परिवर्तन की मशाल जलाकर करोड़ों उम्मीदों का बोझ लिए आज से ठीक चार साल पहले 26 मई, 2014 को नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी।
भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। यह जीत ऐतिहासिक इस लिहाज से भी थी कि उससे पूर्व जनसंघ और बाद में भाजपा गठबंधन सरकार का हिस्सा जरूर बनी थी, लेकिन अपने दम पर अकेले सरकार में आना किसी भी गैर कांग्रेसी पार्टी के लिए मील का पत्थर था।
नब्बे के दशक में उदारीकरण और वैश्वीकरण के बाद भारतीय राजनीति में विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों की विकासवादी छवि मजबूत हुई। इनमें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, ओडिशा के नवीन पटनायक, आंध्र प्रदेश के चंद्रबाबू नायडू और गुजरात के नरेंद्र मोदी सबसे आगे रहे।
ऐसा लगने लगा कि आगे की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में राज्य स्तरीय नेता जल्द ही केंद्रीय भूमिका में जरूर नजर आएंगे। लेकिन यह भूमिका गठबंधन के भरोसे ही संभव हो सकी। मगर गुजरात के चर्चित व विवादित मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने नाम और काम के बल पर जब तीसरी बार 2012 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की, तभी से उनकी केंद्रीय राजनीति में प्रवेश की आहट सुनाई देने लगी थी।
उस वक्त भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार लालकृष्ण आडवाणी को किनारे कर भाजपा ने जिस दिन नरेंद्र मोदी को आगे किया, इतिहास वहीं से बनने लगा था। नरेंद्र मोदी ने देशव्यापी सैकड़ों चुनावी रैलियों को जिस स्थानीयता से संबोधित किया, वह अपने आप में अभूतपूर्व रहा। नरेंद्र मोदी का शायद ही कोई कार्यक्रम उस दौरन रद्द किया गया हो।
प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने योजना आयोग को खत्म करके उसके स्थान पर नीति आयोग के गठन का पहला बड़ा फैसला लिया।
कोलंबिया विश्वविद्यालय के विख्यात अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया को इस आयोग का उपाध्यक्ष बनाए जाने पर उम्मीद की गई कि वह नीतिगत फैसलों में तेजी लाएंगे। स्मृति ईरानी और निर्मला सीतारमण जैसे विश्वस्त नेताओं को राज्यसभा के जरिये मंत्रिमंडल में लाया गया।