नरेंद्र मोदी के लिए यह साल तनी हुई रस्सी पर चलने जैसा होगा। हाल के दो रुझान-पाकिस्तान के साथ संबंध सामान्य करने की कोशिश और विश्व हिंदू परिषद द्वारा अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की तैयारियां, जिसे सरकार ने रोकने की कोई कोशिश नहीं की-इस ओर संकेत करते हैं कि 2016 में प्रधानमंत्री को किन दुविधाओं का सामना करना पड़ सकता है।
वर्ष 2014 में मोदी विकास पुरुष के रूप में उभरे थे और लोगों, खासकर युवाओं में उम्मीद पैदा की थी कि वह वैसा कुछ करेंगे, जैसा अब तक कोई नहीं कर पाया। इसी कारण लोकसभा चुनाव में भाजपा को 282 सीटें और 31 फीसदी वोट मिले थे। आज उन्हें उन अतिरिक्त 13 फीसदी लोगों का विश्वास फिर से हासिल करने की जरूरत है, जो वायदों और प्रदर्शन के बीच तालमेल न पाकर निराश हो रहे हैं।
वर्ष 2015 में भाजपा के कट्टरवादियों ने, धारणा के स्तर पर ही सही, मोदी के विकास के एजेंडे को पटरी से उतार दिया। प्रधानमंत्री ने डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत और स्वस्थ भारत के बारे में जो कहा, उसका कोई मतलब ही नहीं रहा, क्योंकि बीफ, दादरी और असहिष्णुता ही चर्चाओं में हावी रहे। दिल्ली और बिहार में, जहां मोदी पार्टी का चेहरा थे, भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ा, इससे उनकी छवि को नुकसान पहुंचा। अमित शाह की छवि को भी नुकसान पहुंचा, जिस पर प्रधानमंत्री काफी भरोसा करते हैं। दिल्ली और बिहार में स्थानीय नेताओं की अनदेखी करने की अमित शाह की रणनीति बेशक विफल रही, इसके बावजूद आगामी पांच राज्यों-असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पुड्डुचेरी और केरल के चुनावों में प्रधानमंत्री को उनकी जरूरत है। असम का चुनाव भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण होगा। अगर पार्टी वहां जीतती है, तो कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा होगा और यह साबित होगा कि पार्टी ने अभी अपना आकर्षण नहीं खोया है। सत्ता-विरोधी रुझान को देखते हुए भाजपा असम में जीत हासिल कर सकती है, बशर्ते कांग्रेस ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और अगप से गठबंधन न करे, जिसकी संभावना से मुख्यमंत्री तरुण गोगोई अभी इन्कार कर रहे हैं।
भाजपा के कुछ नेताओं का कहना है कि दिल्ली और बिहार की हार ने संघ और उसके अनुषंग संगठनों के खिलाफ मोदी को मजबूत बनाया है। अब उन संगठनों को वह यह कहकर दबा सकते हैं कि उनकी उग्र बयानबाजी से भाजपा को चुनावी लाभ नहीं मिला और उन्हें आगे बढ़ने के लिए खुलापन चाहिए।
लगता है, प्रधानमंत्री अपनी पहल को फिर से नया रूप देना चाह रहे हैं। जैसे उन्होंने पाकिस्तान के साथ फिर शांति वार्ता शुरू करने का फैसला लिया और पाक प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर लंच करने लाहौर गए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि पठानकोट हमले के बावजूद विदेश सचिव स्तर की वार्ता को पटरी से उतारने की अनुमति नहीं दी गई। जबकि पहले संघ परिवार के दबाव में पाकिस्तान के प्रति मोदी का रुख आक्रामक होता था।
हाल के कुछ हफ्तों में प्रधानमंत्री मोदी की यह संभवतः सबसे महत्वपूर्ण पहल थी, जिसके चार या पांच सुखद नतीजे आ सकते हैं। एक तो यही कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक अस्थिर पड़ोसी के साथ ऊंची उड़ान नहीं भर सकती। इस क्षेत्र के जरिये गैस पाइपलाइन लानी है, तो मेल-जोल का महत्व समझना होगा। मोदी की यह पहल पश्चिमी पूंजीपतियों को भी खुश कर सकती है, जहां से मोदी को निवेश आने की उम्मीद है और जो नाटो बलों की विदाई के साथ इस क्षेत्र में स्थिरता चाहते हैं।
पाकिस्तान के साथ बेहतर रवैये के जरिये मोदी देश के उन उदार नागरिकों तक भी पहुंच रहे हैं, जो पिछले वर्ष खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे थे। दादरी की घटना के बाद बुद्धिजीवियों, कलाकारों, वैज्ञानिकों और लेखकों द्वारा पुरस्कार वापसी और असहिष्णुता पर बहस ने ऐसे वक्त में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मोदी की छवि को भारी नुकसान पहुंचाया, जब विश्व नेता उन्हें ताकतवर नेता मान रहे थे।
प्रधानमंत्री का यह कदम कश्मीर घाटी में हालात को बेहतर बनाने में भी मददगार है, क्योंकि इसका मुख्यधारा के राजनेताओं और अलगाववादियों, दोनों ने स्वागत किया है। पीडीपी ने, जो अभी इस पर विचार कर रही है कि मुफ्ती मोहम्मद सईद के अचानक निधन के बाद वह भाजपा के साथ सरकार बनाएगी या नहीं, मोदी की पहल को सकारात्मक कदम बताया है।
यह देखना होगा कि पाकिस्तान के प्रति मोदी की नरमी से उत्तर प्रदेश के मुस्लिमों का रवैया उनके प्रति नरम होगा या नहीं। इसका मतलब यह नहीं कि इनकी निष्ठा पाकिस्तान के प्रति है, पर जब पाकिस्तान से रिश्ते खराब होते हैं, तब मुस्लिमों को संदेह की नजर से देखा जाता है। अभी हालांकि यह थोड़ा अटपटा लग सकता है, पर यदि 2017 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव (जो भाजपा के लिए बेहद अहम है) का नतीजा त्रिशंकु हुआ, तो क्या भाजपा मुख्य या सहायक की भूमिका में सपा या बसपा के साथ गठबंधन कर सकती है? तब नरम छवि वाले मोदी के साथ ही सपा या बसपा के लिए गठजोड़ करना आसान होगा।
पर मुश्किल यह है कि मोदी की नरम छवि के मुकाबले विकास पुरुष वाली उनकी छवि ज्यादा आसान है, क्योंकि भाजपा के पारंपरिक 18 फीसदी मतदाता उनकी नरम छवि को स्वीकार नहीं कर पाएंगे। वे वर्षों से उन्हें हिंदू हृदय सम्राट के रूप में देखते आ रहे हैं। मंदिर मुद्दे को फिर से उठाने की कोशिश उनके इसी समर्थक समूह की चाल है। कुछ लोगों का मानना है कि इस मुद्दे को उठाने से भ्रम बना रहेगा, जिससे यह मुद्दा सुर्खियों में रहेगा। पर यह आसान नहीं है, क्योंकि भाजपा के कुछ लोग जहां राम मंदिर का निर्माण अदालत के आदेश से चाहते हैं, वहीं कुछ अन्य आम सहमति के जरिये। कुल मिलाकर, अगले कुछ महीने मोदी के लिए बेहद कठिन होंगे।