे समझ नहीं पा रहे कि क्या प्रतिक्रिया दें। थोड़ी-सी खुशी, उससे ज्यादा डर। मन में तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं। बिल्लियों का क्या भरोसा? ईमानदारी का सीजन निपटते ही वे फिर अपनी पर उतर आएंगे।
फिर भी बदलाव देखने लायक है। कभी जिस बिल्ली के गले में घंटी बांधने के सवाल पर लोग प्रश्नवाचक की मुद्रा में खड़े हो जाते थे, वही बिल्ली आज खुद घंटी लेकर गले में बांधने का ऑफर दे रही है। एकदम रामराज टाइप मामला है। आम आदमी के हाथ में दिल्ली की सत्ता क्या आ गई, देश में हृदय परिवर्तन का दौर शुरू हो गया।
सुनते हैं कि उधर पहाड़ों में पराक्रमी निशंक ने यह लै अपनी लकुटि कमरिया की तर्ज पर अपनी लालबत्ती वतन के हवाले कर दी है। तो सुदूर दक्षिण में भगवा वीर येदियुरप्पा के दाग अब भाई लोगों को अच्छे लगने लगे हैं। खबर यह आई है कि राजस्थान की महारानी भी अब सादगी के चोले में दिखेंगी। चूहे बेचारे समझ ही नहीं पा रहे हैं कि आखिर यह माजरा है क्या।
इस तरह के दृश्य न जाने कितने मनों को बेचैनी में डुबो रहे हैं। देश के सुदामाओं ने सिर पर टोपी डालकर खुद को आम आदमी घोषित कर दिया है। ऐसे में द्वारिकाधीश अपनी रणनीति गड़बड़ाने से परेशान दिखाई दे रहे हैं। साइबर जगत के उनके लड़ाकों को सांप सूंघ गया है। सुदामा का दुस्साहस तो देखो कि एक ही चुनाव के बाद द्वारिकाधीश को चुनौती देने लगा!
दिल्ली में आम आदमी का इतना सशक्तीकरण हो गया है कि अब उसके पास गाड़ी है, बंगला है। वह अब अगले आम आदमी से पूछ रहा है कि तेरे पास क्या है? अब वह बेचारा कैसे बताए कि उसके पास मां है, जो वृद्धावस्था पेंशन पाने के लिए कब से दर-दर भटक रही है। वैसे आम आदमी के पावरफुल होने से सुना है कि पावर कंपनियों के होश फाख्ता हैं। उन्हें अपनी पावर का हिसाब देना पड़ रहा है।
भाई लोग कह रहे हैं कि बिल्ली के भाग से छींका टूट गया है। लेकिन यह कम्बख्त छींका बिल्ली के भाग से ही क्यों टूटा, हर्षवर्द्धन के भाग से क्यों नहीं टूटा, इसका जवाब तो द्वारिकाधीश को देना ही होगा।