बढ़ती जनसंख्या के कारण, सतत विकास लक्ष्य 2030 को पाने में हमारे सामने कई तरह की चुनौतियां हैं। इसमें सबसे बड़ी चुनौती है कुपोषण से मुक्ति। मिड-डे मील, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और पुष्टाहार वितरण योजनाओं में जमीनी स्तर पर कमियां और भ्रष्टाचार, इन योजनाओं के क्रियान्वयन में सबसे बड़ी बाधा हैं। विगत वर्षों में दलहन के उत्पादन में कमी और लोगों में खानपान के प्रति कम जागरूकता के कारण भी देश में कुपोषण की समस्या बढ़ी है। हाल ही में आई ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2020’ की रिपोर्ट बताती है कि हमारे देश में स्वास्थ सेवाओं की प्रगति काफी धीमी है। शिशु मृत्यु दर और कुपोषण पर केंद्रित यह रिपोर्ट खानपान और कुपोषण के आपसी रिश्ते की भूमिका बताती है।
इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई), जर्मनी के गैर सरकारी संगठन 'वेल्थहुंगरहिल्फे' और 'कंसर्न' संस्था ने 2006 में पहली ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ जारी की थी। ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2020 में 107 देशों को शामिल किया गया है। इस इंडेक्स के मुताबिक, भारत 94वें, बांग्लादेश 75वें, म्यांमार 78वें, पाकिस्तान 88वें, नेपाल 73वें और श्रीलंका 64वें स्थान पर हैं। नेपाल और श्रीलंका 'मध्यम' श्रेणी में आते हैं, जबकि भारत, बांग्लादेश जैसे अन्य देश गंभीर श्रेणी में आते हैं। चीन, बेलारूस, यूक्रेन, तुर्की, क्यूबा और कुवैत सहित 17 देश शीर्ष रैंक पर हैं। असल में, ग्लोबल हंगर इंडेक्स चार पैमानों पर देशों को परखता है। ये चार पैमाने हैं - कुपोषण, शिशु मृत्यु दर, चाइल्ड वेस्टिंग (नाटापन) और बच्चों की वृद्धि में रोक। एक नजर में तो लगता है कि भारत दूसरे देशों से काफी पीछे है, जबकि हकीकत यह है कि भौगोलिक स्थिति, आबादी और क्षेत्रफल के हिसाब से भारत दूसरों विकासशील देशों की तरह ही है। रिपोर्ट के मुताबिक, 27.2 के स्कोर के साथ भारत भूख के मामले में 'गंभीर' स्थिति में है। भारत की रैंकिंग में सुधार हुआ है, पर कुल देशों की संख्या भी घटी है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की करीब 14 फीसदी जनसंख्या कुपोषण का शिकार है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 3.7 प्रतिशत है। इसके अलावा ऐसे बच्चों की दर 37.4 थी, जो कुपोषण के कारण नहीं बढ़ पाते हैं। दरअसल, ये ऐसे बच्चे हैं, जिनकी लंबाई उम्र की तुलना में कम है और कुपोषण के शिकार हैं। बांग्लादेश, भारत, नेपाल और पाकिस्तान के 1991 से 2020 तक के आंकड़ों से पता चलता है कि ऐसे परिवारों में बच्चों के कद नहीं बढ़ पाने के मामले ज्यादा हैं, जो विभिन्न कमियों से पीड़ित हैं। इन घरों में पौष्टिक भोजन की कमी, मातृ शिक्षा का निम्न स्तर और गरीबी आदि शामिल हैं। सकारात्मक संकेत यह है कि 1991 से 2020 की अवधि के दौरान भारत में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्युदर में कमी दर्ज की गई। समय से पहले जन्म और कम वजन के कारण बच्चों की मृत्यु दर गरीब राज्यों और ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ी है।
विशेषज्ञों की मानें, तो सामाजिक योजनाओं का खराब कार्यान्वयन, कार्यक्रमों में प्रभावी निगरानी की कमी, कुपोषण से निपटने में स्वास्थ्य संस्थाओं की उदासीनता और बड़े राज्यों की खराब स्थिति के कारण समस्या और बढ़ी है। भारत की रैंकिंग में समग्र परिवर्तन के लिए उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों के प्रदर्शन में सुधार की आवश्यकता है। भारत में पैदा होने वाला हर पांचवां बच्चा उत्तर प्रदेश का है। यदि उच्च आबादी वाले राज्य में कुपोषण का स्तर अधिक है, तो यह देश के औसत में बहुत योगदान देगा, और यही हो रहा है। कुपोषण के मामले में देश का राष्ट्रीय औसत, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों से अधिक प्रभावित होता है। देश में कोई भी बदलाव उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और बिहार के बिना संभव नहीं है। देश में पोषण कार्यक्रमों और नीतियों की जमीनी हकीकत अच्छी नहीं है। पौष्टिक और सस्ता आहार की आम लोगों तक पहुंच आसान बनाने के लिए संचालित कार्यक्रमों को तेज करने की जरूरत है। ऐसी व्यवस्था हो कि बच्चे का वजन कम हो, तो शुरुआती स्तर पर ही इसका पता लगा कर उपचार कर दिया जाए, तो समस्या का काफी हद तक समाधान किया जा सकता है।