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नया सामाजिक समूह हैं प्रवासी मजदूर

मनीषा प्रियम
Updated Sat, 27 Jun 2020 01:56 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI

पहले बिहार और अब फिर उत्तर प्रदेश में रोजगार अभियान शुरू किए जाने की घोषणा की गई है। नीतीश कुमार ने जहां कहा है कि इसके तहत हर पंचायत में 3.43 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे, वहीं उत्तर प्रदेश से सूचना है कि सवा करोड़ लोगों को रोजगार मिलेगा।



इसकी प्रमुख वजह यह है कि प्रवासी मजदूरों के घर चले जाने की वजह से अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा है और सरकार द्वारा तमाम राहत पैकजों की घोषणा के बावजूद अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटती नहीं दिख रही है।


चाहे पंजाब की किसानी हो, या तेलंगाना के आम उत्पादक किसानों की समस्या हो, या सीमा सड़क संगठन द्वारा सड़क बनाना हो, कर्नाटक में भवन निर्माण के काम हों, मजदूरों की कमी की वजह से ये सारे काम ठप पड़ गए। तेलंगाना और पंजाब में विशेष परिवहन व्यवस्था करके बिहार से मजदूरों को वापस बुलाया गया है।


पिछले कुछ समय से सरकार सीमा पर बुनियादी ढांचे का निर्माण बहुत जोर-शोर से कर रही है, लेकिन मजदूरों के घर वापस जाने के कारण जब उसमें दिक्कत आने लगी, तो झारखंड सरकार से बात करके विशेष विमानों से मजदूरों को ले जाया गया।


ये तीनों उदाहरण बताते हैं कि चाहे खेती हो, भवन निर्माण हो या बुनियादी ढांचे का विकास हो, इन सबके लिए हमें श्रमिकों की आवश्यकता है। लेकिन अभी तक हम वह सुरक्षित माहौल नहीं बना पाए हैं कि अर्थव्यवस्था पहले की तरह सुचारू रूप से चल पाए। भले ही हम डिजिटल अर्थव्यवस्था का कितना भी प्रचार कर लें, लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था के लिए श्रमिक बहुत जरूरी हैं।


जो मजदूर अपने गांव लौट गए हैं, वे अभी तुरंत वापस लौटने के लिए तैयार नहीं हैं। कुछ मजदूरों ने बताया कि उन्होंने लौटने के बारे में फिलहाल नहीं सोचा है, अगर गांव-घर में जीवन यापन का कोई साधन नहीं मिला, तब भी वे छठ के बाद ही लौटेंगे।


इतने सारे श्रमिकों को ग्रामीण अर्थव्यवस्था में समायोजित करना संभव भी नहीं है। खेती-गृहस्थी में सबका गुजारा हो नहीं सकता है। हालांकि मनरेगा में रोजगार उपलब्ध कराने की बात भी हो रही है, लेकिन कितने लोगों को रोजगार मिल पाएगा, कहना मुश्किल है।
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गांव लौटे मजदूर भी फिलहाल यही सोच रहे  हैं कि जब शहरों में महामारी का प्रकोप थम जाएगा, तभी शहरों की तरफ रुख करेंगे। मोटे तौर पर कहें, तो माहौल हतोत्साहित करने वाला है। जो श्रमिक कुशल हो चुके थे, मशीनों पर काम करते थे, उनके लिए खेती-किसानी में वापस लौटना आसान नहीं होगा।


ये प्रवासी मजदूर चाहे किसी भी राज्य के हों, लेकिन इन सबकी समस्याएं एक  हैं, तो क्या ये एक सामाजिक समूह हैं? मुझे तो यही लगता है कि यह एक नया सामाजिक समूह है। हालांकि इसमें क्षेत्रीयता की भावना भी प्रबल दिखती है, क्योंकि बहुत से लोग अपने इलाके के प्रवासी मजदूरों को राहत पहुंचाने के  लिए आगे आए।


धर्म या जाति के आधार पर नहीं, बल्कि क्षेत्रीय आधार पर लोगों में परस्पर सहयोग एवं एकजुटता की भावना बढ़ी है। यह समूह न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को, बल्कि सामाजिक संरचना और स्थानीय राजनीति को भी प्रभावित करेगा।


जहां तक ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बात है, तो गांव में रोजगार के तीन ही अवसर उपलब्ध है-ईंट भट्ठा, किसानी और मनरेगा। इसके अलाव ग्रामीण इलाके में रोजगार का कोई बड़ा स्रोत नहीं है और रातोंरात कोई उद्योग शुरू नहीं किया जा सकता। बिहार और उत्तर प्रदेश भारत के ऐसे इलाके हैं, जहां युवाओं की संख्या सबसे ज्यादा है।


जिस रोजगार अभियान की बात की गई है, उसमें भी ज्यादातर लोगों को मनरेगा के तहत ही काम उपलब्ध कराया जाएगा और कुछ लोगों को स्वरोजगार शुरू करने के लिए कौशल प्रशिक्षण दिया जाएगा। लेकिन केवल मनरेगा और राशन वितरण के बल पर अर्थव्यवस्था को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। इसके लिए कृषि से संबंधित उद्योग-धंधे भी ग्रामीण इलाकों में शुरू करने होंगे।


संकट के समय कोई विधायक या सांसद प्रवासी मजदूरों की मदद के लिए आगे आता नहीं दिखा, लेकिन बिहार के कई इलाकों के मुखियाओं ने लोगों की मदद की कोशिश की। ऐसे में आने वाले दिनों में अगर स्थानीय स्तर पर नेतृत्व उभरकर सामने आए, तो कोई आश्चर्य नहीं।


खासकर बिहार की राजनीति में, जहां अगले कुछ महीनों में चुनाव होने वाले हैं, वहां यह सामाजिक समूह राजनीति को दिशा देने में भूमिका निभा सकता है। नीतीश कुमार ने महामारी नियंत्रण एवं प्रबंधन के लिए चाहे जैसी भी व्यवस्था की हो, लेकिन राज्य के प्रवासी मजदूरों को अपने गांव लौटने देने के पक्ष में वह नहीं थे। उन्होंने इन प्रवासी मजदूरों से सीधा संवाद बनाने की भी कोशिश नहीं की। अब देखना यह है कि प्रवासी मजदूरों की नाराजगी का असर वहां के राजनीतिक परिणामों पर दिखता है या नहीं।


प्रवासी मजदूरों में भारी गुस्सा है। शहरी धनी वर्ग की निर्दयता के साथ-साथ राजनीतिक वर्ग की उपेक्षा और उदासीनता ने भी उन्हें नाराज किया है। बीमारी का भय तो था ही, संकट के दौरान उन्हें सम्मान से जीने का अवसर नहीं दिया गया और उनके साथ जैसा रूखा रवैया अपनाया गया, उसके चलते भी वे अपने गांव-घर लौट गए। शहरी भारत को ग्रामीण भारत की हकीकत का पता ही नहीं है।


उसे गरीब बीमार लगता है, गरीबी बीमारी लगती है। गरीबों के प्रति, किसानों के प्रति, श्रमिकों के प्रति शहरी लोगों में इतनी घृणा और तुच्छ भावना है कि उसका जिक्र नहीं किया जा सकता। भूमंडलीकरण की आंधी में उपजे नव-धनाढ्य लोगों को लगता है कि सरकार का काम केवल उनकी महत्वाकांक्षाओं को ही पूरा करना है।


भारतीय राजनीति में खेती-किसानी और गरीबों का मुद्दा सबसे प्रमुख है। भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ यही श्रमिक एवं किसान हैं। आज भी देश का एक बड़ा इलाका अगर इस आपदा से बचा है, तो वह ग्रामीण इलाका है। इस संकट के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि कृषि क्षेत्र आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनी हुई है।


इसलिए सरकार को केवल उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में दस बड़े अस्पताल खोलने चाहिए। ये अस्पताल चिकित्सा शिक्षा और शोध के संस्थान होने चाहिए। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्र में ही कृषि आधारित रोजगार के ज्यादा से ज्यादा अवसर उपलब्ध कराने चाहिए। (लेखिका राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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