एक हफ्ता राजनीति में जहां लंबा अरसा होता है, वहीं एक साल को अमूमन बदलाव के मील का पत्थर माना जाता है। एक वर्ष पहले नरेंद्र मोदी ने अपनी पार्टी को शानदार जीत दिलाई थी। भारत में तीस वर्ष बाद पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी। यह कहा जाने लगा कि भारत 'बगैर सरकार' से 'बगैर विपक्ष' वाला देश बन गया है! कामयाबी की इस दास्तान के पीछे का जादुई मंत्र था, 'अच्छे दिन आएंगे'। एक अस्पष्ट विचार होने के बावजूद लोगों के लिए इसके तमाम अर्थ थे। इस वायदे ने मोदी को 'रेसकोर्स रोड' यानी प्रधानमंत्री आवास तक पहुंचा दिया।
एक साल बाद अब सवाल यह पूछा जा रहा है कि अच्छे दिन कब आएंगे? सवाल पूछने वालों में मतदाता, कार्यकर्ता और पार्टी की विचारधारा में आस्था रखने वाले तक शामिल हैं। ये सभी बेसब्री से मशहूर कवि और गीतकार अनजान की यह पंक्ति गुनगुना रहे हैं, इंतहा हो गई, इंतजार की। सच यह है कि विरोध की यह लहर खुद मोदी की देन है, ठीक वैसे ही, जैसे लोकसभा चुनाव के नतीजों को उन्होंने मनचाहे ढंग से गढ़ा था। खुद को लेकर जो उम्मीदें उन्होंने पैदा की हैं, वे एकजुट होकर एक राजनीतिक ताकत बन गई है।
मोदी के सामने चुनौती थी, यूपीए के समय की अव्यवस्था को दूर करना और पूरी दुनिया के सामने भारत के आत्मसम्मान को पुनर्स्थापित करते हुए नए भारत की कहानी लिखना। मसलन, विकास को गति देने के लिए महंगाई पर काबू पाना, राजस्व घाटे में कमी लाना, निवेश बढ़ाना और रोजगार सृजन। मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही है कि उन्होंने एक व्यवस्था फिर से बहाल की है। इसी तरह उन्होंने न केवल दूसरे देशों की भारत में दिलचस्पी बढ़ाई है, बल्कि देशवासियों में गर्व की भावना भी पैदा की है।
इस दौरान मोदी सरकार ने कैसा काम किया है? आशावादी लोग मोदी की एक साल की उपलब्धियों की सूची गिनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। जैसे कि राजकोषीय घाटे में आई कमी, राजस्व में राज्यों की ज्यादा हिस्सेदारी, कोयला, खनिज और स्पेक्ट्रम जैसे प्राकृतिक संसाधनों का भ्रष्टाचारमुक्त आवंटन, जन-धन योजना के जरिये वित्तीय समावेशन, गरीबों के लिए बीमा व पेंशन योजना, स्मार्ट शहर और मेक इन इंडिया। ये तमाम पहलकदमियां निवेश बढ़ाएंगी और रोजगार पैदा करेंगी। फिर स्वच्छ भारत अभियान भी तो है!
किसी सरकार के कामकाज का आकलन करते वक्त उसके इरादे और नीतियों के साथ यह देखना भी जरूरी होता है कि उन्हें लागू किस तरह से किया जा रहा है। मोदी सरकार ने जो इरादे जाहिर किए हैं, उन पर सवाल नहीं उठता। दिक्कत उन्हें लागू करने के तरीके में है। बजट बताता है कि राजकोषीय घाटा काबू में लाया जा चुका है। सरकार में मौजूद सांख्यिकीविद बताते हैं कि महंगाई में कमी हुई है। मगर सवाल यह है कि एक किलो सब्जी और फल खरीदते वक्त जिस आम आदमी की जेब से तीन अंकों वाला नोट ढीला होता है, वह इस आंकड़ेबाजी पर कैसे भरोसा करे। हमें बताया गया है कि भारत में जीडीपी विकास दर दुनिया में सबसे तेज (चीन से भी ज्यादा) है। अगर ऐसा है, तो 'फील गुड' वाला एहसास नदारद क्यों है?
स्पष्ट है कि सरकार के इरादे तो नेक हैं, मगर नुक्स उनकी तामील में है। मई, 2014 में कच्चे तेल के दाम तकरीबन 110 डॉलर थे, और एक डॉलर की कीमत उनसठ रुपये के बराबर थी। वहीं, मई 2015 में कच्चे तेल के दाम 65 डॉलर के करीब पहुंच गए थे, मगर डॉलर की कीमत बढ़कर तिरसठ रुपये हो गई। सोचकर देखिए, अगर कच्चे तेल के दामों में कमी न हुई होती, तो क्या होता? इसी तरह सरकार की उधारी यूपीए के समय से ज्यादा है। नकद हस्तांतरण योजनाओं के जरिये सब्सिडी में रिसाव को रोकना दूर की कौड़ी लग रहा है। व्यय प्रबंधन की रिपोर्ट आखिर है कहां?
2014 में भाजपा ने कृषि को पुनर्व्यवस्थित करने और किसानों के हितों पर ध्यान देने का वायदा किया था। न्यूनतम समर्थन मूल्यों की ऊंची दर का वायदा तो इतिहास बन चुका है। कृषि के लिए प्रस्तावित राष्ट्रीय बाजार अभी विचार से आगे नहीं बढ़ सका है। विवादों में छाए भूमि अधिग्रहण अध्यादेश ने मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ाई हैं। आलम यह है कि 2015 में मोदी सरकार खुद पर से किसान-विरोधी होने का धब्बा मिटाने के लिए जूझ रही है।
दूसरी ओर सवाल यह भी है कि अगर भारत 2015 में चीन से भी तेज विकास कर रहा है, तो विदेशी संस्थागत निवेशक चीन क्यों भाग रहे हैं? दरअसल जहां चीन के शंघाई कंपोजिट इंडेक्स में एक वर्ष में 116 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, वहीं भारत के सेंसेक्स में महज 20 फीसदी की। सोचने वाली बात है कि बड़े बदलाव कोई ट्वंटी-20 मैच नहीं होते। मगर वह भाजपा थी, जिसने गवर्नेंस के खेल के नियम तक बदल डालने के दावे किए थे। न्यूनतम सरकार और अधिकतम गवर्नेंस के वायदे के बावजूद जमीनी स्तर पर ज्यादा कुछ नहीं बदला। फिलहाल 11 राज्यों में भाजपा सरकार काबिज है। ऐसे में, सहकारी संघवाद सही मायनों में विकेंद्रीकरण में साकार होता दिखना चाहिए। केंद्र सरकार को दिल्ली से 'परमिशन राज' का खात्मा करना चाहिए। निवेश, रोजगार सृजन, महंगाई प्रबंधन और कृषि सुधार जैसे मामलों में फैसले लेने का हक राज्यों को देना चाहिए। मोदी मॉडल राजनीतिक उद्यमिता की बात करता था, मगर अफसोस की बात है कि मोदी सरकार भी नौकरशाही मॉडल पर निर्भर दिख रही है। यह पहले से चली आ रही व्यवस्था को ही आगे बढ़ाने जैसी बात है। दिक्कत यह है कि मोदी सरकार की तुलना यूपीए से न होकर खुद मोदी से हो रही है, और यही सरकार के लिए सबसे मुश्किल चुनौती है। नरेंद्र मोदी ने जो वायदे किए थे, उन पर खरा उतरने के लिए मोदी सरकार जूझ रही है।
-अर्थशास्त्र की राजनीति के विशेषज्ञ और एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक