हमारे देश की जुगाड़ टेक्नालॉजी का पूरी दुनिया लोहा मानती है। यहां सारा खेल ही जुगाड़ का है। जुगाड़ पर जुगाड़ बिठाते रहिए, तो उपलब्धियां आपके खाते में। कक्षाओं में दाखिले के लिए जुगाड़। दफ्तर में नौकरी पाने की जुगाड़। फिर प्रमोशन के लिए जुगाड़। नौकरशाही जनता को दरकिनार रख पूरे वक्त एक टांग से सरकार में बैठे हुक्मरानों से जुगाड़ बिठाने में ही जुटी रहती है। सरकार बदलते ही जुगाड़ के पहले वाले तरीके पुराने पड़ जाते हैं।
सो जुगाड़ के अध्याय को नए सिरे पढ़ना और गढ़ना अफसरों की जैसे नियति बन जाती है। अधिकारी अपने दफ्तर में बैठा ऊंघ रहा है, पर आम आदमी अपने काम के लिए उससे मिलने की जुगाड़ लगाते-लगाते हार-थककर बैठ जाने को मजबूर हो जाता है। उसके पास जुगाड़ के औजार बहुत कम होते हैं। आप रोडवेज की बसों में बैठते ही होंगे, जिनके चलने पर बादलों के गरजने जैसी इतनी तीव्र ध्वनि होती है कि चालक को हार्न बजाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। इन पुरानी और बीमार बसों को चलाने वाला उन्हें सिर्फ जुगाड़ तकनीक से चलाता है।
जुगाड़ एक सार्वभौमिक और सर्वकालिक सत्य है। इसकी उपस्थित धर्म, कर्म से लेकर साहित्य-कला के क्षेत्र तक हर कहीं बखूबी बरकरार है। कवि अपनी कविता छपाने के लिए संपादक से जुगाड़ बैठाता है, फिर मंच पर जाने से लिए व्यवस्थापक से और किताब छपाने के लिए प्रकाशक से जुगाड़ भिड़ाता है। फिर उसे सरकारी खरीद में लगवाने का जुगाड़ और सबसे बाद में रॉयल्टी का जुगाड़। देखा जाए तो तरक्की जुगाड़ के रास्ते से ही होकर गुजरती है।
पर जुगाड़ एक कठिन रस्साकसी है। इसके लिए नाकों चने चबाने पड़ते हैं। इसके लिए अतिरिक्त सतर्कता और बुद्धि की जरूरत होती है। अब देखिए न कि हमारा ताकतवर विपक्ष सरकार को गिराने की जुगाड़ में पूरे पांच वर्ष कवायद करता है, पर सरकार है कि जुगाड़ भिड़ाकर हर बार अपनी सत्ता और शरम, दोनों बचा लेती है। कुरसी तक पहुंचने के लिए अवसरवादी गठबंधन जुगाड़ ही तो हैं। आज जुगाड़ एक पूर्ण मानवीय और सामाजिक गतिविधि हो चली है। यह विचार भी है और विचारधारा भी। इसलिए यह कहना नितांत अनुचित होगा कि विचारधारा का अंत हो गया है। आज जुगाड़ ही सबसे बड़ा विचार है। उसने दूसरे समस्त विचारों को परास्त करके पीछे ढकेल दिया है। और श्रम, शक्ति तथा मेधा के सामने विजयोल्लास मना रहा है।