छोटे परदे की भागती, हांफती तस्वीरें कहीं हमारे मानस को छोटा करती हैं। हमसे छोटे सवाल पुछवाती हैं। हमें छोटे झगड़ों में उलझाती हैं और आधे-अधूरे उत्तरों से मना लेती हैं। छोटा सवाल यह था कि चुनावी खेल में मोदी जीतेंगे या नहीं? कुल जमा 117 सीट का आंकड़ा पार करेंगे या नहीं। दिल्ली में भाजपा के नेतृत्व की कुश्ती में मोदी दूसरों को चित करेंगे या नहीं। बड़ा सवाल नरेंद्र मोदी का नहीं, मोदित्व का था। लोकतंत्र के खेल में मोदित्व जीतेगा या नहीं? अगर मोदित्व का अश्वमेध होगा, तो उसमें लोकतंत्र जीतेगा या नहीं?
छोटे सवालों के उत्तर सरल हैं। गुजरात में नरेंद्र मोदी की स्पष्ट और निर्णायक जीत हुई है। सीटों के अंतिम आंकड़े में पिछले चुनाव के मुकाबले जो भी अंतर रहा हो, इसमें कोई शक नहीं कि गुजरात की जनता ने उन्हें स्पष्ट जनादेश दिया है। पिछले बीस वर्षों से गुजरात में भाजपा अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस से दस फर्लांग (दस फीसदी वोट) आगे रही है। इस बार भी उसने कमोबेश यही स्थिति बनाए रखी। यह जीत शहरी इलाकों में ज्यादा बड़ी है, तो गांवों में कुछ हल्की। सौराष्ट्र, मध्य और दक्षिणी गुजरात में एकतरफा जीत है, तो उत्तर में मुकाबला कांटे का रहा।
मोदी को अगड़ों और खास तौर पर पटेल समुदाय में कुछ नुकसान हुआ (हालांकि उतना नहीं, जितना प्रचार किया गया था), तो उसकी भरपाई पिछड़े क्षत्रिय समाज और कोली समुदाय से हो गई। हमेशा की तरह दलित, आदिवासी, मुस्लिम और गरीब मतदाताओं में कांग्रेस आगे रही। लेकिन कुल मिलाकर इसे खंडित जनादेश नहीं कहा जा सकता। कांग्रेस के प्रवक्ताओं की खामख्याली को नजर अंदाज कर दें, तो मोदी के जनादेश पर सवालिया निशान लगाना आसान नहीं है।
लेकिन उधर हिमाचल प्रदेश का चुनाव परिणाम हमें यह याद दिलाता है कि भाजपा के पक्ष में कोई राष्ट्रीय लहर नहीं थी। अगर गुजरात में भाजपा का बोलबाला अब एक स्थायी नियम जैसा लगने लगा है, तो हिमाचल में हर बार सरकार पलटने का नियम रहा है। दोनों जगह इस बार भी नियम कायम रहा। इन परिणामों के आधार पर कांग्रेस या भाजपा कोई भी अपनी हवा का दावा नहीं कर पाएगी। न तो सत्तारूढ़ दल की गिरती लोकप्रियता और घटती साख का क्रम टूटा है, न ही देश के सबसे बड़े विपक्षी दल के दिग्भ्रम और संकल्पहीनता का सिलसिला थमा है।
बस एक बदलाव हुआ है। नेतृत्व के संकट से जूझती भाजपा की अंदरूनी कुश्ती का फैसला हो गया जान पड़ता है। इस स्पष्ट जनादेश के साथ नरेंद्र मोदी का कद बढ़ना लाजिमी है। चाहे इसकी औपचारिक घोषणा हो, न हो, आज हो या कल हो, जाहिर है, अब वह लोकसभा चुनाव में भाजपा के सबसे बड़े नेता के रूप में उभरेंगे। इसकी वजह मोदी की मजबूती से ज्यादा भाजपा की मजबूरी है। उधर हिमाचल के परिणाम से कांग्रेस के अंदरूनी समीकरण पर कोई खास असर पड़ने वाला नहीं है। वीरभद्र सिंह को आगे कर चुनाव जीतने से कांग्रेस को कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में नेता की घोषणा करने का दबाव पड़ेगा। लेकिन लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद की दावेदारी की कुर्सी युवराज के लिए आरक्षित थी और रहेगी।
छोटे सवालों के सीधे उत्तर से आगे बढ़कर जब हम बड़े सवाल पूछते हैं, तब हम अपने-आपको एक कठिन और कांटों भरी पगडंडी पर पाते हैं। गुजरात में मोदित्व की जीत लोकतंत्र के लिए एक नहीं, कई चुनौतियां पेश करती हैं। इसमें कोई शक नहीं कि यह जीत केवल भाजपा की नहीं, नरेंद्र मोदी की अपनी व्यक्तिगत जीत है। लोग एक दमदार, निर्णायक और दबंग नेता को सत्ता की बागडोर सौंपना चाहते थे।
लेकिन मजबूत नेता की इस चाहत में कहीं लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से थकान के संकेत तो नहीं हैं! मोदी जो चाहते हैं, करके दिखाते हैं, नियम-कायदे को आड़े नहीं आने देते, मीडिया से लेकर मानवाधिकार संगठनों तक सबको काबू में रखना जानते हैं, खुद अपनी पार्टी के स्थानीय और राष्ट्रीय नेताओं की परवाह नहीं करते। आज उनके ये सद्गुण गुजरात की जनता को भाते हैं, लेकिन दुनिया भर में लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर तानाशाही व्यवस्था की शुरुआत इसी तरह से होती है।
इसमें कोई शक नहीं कि गुजरात की जनता कुल मिलाकर मोदी सरकार के कामकाज से नाखुश नहीं थी। पिछले दस साल से देश भर में आर्थिक वृद्धि हुई है। गुजरात में आर्थिक वृद्धि की दर देश के औसत से ज्यादा थी। निवेश बढ़ा, उद्योग लगे, समृद्धि आई, आम लोगों को बिजली और सड़क की सहूलियत भी हुई, लेकिन वह समृद्धि अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंची। शिक्षा और स्वास्थ्य में कोई खास सुधार नहीं हुआ। मोदी पर स्वयं भ्रष्ट होने का आरोप नहीं लगा, लेकिन प्रधानमंत्री की तरह उनके राज में भी बड़े घोटाले और बड़े उद्योगपतियों की तरफदारी के आरोप लगे। अगर इन सबके चलते गुजरात को विकास का मॉडल मान लिया जाता है, तो समता और न्याय के सांविधानिक मूल्यों का क्या होगा?
बेशक यह चुनाव सांप्रदायिक मुद्दों पर नहीं लड़ा गया। न भाजपा ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश की, न कांग्रेस ने 2002 के दंगों का जिक्र भी किया। पिछली बार की तरह 20 फीसदी मुसलमानों का वोट भी भाजपा को मिल गया, लेकिन दंगों के आरोपी नेताओं को टिकट का इनाम देकर और एक भी मुसलमान को टिकट न देकर मोदी ने फिर यह साबित किया कि इस सवाल पर वह कहां खड़े हैं। बेशक पिछले दस साल से गुजरात में दंगे नहीं हुए, लेकिन कहीं इसलिए तो नहीं कि वहां अल्पसंख्यकों ने दोयम दर्जे की नागरिकता स्वीकार कर ली है! 'शांति' का यह मॉडल विविधता संपन्न भारत के सपने को चुनौती देता है।
ये बड़े सवाल हमें एक यक्ष प्रश्न की ओर धकेलते हैं कि लोकतंत्र में मोदित्व की चुनौती का अंजाम क्या होगा? मोदित्व लोकतंत्र को दबा देगा या लोकतंत्र का ताना-बाना मोदी को मोदित्व छोड़ने पर मजबूर करेगा? क्या कांग्रेस या अन्य स्थापित दल मोदित्व का मुकाबला कर पाएंगे? अगर नहीं, तो विकल्प कहां से आएगा? इतने बड़े सवाल टीवी के छोटे परदे में कैसे समाएंगे।