नवजात शिशु के स्वास्थ्य के लिए मां का दूध जरूरी होता है। इसी को ध्यान में रखकर मुंबई, पूणे, सूरत और कोलकाता में दूध बैंकों की स्थापना की जा चुकी है और उसी कड़ी में उदयपुर में नया दूध बैंक स्थापित किया गया है।
अपने देश में मां के दूध से वंचित नवजातों की मृत्युदर प्रति हजार में 46 है। ऐसे में जिन लावारिस या असहाय बच्चों को किन्हीं कारणों से मां का दूध नहीं मिल पाता, उनको बचाने की यह पहल स्वागत योग्य कही जा सकती है, लेकिन क्या हकीकत में इस अवधारणा के पीछे ऐसी ही नेकनीयती है?
कुछ शिशुओं को मां का दूध न मिल पाना अगर समस्या हो, तो उसका हाल ढूंढना ही चाहिए। लेकिन देखा यह जा रहा है कि स्तनपान कराने के तमाम प्रचार के बावजूद, शारीरिक काया को संरक्षित रखने के नाम पर मांएं अपने शिशुओं को स्तनपान से वंचित रख रही हैं। उनके बच्चे डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ और बोतल के दूध से पलते हैं।
ऐसी मांएं ज्यादातर मध्यवर्ग और संपन्न घरों की होती हैं। झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाली या गांव-देहात की गरीब महिलाएं शिशुओं को अपना दूध पिलाती हैं। जबकि यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि मां का दूध भविष्य में होने वाली तमाम बीमारियों से रक्षा करता है और शरीर में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।
मुश्किल यह है कि विकास की प्रक्रिया अंततः गरीबों की कीमत पर आगे बढ़ती है। वह मानवीय संवेदना का क्षरण करती है और शारीरिक और आर्थिक लाभ पर ज्यादा जोर देती है। इसी क्रम में मां का दूध उपलब्ध कराने के लिए दूध बैंक स्थापित करने की कार्ययोजना को अमली जामा पहनाया जा रहा है, ठीक ब्लड बैंक की तर्ज पर। हालांकि ब्लड बैंकों का यथार्थ हमारे सामने है।
आम जनता के लिए उनकी उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लगते रहे हैं। जाहिर है, कुछ मानवीय पहलुओं के बावजूद, ज्यादातर ब्लड बैंक साधन संपन्न लोगों के काम आए हैं, वह भी गरीबों, लाचारों की कीमत पर, जो भूख और गरीबी से तंग आकर अपना खून बेचने को बाध्य हुए हैं। देश के तमाम ब्लड बैंक उनके खून से भरे हुए हैं। इन ब्लड बैंकों में अमीरों का खून नहीं है, जब कभी उन्होंने अपना खून दिया भी है, तो फोटो छपवाकर अपने अमानवीय चेहरे पर लगे दाग-धब्बों को धोया है।
मानव अंगों की तस्करी की तमाम घटनाएं भी गरीबों को शिकार बनाकर अमीरों के स्वास्थ्य की रक्षा करती जान पड़ती हैं। ऐसे में हमें दूध बैंक की नई अवधारणा के मानवीय पक्षों पर विचार करना चाहिए। जिन शहरों में ऐसी अवधारणा को मूर्त रूप दिया जा चुका है, वहां मांओं से दूध दान कराकर, किन लोगों के बच्चों को उपलब्ध कराया गया, इस संबंध में भी आंकड़े आने चाहिए। जिन मांओं के स्तनों में दूध नहीं उतरता, अगर उनके या लावारिस बच्चों को दूध बैंक द्वारा मदद की गई हो, तो बेहतर। लेकिन हकीकत यह है कि जिन मांओं को दूध नहीं होता, उनमें से ज्यादातर कुपोषण की शिकार होती हैं और ये दूध बैंक उनके बच्चों की पहुंच से बाहर होते हैं।
यह भी विचार करने की जरूरत है कि क्या मुंबई का दूध बैंक संपन्न घरों की मांओं के दूध दान से बना है या झुग्गियों में रहने वाली लाखों गरीब मांओं के दूध दान से? हमारे देश की गरीब मांओं का स्वास्थ्य इतना बेहतर नहीं होता कि वे प्रचुर मात्रा में दूध बेच सकें। वे अपने शिशुओं का पेट काटकर ही दूध बैंक को दूध बेचेंगी और अपने शिशुओं को कुपोषित रखेंगी। इसलिए जो लोग दूध बैंक की अवधारणा की वकालत कर रहे हैं, वे गरीबों के शिशुओं का पेट काटकर अमीरों के शिशुओं को मां का दूध उपलब्ध कराने की योजना बना रहे हैं।
दरअसल मानवीय दृष्टिकोण से योजनाओं को स्थापित तो किया जाता है, पर उसके पीछे के अमानवीय और स्वार्थी दृष्टिकोण को छिपा दिया जाता है। इस योजना की शुरुआत उन्हीं शहरों में हो सकी है, जहां झुग्गियां ज्यादा हैं। एक और पहलू पर विचार करने की जरूरत है, वह यह कि मांएं अपने स्तनों से बच्चों को लगाकर जब अपना दूध पिलाती हैं, तब न केवल पोषक तत्वों की भरपाई करती हैं, बल्कि संवेदनात्मक अनुभूति का आदान-प्रदान भी करती हैं। मां के स्तनों से चिपके शिशुओं में मां के प्रति जो भाव उत्पन्न होते हैं, वह दूध बैंक के दूध को चम्मच से पिलाकर कतई पैदा नहीं किया जा सकता।