पाकिस्तान के सत्तर वर्षों के इतिहास में पहली बार सीनेट के चेयरमैन मियां रजा रब्बानी ने सैन्य प्रमुख को कुछ महत्वपूर्ण विदेश नीति और सुरक्षा मुद्दों पर सेना की स्थिति पर चर्चा करने के लिए आमंत्रित किया। जनरल कमर जावेद बाजवा के साथ आईएसआई के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल नावेद मुख्तार, सैन्य गतिविधियों के महानिदेशक मेजर जनरल शमशाद मिर्जा और सैन्य खुफिया निदेशक जनरल मेजर असीम मुनीर भी थे।
आमतौर पर वर्दीधारी लोग संसद भवन नहीं जाते। अतीत में इस परिसर के आसपास सैन्य जवानों को तभी देखा गया था, जब मुल्क में मार्शल लॉ की घोषणा की गई थी। लेकिन बीते मंगलवार को जब कमिटी की सारी कार्यवाही की कैमरे से रिकॉर्डिंग हो रही थी, तब बाजवा को तीन घंटे तक विभिन्न राजनीतिक दल के सांसदों के सवालों का जवाब देते हुए देखा गया।
पीएमएल (क्यू) के एक सांसद सैयद मुशाहिद हुसैन ने बताया, 'मैंने सैन्य प्रमुख को सीधी बात करने वाला पाया। यहां तक कि वह कठिन सवालों का जवाब देने में भी नहीं हिचकिचाए। पूरे तीन घंटों तक सांसदों ने उनसे सवाल पूछे, और बाजवा ने पूरी तसल्ली से उन सवालों के जवाब दिए।' कुल मिलाकर बाजवा ने सांसदों को बताया कि गेंद राजनेताओं और सरकार के पाले में है। अगर कोई जगह खाली छोड़ी जाएगी, तो उसे फिर भरना होगा, क्योंकि खालीपन से सुरक्षा के खतरे बढ़ते हैं। बाजवा ने कहा कि नेताओं को कभी सेना को मौके का प्रलोभन नहीं देना चाहिए। उन्होंने उदाहरण दिया कि करीब पांच वर्षों से मुल्क में कोई विदेश मंत्री नहीं है और इसने विदेश नीति को नुकसान पहुंचाया है। इसी संदर्भ में उन्होंने ‘सैन्य कूटनीति’ का जिक्र किया, जिसके तहत वह दुनिया की विभिन्न राजधानियों में गए और सांसदों के विशेष हित के लिए उन्होंने हाल ही में ईरान और आफगानिस्तान में बैठक की।
प्रेस को संबोधित करने के बाद एक सांसद ने बताया कि 'बाजवा ने लोकतंत्र और कानून के राज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई और नागरिक सरकार को अस्थिर करने में सेना की भूमिका से स्पष्ट रूप से इन्कार किया। उन्होंने जिया उल हक और परवेज मुशर्रफ का संकेत करते हुए अतीत में हुई गलती से इन्कार नहीं किया, और कहा कि वह दूसरों की गलती के लिए जिम्मेदार नहीं हैं।'
बाजवा ने संसद को बताया कि जब भी सरकार कोई विदेश नीति बनाएगी, सेना उसका पालन करेगी। इस बिंदु पर उन्होंने यह भी कहा कि अगर पाकिस्तान सरकार भारत के साथ द्विपक्षीय रिश्तों पर नीति बना लेती है, तो सेना उसके पालन के लिए बाध्य होगी। अतीत में जब भी भारत को लेकर नीति का सवाल उठता था, तो उसमें सैन्य मुख्यालय का फैसला अंतिम होता था और सेना की मंजूरी के बिना कुछ भी नहीं होता था। अब यह विशेष रूप से द्विपक्षीय व्यापार के मुद्दे पर देखा जाएगा, अगर सरकार पाकिस्तान के रास्ते अफगानिस्तान और भारत के बीच व्यापार के लिए वाघा बॉर्डर खोल देगी। लेकिन ध्यान रहे कि ताली सिर्फ एक हाथ से नहीं बजती। भारतीय प्रधानमंत्री मोदी को भी दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहिए, ताकि उनके समकक्ष शाहिद अब्बासी को आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह मिल सके। यह एकतरफा नहीं हो सकता। सांसदों ने हालांकि हाफिज सईद के बारे में भी सवाल पूछा और यह भी कि उसे क्यों आम चुनाव में शामिल होने की अनुमति दी जा रही है। सईद को हमेशा सेना के आश्रित के रूप में देखा गया है।
लेकिन सवाल इस पर भी उठे कि सेना प्रमुख को राजनेताओं के साथ विचार-विमर्श के लिए संसद बुलाया जाना क्या सही है। वास्तविकता तो यह है कि जब सेना ने सांसदों को सैन्य मुख्यालय में सुरक्षा के मुद्दे पर बात करने के लिए बुलाया था, तब कई सांसद इससे खुश नहीं थे। एक सांसद के रूप में उन्हें लगा कि उन्हें अपनी बात संसद में रखनी चाहिए। एक मामले में सांसद फरहतुल्लाह बाबर ने, जो संसदीय रक्षा समिति के सदस्य थे, सैन्य मुख्यालय जाने के बजाय समिति से इस्तीफा दे दिया। मंगलवार को उन्होंने ही सबसे पहले बाजवा से सवाल किया और संसद में आकर जानकारी देने के लिए उनका धन्यवाद किया। फरहतुल्लाह का मानना है कि व्यापार और व्यावसायिक गतिविधियों को क्रमिक और योजनाबद्ध तरीके से सेना से निजी क्षेत्रों की ओर बढ़ाना चाहिए, ताकि निवेशकों को एक समान अवसर प्रदान किया जा सके और स्वदेशी उद्योगों को व्यावहारिक बनाया जा सके। सदन में हाल ही में किए गए एक खुलासे का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि मुल्क में पचास से ज्यादा सैनिक उद्योगों में लिप्त हैं, जो सीमेंट, उर्वरक, चीनी उत्पादन से लेकर बैंकिंग, रियल एस्टेट और अन्य व्यवसाय चलाते हैं। उन्होंने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि बिना बोली के अनुबंध कैसे आवंटित किए गए और सैन्य संगठनों को कैसे कर्ज दिए गए, इन महत्वपूर्ण सवालों के जवाब मिलने चाहिए।
बेशक इस प्रचलित मजाक में दम है कि पाकिस्तानी सेना मुल्क की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। यह सवाल भी पूछा गया कि क्या बाजवा को संसद में बुलाना ठीक है। जमीनी वास्तविकता यह है कि बहुत सारी अफवाहें और साजिश की कहानियां प्रचलित थीं कि सरकार को हटाकर मार्शल लॉ लागू करके टेक्नोक्रैट सरकार का गठन किया किया जा रहा है। ऐसी भी अफवाह थी कि चुनाव को स्थगित किया जा सकता है। लेकिन बीते मंगलवार को सेना और सांसदों के बीच की चर्चा ने इन तमाम अफवाहों पर विराम लगा दिया और अब मीडिया का कहना है कि अगस्त, 2018 में आम चुनाव कराए जाएंगे।
हालांकि यह संभव नहीं है कि सेना एक दिन में अपनी पकड़ सरकार को सौंप देगी। दोनों तरफ से विश्वास बहाली करनी होगी और राजनेताओं को इस तरह से अपना काम करना होगा कि लोग समाधान के लिए सेना का मुंह न देखें। आखिर नवाज शरीफ ने एक विदेश मंत्री की नियुक्ति क्यों नहीं की। उन्हें किसने रोका था, जबकि इस क्षेत्र में बढ़ते बदलाव के साथ यह बेहद जरूरी था।