फरवरी 2013 में प्रकाशित अपने एक लेख में मैंने लिखा था, 'नरेंद्र मोदी के प्रशंसक और आलोचक इसे बेशक पसंद न करें, मगर यह सच है कि गुजरात के मुख्यमंत्री में यदि अतीत और वर्तमान के सभी भारतीय राजनीतिज्ञों में से किसी से सर्वाधिक समानता दिखती है, तो वह थीं 1971-77 के दौरान की इंदिरा गांधी। जैसा कि कभी इंदिरा ने किया था, ठीक वैसे ही मोदी भी अपनी पार्टी, सरकार, प्रशासन और देश को अपनी ही शख्सियत का विस्तार बनाने की कोशिश करते दिखते हैं।' आज फिर से मैं वही तुलना करना चाहूंगा। सबसे पहले पार्टी को खुद का विस्तार बनाने के मुद्दे पर गौर करें। 1969 से पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सक्रिय जिला व राज्य इकाईयों के साथ कई कद्दावर नेता हुआ करते थे। मगर जब इंदिरा गांधी ने कांग्रेस का विभाजन कर दिया, उसके बाद से पूरी पार्टी उनके हुक्म की गुलाम बन गई। इंदिरा गांधी के कद के अंदाजा पार्टी के नाम यानी कांग्रेस (आई) से भी लगाया जा सकता है, जिसमें 'आई' (इंदिरा) का मतलब समझने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए।
भारतीय जनता पार्टी खुद को दूसरों से अलग बताती आई है। भाजपा हमेशा से राजनीतिक ताकत पर किसी एक व्यक्ति के नियंत्रण के खिलाफ रही है, जैसा कि लाल बहादुर शास्त्री के बाद की कांग्रेस में हुआ था। भाजपा दावा करती थी कि अपनी प्रमुख विरोधी पार्टी के उलट उसकी पहचान कभी किसी खास शख्सियत के साथ नहीं जुड़ी रही। कई वर्षों तक भाजपा में बराबर स्तर के नेताओं की तिकड़ी रही, जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी शामिल थे। दिलचस्प यह है कि जब पार्टी ने नई दिल्ली की सत्ता संभाली, तो ये तिकड़ी वाजपेयी और आडवाणी की 'जोड़ी' में बदल गई, जिन्हें क्रमशः 'विकास पुरुष' और 'लौह पुरुष' का नाम दिया गया। दरअसल, आजादी के शुरुआती वर्षों में नेहरू-पटेल की जोड़ी की सुविचारित गूंज भाजपा की इस जोड़ी में भी सुनाई देती थी।
इंदिरा से पहले की कांग्रेस पार्टी की तरह भाजपा के पास भी राज्यों, ट्रेड यूनियनों और महिला संगठनों में कई प्रभावशाली नेता रहे। फिर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ हमेशा भाजपा के पीछे रहा। आरएसएस के सरसंघचालक और महासचिवों का भाजपा की नीतियों पर खासा असर रहा। दरअसल, यह नेताओं की विविधता और संगठन की गहराई का ही नतीजा था, जिसने भाजपा को उस कांग्रेस से अलग साबित किया, जिसे हमेशा निराशाजनक ढंग से किसी एक नेता के कंधे की तलाश रही, पहले इंदिरा, फिर राजीव, और अब सोनिया। आरएसएस और भाजपा दोनों ही लंबे समय तक व्यक्ति पूजा के खिलाफ रही हैं, जबकि विरोधी पार्टी की यही पहचान रही है। कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियों पर हमेशा से ही किसी एक चेहरे का प्रभुत्व रहा है। मगर आज के हालात में भाजपा का यह दावा कितना बेमानी लगता है। आज पार्टी पर नरेंद्र मोदी का नियंत्रण इंदिरा गांधी के उस प्रभुत्व की याद दिलाता है, जैसा उन्होंने 1971 के चुनावों में जीत के बाद कांग्रेस पर दिखाया था।
दोनों नेताओं की कुछ ऐसी ही तुलना अपनी सरकार के साथ उनके रिश्तों के संदर्भ में भी की जा सकती है। इंदिरा गांधी के बारे में एक कहानी प्रचलित है, कि उनकी वाशिंगटन यात्रा से पहले राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने भारतीय राजदूत से पूछा कि वह उन्हें कैसे संबोधित करें, मैडम या मिसेज गांधी। यह सवाल घूमता हुआ जब इंदिरा गांधी के पास पहुंचा, तो उनका जवाब था कि उनकी कैबिनेट के ज्यादातर सदस्य उन्हें 'सर' पुकारते हैं। इस कहानी पर संदेह किया जा सकता है, मगर इसमें संदेह नहीं कि उनकी कैबिनेट के सदस्यों की उनके सामने वैसी ही खौफजदा हालत होती थी, जो आज मोदी के सामने उनकी कैबिनेट के सदस्यों की होती है। गौरतलब है कि हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री की फैसले लेने और नियंत्रण रखने की क्षमता उनके पूर्ववर्ती से बिल्कुल विपरीत है। ऐसे में यह कहने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि सारी ताकत के केंद्रीकरण और सरकार की पूरी बागडोर अपने हाथ में रखने का जैसा सार्वजनिक प्रदर्शन मोदी कर रहे हैं, वह देश के संविधान में वर्णित कैबिनेट की सामूहिक उत्तरदायित्व की मूल भावना को ठेस पहुंचाता है।
देश के साथ अपनी पहचान जोड़ने के मामले में भी अतीत और वर्तमान के दोनों प्रधानमंत्रियों की तुलना खासी दिलचस्प है। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देव कांत बरुआ ने एक बार कहा था, 'इंदिरा इज इंडिया, ऐंड इंडिया इज इंदिरा।'' अब तक भाजपा के किसी नेता ने ऐसी बात नहीं की है, मगर नरेंद्र मोदी ने समय-समय पर खुद को राष्ट्र की अभिव्यक्ति कहते रहे हैं। तमाम तरह के दावे किए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि अब तक किसी प्रधानमंत्री को जनता का इतना प्यार नहीं मिला है। इतना ही नहीं, यह दावा भी किया जा रहा है कि चूंकि ओबामा ने भारतीय प्रधानमंत्री की आंखों में आंखे डालकर बातें की हैं, भारत पूरी दुनिया के सामने अपने गर्व को जाहिर कर सकता है। यह सब कुछ इंदिरा गांधी के उन भाषणों की याद दिलाता है, जिसमें वह कहती थीं, कि वह और सिर्फ वह भारतीय गणतंत्र के वर्तमान और भविष्य का प्रतिनिधित्व करती हैं। दोनों नेताओं में एक और समानता है। दोनों के पास एक ऐसा शख्स था, जिसमें उनका आत्म विश्वास प्रतिबिंबित होता था, जो जानता था कि उसके नेता के दिमाग में क्या चल रहा है, और जो कैबिनेट का हिस्सा बने बगैर उनकी योजनाओं को क्रियान्वित करता था।इंदिरा गांधी के इस दाएं हाथ की भूमिका, 1969 से 1974 के बीच पी एन हक्सर, 1974 से 1980 के बीच संजय गांधी और 1981 के बाद राजीव गांधी ने निभाई। नरेंद्र मोदी के लिए अमित शाह यही कर रहे हैं, मिजाज और योग्यता के मामले में जिनमें पी एन हक्सर और संजय गांधी दोनों की विशेषताएं मिलती हैं।
हालांकि कुछ बिंदु ऐसे हैं, जहां नरेंद्र मोदी और इंदिरा गांधी में फर्क भी दिखता है। इंदिरा गांधी को एक प्रभावशाली राजनीतिक परिवार में पैदा होने का फायदा मिला, जबकि मोदी आज जो कुछ भी हैं, खुद की बदौलत हैं। इंदिरा गांधी अर्थव्यवस्था पर राज्य के नियंत्रण की हिमायती थीं, जबकि मोदी निजी उद्योगों पर ज्यादा भरोसा करते हैं। इंदिरा गांधी में भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता को लेकर गहरी समझ थी, जबकि मोदी हिंदुत्व के कट्टर माहौल में बढ़े हैं। अभी नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने तकरीबन नौ महीने ही हुए हैं। उनकी राजनीति उन्हें कई नई दिशाओं में लेकर जा सकती है। एक लोकतांत्रिक भारतीय होने के नाते मुझे यह उम्मीद करने का हक है कि वे इंदिरा गांधी की राजनीतिक निरंकुशता से खुद को दूर रखते हुए उनकी सामाजिक बहुलतावादी सोच को अपनाएं।